Anishchit Daur Mein Apekshit Parinaam
(0)
Author:
Stephen R. CoveyPublisher:
Manjul Publishing House Pvt LtdLanguage:
HindiCategory:
Management₹
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व्यवसाय में यदि कोर्इ चीज़ निश्चित है, तो वह है अनिश्चितता। इसके बावजूद, ऐसे महान संगठन भी हैं जो अनुकूलता और उत्कृष्टता के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं, भले ही परिस्थिkतियाँ कैसी भी हों। यह व्यावहारिक पुस्तक चार प्रमुख सिद्धांतों पर अमल करके अ्च्छे और बुरे दौर में अपेक्षित परिणाम पाने के बारे में है।
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व्यवसाय में यदि कोर्इ चीज़ निश्चित है, तो वह है अनिश्चितता। इसके बावजूद, ऐसे महान संगठन भी हैं जो अनुकूलता और उत्कृष्टता के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं, भले ही परिस्थिkतियाँ कैसी भी हों। यह व्यावहारिक पुस्तक चार प्रमुख सिद्धांतों पर अमल करके अ्च्छे और बुरे दौर में अपेक्षित परिणाम पाने के बारे में है।
Book Details
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ISBN9788183223850
-
Pages138
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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टाटा मोटर्स के चेयरमैन रतन टाटा ने एक सपना देखा था। लाखों भारतीयों के व्यक्तिगत इस्तेमाल और अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए एक सुरक्षित और सस्ती कार मुहैया कराना। इसी सपने से नैनो का जन्म हुआ है। इस सपने के साकार होने से ही नैनो इतनी चर्चित और प्रशंसित कार बन गई है। इस पुस्तक में उस स्वप्न को साकार करने की प्रेरणाप्रद कहानी है। यह कहानी है एक लाख रुपए की ‘वंडर कार’ नैनो की, उसके बनने की। नैनो के निर्माण की एक लंबी, संघर्षपूर्ण, कष्टप्रद एवं अत्यंत महँगी परियोजना थी, जिसमें एक-से-एक बड़ी दिक्कतें आईं। यह पुस्तक उस अनूठे और चमत्कारी प्रकल्प के पीछे की शक्ति टाटा मोटर्स की भी कहानी है, जिसने पुरातन तकनीक और पारंपरिक तरीकों में सुधार कर एक ऐसी कार बनाई, जिसने विश्व की तकनीकी रूप से समृद्ध ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को आश्चर्यचकित कर दिया। टाटा मोटर्स के चेयरमैन रतन टाटा ने एक सपना देखा था—लाखों भारतीयों को व्यक्तिगत इस्तेमाल और अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए एक सुरक्षित और सस्ती कार मुहैया कराने का। इसी सपने से नैनो की शुरुआत होती है। इस सपने के साकार होने से ही नैनो इतनी चर्चित और बड़ी प्रशंसित कार बन गई है। यह ऐसी कार है जिसमें न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में ऑटोमेटिव उद्योग के मौजूदा प्रतिमान को बदलने की क्षमता है। सफलता की नींव के निर्माण के लिए अनुसंधान आवश्यक है। भारत में लाखों परिवारों का असुरक्षित दोपहिया वाहनों पर सफर करना आम बात है। लेकिन एक दूरदर्शी व्यक्ति ने उनके लिए एक सुरक्षित और आरामदायक विकल्प की कल्पना की। यह अभिनव सोच थी। इस सोच के अनुरूप आकर्षक डिजाइनवाली एक कार बनाई जाने लगी, जिसमें चार व्यक्तियों का परिवार आरामदायक और सुरक्षित यात्रा कर सकता था। इस कार की घोषित कीमत महज 1 लाख रुपए थी। विकासशील दुनिया के लाखों लोगों के लिए टाटा मोटर्स की नई 2,500 डॉलर वाली चार दरवाजों की कार हेनरी फोर्ड के मॉडल टी जितनी बड़ी परिवहन क्रांति ला सकती है। यह दुनिया की सबसे सस्ती कार है। —गोविन राबिनोविल, एसोसिएटेड प्रेस नैनो भारतीय स्टाइल के समाजवाद का महान् प्रतीक है।—रेडिफ.कॉम बिक्री शुरू होने से पहले ही यह विकासशील दुनिया में एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में उभर चुकी है। यह नवीनता का एक नया ब्रांड है, जो सस्ता लेकिन बहुत उपयोगी है।—टाइम पत्रिका नैनो सस्ते निजी वाहन के युग का पूर्वाभास देती है।—न्यूजवीक यदि आधुनिक राष्ट्र बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा का कोई प्रतीक हो सकता है तो वह निश्चित रूप से कम कीमत वाली छोटी कार नैनो है। नैनो उन लाखों भारतीयों का सपना पूरा करेगी, जो शहरी समृद्धि का हिस्सा बनना चाहते हैं।—द फाइनेंशियल टाइम्स नैनो ने भारत को दुनिया के नक्शे पर पहुँचा दिया है। जिस काम को करने में जापानियों ने 30 वर्ष लगाए, टाटा मोटर्स ने उसे 4 वर्षों में कर दिखाया।—फिओन्ना प्रिम्स सेगमेंट वाइ के बिजनेस डेवलपमेंट प्रमुख यह बदलाव का वाहन है। यह भारत में समाज का चेहरा बदल देगी।—श्रवण गर्ग, भास्कर प्रकाशन समूह
Kuda Dhan
- Author Name:
Deepak Chaurasia
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कूड़ा-कबाड़ जैसी कोई चीज इस दुनिया में है ही नहीं। अगर कुछ कूड़ा-कबाड़ है तो हमारी सोच के चलते। या है कि हम जिन चीजों के इस्तेमाल के बारे में सोच नहीं पाते, उसे बेकार समझ लेते हैं, कूड़ा समझ लेते हैं। हमें उनका इस्तेमाल करना नहीं पता, इसलिए उन चीजों को फेंकना शुरू कर देते हैं। आज बहुत कम लोग हैं, जो दवा-दारू की खाली शीशियाँ और बोतलें फेंकते हैं। लोहे और धातुओं से बने सामान अगर खराब भी हो जाएँ तो ज्यादातर लोग उसे कूड़ेदान में नहीं फेंकते। नालों में नहीं फेंकते। यों? योंकि सबको शीशे और धातुओं की कीमत का अंदाजा है। जिन्हें ज्यादा नहीं पता, वे भी जानते हैं कि कबाड़ी वाला शीशी-बोतल और लोहा-लकड़ अच्छे दाम पर खरीद लेता है। लेकिन ऐसा हम पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतलों, बाल या घरेलू कचरे के बारे में नहीं सोचते, योंकि हमें पता ही नहीं कि इनका भी बहुत कुछ इस्तेमाल हो सकता है। यह इनसानी फितरत का मामला है। हर कोई आसान काम करना चाहता है, जिसमें जोखिम न हो, जबकि हर कोई यह ज्ञान भी बाँटता रहता है कि ‘नो रिस्क, नो गेन’। प्लास्टिक कचरे से पेट्रोल-डीजल बनाने में भी यही मानसिकता आड़े आ रही है। तकनीक मौजूद है, लेकिन उस तकनीक का इस्तेमाल करने का इरादा नदारद है। यह पुस्तक ‘वेस्ट टु वैल्थ’ यानी कूड़े से धन अर्जित करने के व्यावहारिक तरीके बताती है।
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