Alochak Aur Alochana
(0)
Author:
Bachchan SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
895
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पूर्व और पश्चिम के आलोचना सिद्धान्तों के बृहद् विवेचन के लिए ख्यात डॉ. बच्चन सिंह की यह कृति उनकी अपनी कुछ मूल्यवान स्थापनाओं के लिए भी पढ़ी जाती रही है। उनका मानना है कि पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों से हम अपनी समीक्षा-पद्धति का निर्माण नहीं कर सकते, लेकिन उनके सम्यक अध्ययन के बिना हम कुछ नवीन भी नहीं बना सकते। ‘आलोचक और आलोचना’ का उद्देश्य इसी अध्ययन को प्रस्तुत करना है। लेकिन केवल पश्चिमी सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं, भारतीय आलोचना-पद्धतियों और अवधारणाओं का भी। वे आरम्भ में ही स्पष्ट करते हैं कि किसी भी रचना को आप बाह्य उपकरणों या फार्मूलों से नहीं समझ सकते, न ही ऐसा करना उपादेय होगा। न तो अलंकारों की गणना को आलोचना कह सकते हैं और न ही सूरदास को पुष्टिमार्गी सिद्ध करना आलोचना है। उनके मुताबिक अपने समय की मानव-स्थितियों के सन्दर्भ में भाषा-संरचना का विश्लेषण करना ही आलोचना का काम है। ऐसी ही आधारभूत मान्यताओं के साथ चलते हुए लेखक ने इस कृति में पश्चिम के प्लेटो, अरस्तू, लोंगिनुस, आई.ए. रिचर्ड्स, क्रोचे आदि के साथ अलंकार, रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि भारतीय आलोचना-सिद्धान्तों की सुग्राह्य विवेचना की है जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी व आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि के विश्लेषण तक जाती है। साहित्य के अध्येताओं और छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
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पूर्व और पश्चिम के आलोचना सिद्धान्तों के बृहद् विवेचन के लिए ख्यात डॉ. बच्चन सिंह की यह कृति उनकी अपनी कुछ मूल्यवान स्थापनाओं के लिए भी पढ़ी जाती रही है। उनका मानना है कि पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों से हम अपनी समीक्षा-पद्धति का निर्माण नहीं कर सकते, लेकिन उनके सम्यक अध्ययन के बिना हम कुछ नवीन भी नहीं बना सकते।
‘आलोचक और आलोचना’ का उद्देश्य इसी अध्ययन को प्रस्तुत करना है। लेकिन केवल पश्चिमी सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं, भारतीय आलोचना-पद्धतियों और अवधारणाओं का भी।
वे आरम्भ में ही स्पष्ट करते हैं कि किसी भी रचना को आप बाह्य उपकरणों या फार्मूलों से नहीं समझ सकते, न ही ऐसा करना उपादेय होगा। न तो अलंकारों की गणना को आलोचना कह सकते हैं और न ही सूरदास को पुष्टिमार्गी सिद्ध करना आलोचना है। उनके मुताबिक अपने समय की मानव-स्थितियों के सन्दर्भ में भाषा-संरचना का विश्लेषण करना ही आलोचना का काम है।
ऐसी ही आधारभूत मान्यताओं के साथ चलते हुए लेखक ने इस कृति में पश्चिम के प्लेटो, अरस्तू, लोंगिनुस, आई.ए. रिचर्ड्स, क्रोचे आदि के साथ अलंकार, रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि भारतीय आलोचना-सिद्धान्तों की सुग्राह्य विवेचना की है जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी व आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि के विश्लेषण तक जाती है।
साहित्य के अध्येताओं और छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
Book Details
-
ISBN9789348157089
-
Pages272
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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"प्रस्तुत पुस्तक में संसार के ऐसे ही विचित्र पेड़-पौधों के बारे में रोचक एवं ज्ञान-वर्धक जानकारी संकलित की गई है। रोचकता इसका प्राण है और ज्ञान-वर्धक इसका गुण। पुस्तक में पेड़-पौधों की आश्चर्यजनक बातों के साथ-साथ उनके जन्म-स्थान, मानव जीवन में उनके महत्त्व तथा यथासंभव उनके उपलब्ध चित्र दिए गए हैं। आशा है यह रोचक एवं ज्ञान-वर्धक रचना सभी वर्ग के पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। "
Nootan Sadi Ke Navneet Shriguruji
- Author Name:
Dr. Dhananjay Giri
