Khel Khel Mein Beeta Jeevan
(0)
Author:
Girish Karnad, Usharani RaoPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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गिरीश कारनाड आधुनिक भारत की महानतम सांस्कृतिक हस्तियों में से एक थे—एक कुशल अभिनेता, लीक से हटकर काम करने वाले निर्देशक, नवोन्मेषकारी प्रशासक, साफ़ सोच के धनी विचारक और एक असाधारण नाटककार। सार्वजनिक भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में वे एक ऐसे बुद्धिजीवी के रूप में जाने जाते रहे जिनका नैतिक कम्पास कभी नहीं डिगा। ‘खेल-खेल में बीता जीवन’ में वे अपने जीवन के पूर्वार्द्ध का वर्णन करते हैं। सिरसी में अपने बचपन और स्थानीय थिएटर से शुरुआती जुड़ाव से लेकर, धारवाड़, बॉम्बे और ऑक्सफ़ोर्ड में अपनी शिक्षा, पब्लिशिंग में अपने करियर, फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी सफलताओं और मुश्किलों, और अपने निजी और लेखकीय जीवन के बारे में वे इसमें बहुत गहरी संलग्नता के साथ लिखते हैं। भावप्रवण और दिलचस्प, गहरी समझ वाली और बेबाक, उनकी ये यादें एक महान जीनियस के जीवन को आकार देने वाले अनुभवों का अविस्मरणीय ख़ाका खींचती हैं। इसमें उस भारत की भी एक अनोखी झलक हमें मिलती है जिसमें वे रहते थे और काम करते थे। अपने सहपाठियों, सहकर्मियों, दोस्तों, साथी लेखकों-निर्देशकों और अन्य कला व्यक्तित्वों के बारे में भी उन्होंने इसमें गहन अन्तदृष्टि के साथ लिखा है, जिससे हमें उस दौर के सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश से अवगत होने का अवसर मिलता है।
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गिरीश कारनाड आधुनिक भारत की महानतम सांस्कृतिक हस्तियों में से एक थे—एक कुशल अभिनेता, लीक से हटकर काम करने वाले निर्देशक, नवोन्मेषकारी प्रशासक, साफ़ सोच के धनी विचारक और एक असाधारण नाटककार। सार्वजनिक भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में वे एक ऐसे बुद्धिजीवी के रूप में जाने जाते रहे जिनका नैतिक कम्पास कभी नहीं डिगा।
‘खेल-खेल में बीता जीवन’ में वे अपने जीवन के पूर्वार्द्ध का वर्णन करते हैं। सिरसी में अपने बचपन और स्थानीय थिएटर से शुरुआती जुड़ाव से लेकर, धारवाड़, बॉम्बे और ऑक्सफ़ोर्ड में अपनी शिक्षा, पब्लिशिंग में अपने करियर, फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी सफलताओं और मुश्किलों, और अपने निजी और लेखकीय जीवन के बारे में वे इसमें बहुत गहरी संलग्नता के साथ लिखते हैं।
भावप्रवण और दिलचस्प, गहरी समझ वाली और बेबाक, उनकी ये यादें एक महान जीनियस के जीवन को आकार देने वाले अनुभवों का अविस्मरणीय ख़ाका खींचती हैं। इसमें उस भारत की भी एक अनोखी झलक हमें मिलती है जिसमें वे रहते थे और काम करते थे।
अपने सहपाठियों, सहकर्मियों, दोस्तों, साथी लेखकों-निर्देशकों और अन्य कला व्यक्तित्वों के बारे में भी उन्होंने इसमें गहन अन्तदृष्टि के साथ लिखा है, जिससे हमें उस दौर के सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश से अवगत होने का अवसर मिलता है।
Book Details
-
ISBN9789349159501
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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जीते जी इलाहाबाद सिर्फ संस्मरणात्मक कृति नहीं है, एक यात्रा है जिसमें हमें अनेक उन लोगों के शब्दचित्र मिलते हैं जिनके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता और जो उस समय के इलाहाबाद के मन-प्राण होते थे।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
- Author Name:
Safia Akhtar
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जाँ निसार अख़्तर और उनकी शरीके-हयात सफ़िया अख़्तर को साथ रहने का मौक़ा बहुत कम मिला। उस ज़माने में जब औरतों के लिए घर से बाहर जाकर काम करना बहुत आम बात नहीं थी, वे स्कूल में अपनी नौकरी करती रहीं और न सिर्फ़ अपनी और अपने बच्चों, बल्कि मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी ज़मीन तलाश रहे जाँ निसार साहब के लिए भी सम्बल जुटाती रहीं।
