Nano Car Ki Khani
Author:
Sujata Agarwal, Christabelle Noronha, Phillip ChackoPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Management0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
टाटा मोटर्स के चेयरमैन रतन टाटा ने एक सपना देखा था। लाखों भारतीयों के व्यक्तिगत इस्तेमाल और अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए एक सुरक्षित और सस्ती कार मुहैया कराना। इसी सपने से नैनो का जन्म हुआ है। इस सपने के साकार होने से ही नैनो इतनी चर्चित और प्रशंसित कार बन गई है। इस पुस्तक में उस स्वप्न को साकार करने की प्रेरणाप्रद कहानी है। यह कहानी है एक लाख रुपए की ‘वंडर कार’ नैनो की, उसके बनने की।
नैनो के निर्माण की एक लंबी, संघर्षपूर्ण, कष्टप्रद एवं अत्यंत महँगी परियोजना थी, जिसमें एक-से-एक बड़ी दिक्कतें आईं। यह पुस्तक उस अनूठे और चमत्कारी प्रकल्प के पीछे की शक्ति टाटा मोटर्स की भी कहानी है, जिसने पुरातन तकनीक और पारंपरिक तरीकों में सुधार कर एक ऐसी कार बनाई, जिसने विश्व की तकनीकी रूप से समृद्ध ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को आश्चर्यचकित कर दिया।
टाटा मोटर्स के चेयरमैन रतन टाटा ने एक सपना देखा था—लाखों भारतीयों को व्यक्तिगत इस्तेमाल और अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए एक सुरक्षित और सस्ती कार मुहैया कराने का। इसी सपने से नैनो की शुरुआत होती है। इस सपने के साकार होने से ही नैनो इतनी चर्चित और बड़ी प्रशंसित कार बन गई है। यह ऐसी कार है जिसमें न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में ऑटोमेटिव उद्योग के मौजूदा प्रतिमान को बदलने की क्षमता है।
सफलता की नींव के निर्माण के लिए अनुसंधान आवश्यक है। भारत में लाखों परिवारों का असुरक्षित दोपहिया वाहनों पर सफर करना आम बात है। लेकिन एक दूरदर्शी व्यक्ति ने उनके लिए एक सुरक्षित और आरामदायक विकल्प की कल्पना की। यह अभिनव सोच थी। इस सोच के अनुरूप आकर्षक डिजाइनवाली एक कार बनाई जाने लगी, जिसमें चार व्यक्तियों का परिवार आरामदायक और सुरक्षित यात्रा कर सकता था। इस कार की घोषित कीमत महज 1 लाख रुपए थी।
विकासशील दुनिया के लाखों लोगों के लिए टाटा मोटर्स की नई 2,500 डॉलर वाली चार दरवाजों की कार हेनरी फोर्ड के मॉडल टी जितनी बड़ी परिवहन क्रांति ला सकती है। यह दुनिया की सबसे सस्ती कार है। —गोविन राबिनोविल, एसोसिएटेड प्रेस
नैनो भारतीय स्टाइल के समाजवाद का महान् प्रतीक है।—रेडिफ.कॉम
बिक्री शुरू होने से पहले ही यह विकासशील दुनिया में एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में उभर चुकी है। यह नवीनता का एक नया ब्रांड है, जो सस्ता लेकिन बहुत उपयोगी है।—टाइम पत्रिका
नैनो सस्ते निजी वाहन के युग का पूर्वाभास देती है।—न्यूजवीक
यदि आधुनिक राष्ट्र बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा का कोई प्रतीक हो सकता है तो वह निश्चित रूप से कम कीमत वाली छोटी कार नैनो है। नैनो उन लाखों भारतीयों का सपना पूरा करेगी, जो शहरी समृद्धि का हिस्सा बनना चाहते हैं।—द फाइनेंशियल टाइम्स
