Yugon Ka Yatri : Nagarjun Ki Jeewani
(0)
Author:
Taranand ViyogiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। ‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
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मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे।
तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं।
बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता।
‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है।
—वाचस्पति, वाराणसी
(दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
Book Details
-
ISBN9789388933759
-
Pages430
-
Avg Reading Time14 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: क्यूबा की क्रान्ति का पैरा-दर-पैरा इतिहास बतानेवाली इस पुस्तक के केन्द्र में फ़िदेल कास्त्रो का जीवन है। वही फ़िदेल कास्त्रो जो आज पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद-विरोध का प्रतीक बन चुके हैं। मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में मुट्ठी-भर साथियों को लेकर और बिना किसी बाहरी मदद के फ़िदेल कास्त्रो ने क्यूबा के तानाशाह बतिस्ता और उसके पोषक अमेरिकी साम्राज्यवाद को सदा-सदा के लिए क्यूबा से विदा कर दिया था। क्यूबा के शोषित-पीड़ित किसानों, मज़दूरों को क्रान्तिकारी योद्धाओं में बदलने वाले और अपने देश को सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों पर एक बेहतर राष्ट्र के रूप में विकसित करनेवाले फ़िदेल कास्त्रो ने अन्तरराष्ट्रीयता की नई परिभाषाएँ गढ़ीं और समूची दुनिया को हर तरह की विषमता से मुक्त करने का एक बड़ा सपना देखा। आज इस सपने को विश्व का हर वह इनसान अपने दिल के क़रीब महसूस करता है जो इस दुनिया को मनुष्य के भविष्य के लिए एक सुरक्षित आवास में बदलना चाहता है। लेखक के व्यापक शोध और गहरी प्रतिबद्धता से उपजी यह पुस्तक न सिर्फ़ फ़िदेल के जीवन, बल्कि क्यूबा तथा शेष विश्व की उन राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों का भी तथ्याधारित विवरण देती है जिसके बीच फ़िदेल का उद्भव हुआ और क्यूबा-क्रान्ति सम्भव हुई। साथ ही इसमें क्रान्ति की प्रेरक उस विचार-निधि को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है जिसके कारण फ़िदेल का सपना, पहले क्यूबा और फिर दुनिया के हर न्यायप्रिय व्यक्ति का संकल्प बना। इस पुस्तक में हमें फ़िदेल के सबसे भरोसेमन्द साथी चे गुएवारा को भी काफ़ी नज़दीक से जानने का मौक़ा मिलता है जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य दुनिया में जहाँ भी साम्राज्यवाद है, उसके विरुद्ध संघर्ष करना था, और अल्प आयु में ही जीवन बलिदान करने के बावजूद जो आज हर जागरूक युवा हृदय में जीवित हैं।
Guru Ghasidas
- Author Name:
Dr. Baldev +2
- Book Type:

- Description: जिस समय छत्तीसगढ़ की जनता भोंसलों के अत्याचार और अंग्रेज़ों की कुटिलता से जूझ रही थी, उसी समय गुरु घासीदास का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था। वे भूख से मरने और बेगार करने के लिए अभिशापित थे, परन्तु उनमें सा हस, सद्बुद्धि और संघर्ष के लिए जन्मजात ज्ञान था। इसलिए बचपन में वे अपने साथियों को सत्य और अहिंसा की पहचान करा सके। गुरु घासीरास ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति को स्वयं या परिवार के किसी सदस्य के भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए न लगाकर मानवता के कल्याण के लिए युग-युग से पीड़ित-शोषित जन के लिए लगाया। उन्हें रूढ़ियों से मुक्त किया। चोरी, हिंसा, मद्यपान, जिसमें यह समाज डूब चुका था, जैसी कुरीतियों को पाप बतलाकर जीवनमात्र के लिए दया और प्रेम की शिक्षा दी। सत्य, अहिंसा, समानता का पाठ पढ़ाकर उन्हें कृषि तथा गो-पालन के लिए उत्प्रेरित किया। इस प्रकार देखते हैं कि पं. सुन्दर लाल शर्मा, महात्मा गांधी और बाबा साहेब अम्बेडकर के पूर्व ही उन्होंने सतनाम पंथ की स्थापना कर अपने शिष्यों को स्वावलम्बन और स्वतंत्रता का पाठ सिखला दिया था। सतनाम पंथ एक विचारधारा है जिसका सीधा सम्बन्ध उपनिषदों के एकेश्वरवाद और भगवान् बुद्ध की करुणा से है। छत्तीसगढ़ में शोषित-पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए गुरु घासीदास ने कठिन तपस्या की, सत् पुरुष का दर्शन किया और उन्हीं के आदेश पर अपने अनुयायियों को उनका दिव्य सन्देश दिया, जो प्राणिमात्र के लिए अत्यन्त कल्याणकारी है। यह पुस्तक गुरु घासीदास के जीवन और दर्शन का विस्तृत और प्रामाणिक परिचय देती है।
From Hampi to Harappa
- Author Name:
Tirumala Ramachandra +1
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- Book Type:

- Description: "From Hampi to Harappa" is considered among the top ten Telugu autobiographies of the twentieth century. Ramachandra's honesty, self-reflection, and the conflict between his traditional Vaishnava beliefs and modern education make this book remarkable. During the nationalist struggle, he was attracted to extremist ideas but found his own path again through personal struggles. It's astonishing that someone who was a great scholar in Sanskrit, Telugu, Kannada, and Prakrit, had to experience hunger and travel across India to find work to feed himself in the 1930s and 40s. The book is filled with unbelievable incidents, such as his mentor Veturi Prabhakara Sastry experiencing extreme hunger while the author survived on very little food. Similarly, he survived on Ganga water for almost a month while waiting in Kanpur for a conman who had promised a business partnership. He did a variety of jobs, including working as a cataloguer in manuscript libraries, a hotel worker, and a Havaldar clerk in the military, before finally settling in a newspaper. Through his experiences, Ramachandra provides us with glimpses of the civilizations around Hampi and Harappa and insights into modern India during the Independence Movement.
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