Kuda Dhan
Author:
Deepak ChaurasiaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
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Price: ₹ 400
₹
500
Available
कूड़ा-कबाड़ जैसी कोई चीज इस दुनिया में है ही नहीं। अगर कुछ कूड़ा-कबाड़ है तो हमारी सोच के चलते। या है कि हम जिन चीजों के इस्तेमाल के बारे में सोच नहीं पाते, उसे बेकार समझ लेते हैं, कूड़ा समझ लेते हैं। हमें उनका इस्तेमाल करना नहीं पता, इसलिए उन चीजों को फेंकना शुरू कर देते हैं।
आज बहुत कम लोग हैं, जो दवा-दारू की खाली शीशियाँ और बोतलें फेंकते हैं। लोहे और धातुओं से बने सामान अगर खराब भी हो जाएँ तो ज्यादातर लोग उसे कूड़ेदान में नहीं फेंकते। नालों में नहीं फेंकते। यों? योंकि सबको शीशे और धातुओं की कीमत का अंदाजा है। जिन्हें ज्यादा नहीं पता, वे भी जानते हैं कि कबाड़ी वाला शीशी-बोतल और लोहा-लकड़ अच्छे दाम पर खरीद लेता है। लेकिन ऐसा हम पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतलों, बाल या घरेलू कचरे के बारे में नहीं सोचते, योंकि हमें पता ही नहीं कि इनका भी बहुत कुछ इस्तेमाल हो सकता है।
यह इनसानी फितरत का मामला है। हर कोई आसान काम करना चाहता है, जिसमें जोखिम न हो, जबकि हर कोई यह ज्ञान भी बाँटता रहता है कि ‘नो रिस्क, नो गेन’। प्लास्टिक कचरे से पेट्रोल-डीजल बनाने में भी यही मानसिकता आड़े आ रही है। तकनीक मौजूद है, लेकिन उस तकनीक का इस्तेमाल करने का इरादा नदारद है।
यह पुस्तक ‘वेस्ट टु वैल्थ’ यानी कूड़े से धन अर्जित करने के व्यावहारिक तरीके बताती है।
ISBN: 9789352666775
Pages: 186
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
प्रेम से सफलता और सफलता का सम्पन्नता से बहुत गहरा रिश्ता है। प्रेम-भाव के बिना सम्पन्नता और सफलता भी मूल्यहीन हैं। जो प्रबन्धक अपने साथियों-सहकर्मियों को प्रेमपूर्वक साथ लेकर चलते हैं, वे कभी असफल नहीं होते।
‘प्रबन्ध की पाठशाला’ शीर्षक यह पुस्तक हमें कुछ ऐसे ही पाठ पढ़ाती है, जो देखने में ऐसे लगते हैं कि उनका न व्यवसाय से कोई सम्बन्ध है और न उद्यम-उद्योग से, लेकिन वास्तव में उनके बिना आप एक छोटी-सी दुकान भी सफलतापूर्वक नहीं चला सकते।
पुस्तक के लेखक को स्वयं प्रबन्धन के क्षेत्र का लम्बा अनुभव रहा है, उन्होंने स्वयं यह देखा है कि वे मानवीय मूल्य, जो परिवार से लेकर समाज तक हर संस्था की आधारशिला साबित होते हैं, व्यावसायिक सफलता भी उन पर बहुत दूर तक निर्भर करती है।
जीवन के दु:ख, कष्ट, तकलीफ़ें यहाँ अपनी कार्यकुशलता को वैसे ही बढ़ाती हैं, जैसे जीवन के किसी अन्य क्षेत्र में। इसी तरह नई चीज़ों के प्रति जिज्ञासा, मन को ताक़त देनेवाली आस्था, परिवर्तनशीलता, अनासक्ति, ईर्ष्या और वैमनस्य से सायास परहेज़, जीवन की अनिश्चितता के प्रति सजगता, उपकार के प्रति ग्रहणशीलता और परोपकार के प्रति तत्परता आदि ये सभी बीज-मंत्र हैं, जिनसे हम न सिर्फ़ अपने प्रबन्धन-कौशल को नई आभा दे सकते हैं, बल्कि अपने आसपास सभी को सकारात्मक माहौल भी मुहैया करा सकते हैं।
Prabandhan Ke Sur Gandhi ke Gur
- Author Name:
Vijay Joshi
- Book Type:

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Description:
गांधी का जीवन आत्म-अनुशासन, नैतिक साहस, मितव्ययिता, दूरदर्शिता, कुशल नेतृत्व, निर्णय-क्षमता तथा कर्म और विचारों के सन्तुलन का अद्भुत उदाहरण है। इस पुस्तक में पहली बार उनके इन जीवन-मूल्यों को आधुनिक प्रबन्धन-प्रणाली से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
प्रबन्धन को चालाकी-चतुराई की कला बताने के बजाय यह पुस्तक आन्तरिक सफ़ाई और उस कर्म-निष्ठा के बारे में बताती है जो प्रबन्धन-कार्य को एक सामाजिक तथा सर्वजनहिताय कार्य में बदल सकती है।
गांधी जी के जीवन के प्रेरक घटनाओं का विवरण देते हुए लेखक उनमें छिपी उन शिक्षाओं को रेखांकित करता चलता है जो आज हमें एक अच्छा व्यक्ति, अच्छा कर्मचारी और सक्षम प्रबन्धक बनने में मदद कर सकती हैं। सच्चाई, स्वावलम्बन, सेवाभाव, अनासक्ति, समानता के प्रति आग्रह, सद्-आचरण, मितव्ययिता, किसी भी कार्य की सांगोपांग जानकारी, उपदेश के बजाय कर्म को अहमियत देना, स्पष्ट संवाद, विनम्रता, निर्बलों की पक्षधरता और अनुशासन—ये सभी ऐसे मूल्य हैं जिन्हें अपने व्यवहार में लेकर हम अपनी प्रबन्धन-क्षमता को कई गुणा बढ़ा सकते हैं।
विजय जोशी स्वयं एक सफल प्रबन्धक रहे हैं, और इस पुस्तक को उनके व्यावहारिक अनुभवों का सार भी माना जा सकता है।
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