नैनो ने भारत को दुनिया के नक्शे पर पहुँचा दिया है। जिस काम को करने में जापानियों ने 30 वर्ष लगाए, टाटा मोटर्स ने उसे 4 वर्षों में कर दिखाया।—फिओन्ना प्रिम्स सेगमेंट वाइ के बिजनेस डेवलपमेंट प्रमुख
यह बदलाव का वाहन है। यह भारत में समाज का चेहरा बदल देगी।—श्रवण गर्ग, भास्कर प्रकाशन समूह
ISBN: 9789350480328
Pages: 152
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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सन् 1868 में जमशेतजी टाटा ने एक व्यापारिक कम्पनी की शुरुआत की तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वे आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा में नए अध्याय की शुरुआत कर रहे हैं। जमशेतजी के सामने यह स्पष्ट था कि भारत के औद्योगिक विकास के लिए तीन घटक सबसे महत्त्वपूर्ण हैं : पहला इस्पात, दूसरा हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर और तीसरा तकनीकी शिक्षा और शोध। आज लगभग डेढ़ सदी बाद टाटा परिवार दावा कर सकता है कि उन्होंने अपने संस्थापक के सपनों को पूर्णतया साकार किया है।
लेकिन सफलता की यह मंज़िल आसान नहीं रही है। इस पुस्तक में पहली बार हम जान पाते हैं कि 1992 के आर्थिक सुधारों के बाद, कम्पनी ने किस प्रकार अपना रास्ता बनाया। पुस्तक का उपसंहार स्वयं रतन टाटा ने लिखा है और इसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से, सहकर्मियों के प्रतिरोध समेत, उन तमाम कठिनाइयों के बारे में बताया है जिनका सामना उन्हें नई परिस्थितियों के अनुसार ढलने में करना पड़ा।
यह बहुपठित और बहुचर्चित पुस्तक हमें विस्तार से बताती है कि भारतीय राष्ट्र के निर्माण में, न सिर्फ़ उद्यमी के रूप में बल्कि फैक्टरी सुधारों, श्रम एवं सामाजिक कल्याण, औषधीय शोध, उच्च-शिक्षा, संस्कृति-कला और ग्रामीण विकास आदि क्षेत्रों में अपने योगदान के रूप में भी टाटा ने कितनी अहम भूमिका निभाई है।
Yes Mr. Finance Minister
- Author Name:
Prakash Biyani
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- Description: Awating description for this book
Unchi Udan
- Author Name:
Kusum Lunia
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डॉ. कुसुम लुनिया का नाटक ‘ऊँची उड़ान’ कितना मार्मिक है, इसका अनुमान आप इसी तथ्य से लगा सकते हैं कि इसकी भूमिका लिखने के लिए जब मैंने इसे पढ़ा तो तीन-चार बार मेरी आँखों में आँसू छलक आए। कन्या भ्रूण-हत्या जैसे शुष्क और समाज-सुधार सम्बन्धी विषय पर कोई नाटक हो और उसे भी देखना नहीं, पढ़ना हो तो वह अपने आप में चुनौती भरा काम है लेकिन इस नाटक के कथानक, पात्रों, कथनोपकथनों और जिज्ञासा ने मुझे इस क़दर बाँधे रखा, जैसे किसी महान साहित्यकार की रचना बाँधे रखती है।
मैं सोचता रहा कि यदि ‘ऊँची उड़ान’ का कोई श्रेष्ठ मंचन कर सके तो इस नाटक को देश में लाखों दर्शक मिल सकते हैं। यह अकेला नाटक लोगों को भ्रूण-हत्या से विरत करने में वह भूमिका अदा कर सकता है जो साधु-संतों और समाज-सुधारकों के सैकड़ों-सैकड़ों उपदेश नहीं कर सकते। वास्तव में कुसुम जी ने समाज-सुधारकों के हाथों में एक ब्रह्मास्त्र थमा दिया है।
