Hasan Shah

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हसन शाह के जीवन से जुड़ी कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। चूँकि ‘नश्तर’ एक आत्मकथात्मक रचना है, इसलिए उन्हीं के अनुसार उनके पूर्वज उत्तर मुग़ल काल में ही यमन से मध्य एशिया होते हुए भारत आ गए थे। उनका पूरा नाम सैयद हसन शाह था और वे मिंग नामक एक अंग्रेज़ अफ़‍सर के यहाँ मुंशी थे। मिंग और कल्लन साहब सम्भवत: मैनिंग (Manning) और कॉलिंस (Collins) थे। हसन शाह की सूचना के अनुसार मिंग साहब सर आयर कूट (Eyre Coote) के भांजे थे और कानपुर में रहते थे। कानपुर उन दिनों अंग्रेज़ों की छावनी बन चुका था। हसन शाह ने लगभग 20 वर्ष की उम्र में ‘नश्तर’ की रचना की थी। हिजरी सन् 1205 यानी सन् 1790 ई. में। यह भी पता चलता है कि कालान्तर में उन्होंने कानपुर छोड़ दिया था और लखनऊ जाकर बस गए थे। वहाँ वे उस समय के प्रसिद्ध शाइर ‘जुर्रत’ के शिष्य हो गए थे। सम्भवत: उन्होंने कभी विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन किसी सूफ़ी सन्त की तरह बिताया। एक जानकारी और मिलती है कि 1883 ई. में अपने छोटे भाई हुसैन शाह के निधन के समय हसन शाह जीवित थे।

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