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी द्वैत भी हैं, अद्वैत भी हैं। शैव भी हैं, शाक्त भी हैं। करुणा भी हैं और क्रांति भी हैं। ज्ञान भी हैं और कर्म भी हैं। साधना भी हैं और संघर्ष भी हैं। सपने भी हैं और सत्य भी हैं। श्रीगुरुजी धर्म और अध्यात्म की सामासिक अभिव्यक्ति हैं। परंपरा और प्रगति के प्रेरणापुंज हैं। उनका धर्म-कर्म, पूजा-पाठ केवल पौरोहित-प्रकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्र-यज्ञ में जीवन को समिधा बना देने की संकल्प-साधना है। उनकी साधना इतिहास का एक सुंदरकांड है। संघ-कार्य की नींव संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने डाली, संघ को गढ़ा श्रीगुरुजी ने; डॉ. हेडगेवार ने संघ को सांगठनिक सूत्र दिया, शाखा-पद्धति दी, श्रीगुरुजी ने संघ को सिद्धांत और विस्तार दिया। आज संघ एक विराट् संगठन बन गया है; भारत का एक नियामक तत्त्व बन गया है। इसे नकारकर देश और समाज-जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है—संघ के इस स्थिति में पहुँचने में श्रीगुरुजी की दूरदृष्टि और आध्यात्मिकता की विशेष भूमिका है। श्रीगुरुजी भाव के वो सागर हैं, जहाँ भाव की हर नदी आकर विलीन हो जाती है; सारी भावनाएँ जहाँ अभिव्यक्त हो जाना चाहती हैं, जहाँ सारे संपर्क, संबंध और संबोधन आकर मिल जाते हैं। यह पुस्तक ऐसे आध्यात्मिक शिखरपुरुष, समाजधर्मी और पथ-प्रदर्शक श्रीगुरुजी के प्रेरणाप्रद जीवन की एक झलक मात्र है।
Atma Nirbhar Bharat : Vol. 3
- Author Name:
M. Veerappa Moily
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भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास पर केन्द्रित वीरप्पा मोइली की पुस्तक श्ाृंखला का यह तीसरा खंड भारत के ऊर्जा-क्षेत्रा पर केन्द्रित है। देश को अधिकाधिक ऊर्जा-श्रम बनाने की योजनाओं, इस क्षेत्रा में जारी सुधारों और इस क्रम में सामने आ रही चुनौतियों को रेखांकित करते हुए यह पुस्तक ऊर्जा-संसाधनों के नियोजन, प्रबन्धन और विकास की सम्भावनाओं पर प्रकाश डालती है।पुस्तक की विशेष उपलब्धि यह है कि इसमें ऊर्जा क्षेत्रा की मौजूदा और जमानों से चली आ रही खामियों और चुनौतियों के साथ-साथ उन प्रश्नों पर भी नजर डाली गई है जो भविष्य में हमारे सामने आ सकते हैं और जिनके लिए हमें आज ही तैयारी करनी होगी। साथ ही उन सम्भावनाओं की तरफ भी यह पुस्तक इशारा करती है जो इस क्षेत्रा में हमारे सामने मौजूद हैं। लेखक के अनुसार, ‘सबके लिए ऊर्जा’ के संकल्प पर कटिबद्ध भारत के लिए यह आवश्यक है कि नई तकनीकी के विकास के साथ-साथ नई नीतियों का भी निर्माण हो। भारत के ऊर्जा-कार्यक्रम को आकार देने में रुचि रखनेवाले प्रत्येक पाठक के लिए उपयोेगी यह पुस्तक अपनी सम्यक् दृष्टि और विहंगम सोच के चलते विशिष्ट है।
Yeh Ram Kaun Hai?
- Author Name:
Neerja Madhav
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एक तरफ एक विशाल भारतीय जन-समुदाय अयोध्या, काशी और मथुरा के मंदिरों को लेकर भावुक है, दूसरी तरफ सत्ताधारी वोट बटोरने के चक्कर में इन मंदिरों पर हुए बर्बर आक्रमण और ऐतिहासिक सत्य को सत्य कहने में भी हिचकिचा रहे हैं तथा अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के नाम पर एक चोट को सहला-सहला कर कैंसर में बदल देना चाहते हैं। पड़ोसी देशों में पुनरुद्धार या विकास के नाम पर धड़ाधड़ राम, कृष्ण एवं शिव मंदिरों को ढहाया जा रहा है। शीतला माता मंदिर या ढाकेश्वरी माता के मंदिरों का स्थानांतरण किया गया है। ऐसा नहीं कि ये हमले आज ही हो रहें हैं। दरअसल इन हमलों का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। ईश्वर, अल्लाह और गॉड को एक ही परम सत्ता के भिन्न-भिन्न नाम माननेवाला हिंदू अपनी उदारता और विश्वास की व्यापकता के कारण बहुदेववादी भी है, मूर्तिपूजक भी है और साथ ही परम सत्ता की मनोरम अभिव्यक्ति प्रकृति को भी उसी का एक रूप मान पूजता है। यह हिंदू आचार-विचार की व्यापकता है। कण-कण में व्याप्त एक अव्यक्त सत्ता।... मंत्रों और ऋचाओं की ऊर्जा से संपूरित मंदिर और मंदिर क्षेत्र ध्वस्तीकरण अथवा आक्रमण की बारंबारता के बिंदु बने।’’ —इसी संग्रह से ललित निबंधों के माध्यम से जन-जन के हृदय में बसे राम को देखने, जानने और अनुभव करने का एक सर्वथा अनूठा प्रयोग है यह पुस्तक, जो हर आयु वर्ग के पाठकों को समान रूप से रुचिकर लगेगी।
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