यह नाटक यों तो भ्रूण-हत्या पर केन्द्रित है लेकिन इसमें स्त्री-शक्ति का चमत्कारी रूप प्रकट हुआ है। संकल्प, संस्कार और चरित्र-बल के आधार पर कोई स्त्री कहाँ से कहाँ पहुँच सकती है, यह इस नाटक से पता चलता है। जिस भ्रूण की हत्या का आयोजन किया जा रहा था, उसकी रक्षा के बाद वही भ्रूण कैसा दिव्य, कैसा भव्य और कैसा काम्य स्वरूप धारण करता है, इसका जीवन्त और प्रेरक चित्रण कुसुम जी ने अपनी कृति में किया है। भ्रूण-हत्या जैसे दुखद प्रसंग को प्रतिभाशाली लेखिका ने सुखान्त नाटक का रूप देने में जो सफलता अर्जित की है, वह दुर्लभ है।
—वेद प्रताप वैदिक
Prabandhan Ke Sur Gandhi ke Gur
- Author Name:
Vijay Joshi
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गांधी का जीवन आत्म-अनुशासन, नैतिक साहस, मितव्ययिता, दूरदर्शिता, कुशल नेतृत्व, निर्णय-क्षमता तथा कर्म और विचारों के सन्तुलन का अद्भुत उदाहरण है। इस पुस्तक में पहली बार उनके इन जीवन-मूल्यों को आधुनिक प्रबन्धन-प्रणाली से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
प्रबन्धन को चालाकी-चतुराई की कला बताने के बजाय यह पुस्तक आन्तरिक सफ़ाई और उस कर्म-निष्ठा के बारे में बताती है जो प्रबन्धन-कार्य को एक सामाजिक तथा सर्वजनहिताय कार्य में बदल सकती है।
गांधी जी के जीवन के प्रेरक घटनाओं का विवरण देते हुए लेखक उनमें छिपी उन शिक्षाओं को रेखांकित करता चलता है जो आज हमें एक अच्छा व्यक्ति, अच्छा कर्मचारी और सक्षम प्रबन्धक बनने में मदद कर सकती हैं। सच्चाई, स्वावलम्बन, सेवाभाव, अनासक्ति, समानता के प्रति आग्रह, सद्-आचरण, मितव्ययिता, किसी भी कार्य की सांगोपांग जानकारी, उपदेश के बजाय कर्म को अहमियत देना, स्पष्ट संवाद, विनम्रता, निर्बलों की पक्षधरता और अनुशासन—ये सभी ऐसे मूल्य हैं जिन्हें अपने व्यवहार में लेकर हम अपनी प्रबन्धन-क्षमता को कई गुणा बढ़ा सकते हैं।
विजय जोशी स्वयं एक सफल प्रबन्धक रहे हैं, और इस पुस्तक को उनके व्यावहारिक अनुभवों का सार भी माना जा सकता है।
Bolna To Hai
- Author Name:
Sheetla Mishra
- Book Type:

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यदि हमसे कहा जाए कि बोलिए मत, चुप रहिए तो हम कितनी देर तक चुप रह सकते हैं? और चुप होते ही हम पाएँगे कि हमारे अधिकांश काम भी ठप हो गए हैं। यानी, बोलना तो है ही। बोले बिना किसी का काम चलता नहीं। नींद के बाद बचे समय पर ज़रा ग़ौर कीजिए, पाएँगे कि ज़्यादातर वक़्त (75 प्रतिशत से भी ज़्यादा) हम, या तो, बोल रहे हैं या सुन रहे हैं। ज़रा सोचिए, कि जिस काम पर सबसे ज़्यादा समय ख़र्च कर रहे हों, यदि उसे बेहतर कर लें तो हमारे जीवन का अधिकांश भी बेहतर हो जाएगा। यानी, अपने बोलने और सुनने को बेहतर बनाना, जीवन को ठीक करने जैसा काम होगा, क्या नहीं?
दरअसल, चार मौलिक विधाएँ हैं—बोलना, सुनना, लिखना, पढ़ना। इनमें से लिखने-पढ़ने की तो हम औपचारिक शिक्षा पाते हैं, लेकिन बोलना-सुनना, आश्चर्यजनक रूप से, सिर्फ़ नक़ल और अनुकरण के हवाले हैं। बोलना-सुनना औपचारिक तरीक़े से सीखा और सुधारा जा सकता है, और इसी की पहली सीढ़ी है यह पुस्तक।
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