ये ख़त उन्होंने इसी संघर्ष के दौरान लिखे, लेकिन ये ख़त सिर्फ़ उनके हाल-अहवाल की सूचना-भर नहीं देते, बल्कि वे एक बड़े सृजक की क़लम से उतरे शाहकार की तरह हमारे सामने आते हैं। ज़िन्दगी उन्हें कुछ और वक़्त देती तो निश्चय ही वे साहित्य की दुनिया को कुछ बड़ा देकर जातीं। इन ख़तों में उनकी मुहब्बत और हिम्मत के साथ-साथ उनकी और बेशक जाँ निसार अख़्तर की ज़िन्दगी खुलती जाती है, साथ ही उनका अपना दौर भी अपने तमाम स्याह-सफ़ेद के साथ रौशन होता जाता है। ये ख़त प्यार और हौसले से भरे एक दिल की अक़्क़ासी करते हैं। ये जादू की तरह असर करते हैं; इनका बेहद ताक़तवर और सधा हुआ ‘प्रोज़’ कहीं आपको रुकने नहीं देता, और इनकी तुर्श मिठास में डूबे-डूबे बारहा आपकी आँखें भर आती हैं।
उनके निधन के बाद जाँ निसार साहब ने उनके इन ख़तों को दो जिल्दों में प्रकाशित कराया—’हर्फ़े-आश्ना’ और ‘ज़ेरे-लब’। इस किताब में इन दोनों जिल्दों में संकलित ख़तों को दे दिया गया है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
Safia Akhtar
20% off₹ 199
₹ 159.2
Available
Yugon Ka Yatri : Nagarjun Ki Jeewani
- Author Name:
Taranand Viyogi
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मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। ‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
Sutradhar
- Author Name:
Sanjeev
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अपनी रचनात्मक ज़मीन और लेखकीय दायित्व की तलाश करते हुए एक ईमानदार लेखक प्रायः स्वयं को भी रचने की कोशिश करता है। अनुपस्थित रहकर भी वह उसमें उपस्थित रहता है; और सहज ही उस देश-काल को लाँघ जाता है जो उसे आकार देता रहा है। समकालीन कथाकारों में संजीव की मौजूदगी को कुछ इसी तरह देखा जाता है। आकस्मिक नहीं कि हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा को उन्होंने लगातार आगे बढ़ाया है। ‘सूत्रधार’ संजीव का नया उपन्यास है, और उनकी शोधपरक कथा-यात्रा में नितान्त चुनौतीपूर्ण भी। केन्द्र में हैं भोजपुरी गीत-संगीत और लोकनाट्य के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर। वही भिखारी ठाकुर, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा था और उनके अभिनन्दनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ़ यही थे? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे बड़े के समकक्ष नहीं हो सकता। और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था, जिसे इस उपन्यास में संजीव ने उन्हीं के आत्मद्वन्द्व से गुज़रते हुए चित्रित किया है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूपछाँही कथा-यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी-साथियों के अन्तर्बाह्य संघर्ष को महसूस करते हुए करते हैं। काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं। न कोई ज़रूरत। ज़रूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मकता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारत हासिल है। यही कारण है कि ‘सूत्रधार’ की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे-बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं। उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से सम्बलित है; और उसमें न सिर्फ़ उनकी, बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविध विडम्बनाएँ भी समाई हुई हैं। अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अन्त तक भिखारी ही बने रहते हैं तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है। कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित-जाग्रत् पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित-विमर्श को भी एक नई ज़मीन देता है। तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रससिक्त और आत्मीय संवाद किया है। —रामकुमार कृषक
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