Bhasha Ki Rajneeti, Gyan Ki Parampara
(0)
Author:
Shubhneet KaushikPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
पिछले दो-तीन दशकों में हिन्दी नवजागरण और हिन्दी-नागरी आन्दोलन पर केन्द्रित अध्ययनों ने हिन्दी लोकवृत्त की हमारी समझ को निश्चित ही समृद्ध किया है। लेकिन जहाँ तक हिन्दी के भाषाई संगठनों का सवाल है तो ये अध्ययन हिन्दीभाषी क्षेत्र के इन भाषाई संगठनों के समूचे वजूद को प्रायः भाषायी राजनीति के चश्मे से ही देखते हैं। कहना न होगा कि ऐसा कोई भी मूल्यांकन उन भाषायी संगठनों की बहुआयामी गतिविधियों के आकलन का एक संकीर्ण और सीमित नजरिया है। ऐसे मूल्यांकनों में इन भाषायी संगठनों की वह भूमिका परिदृश्य से ओझल हो जाती है, जो वे हिन्दी लोकवृत्त में ज्ञानोत्पादन की प्रक्रिया में निभा रहे थे। इसलिए मौजूदा पुस्तक में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का इतिहास लिखते हुए उसे सिर्फ भाषा की राजनीति या हिन्दी-नागरी आन्दोलन में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की भूमिका तक ही सीमित नहीं किया गया है, बल्कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन की बहुआयामी गतिविधियों और हिन्दी लोकवृत्त में ज्ञान के सृजन में सम्मेलन के योगदान को समग्रता से विश्लेषित करने का प्रयास भी इसमें हुआ है।</p> <p>‘भाषा की राजनीति, ज्ञान की परम्परा’ एक संस्था के रूप में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इतिहास को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें हिन्दी लोकवृत्त के निर्माण में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की भूमिका और उसके योगदान का विस्तृत विश्लेषण तो हुआ ही है। साथ ही, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के स्थापना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसकी शुरुआती गतिविधियों, सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशनों, सम्मेलन द्वारा कराई जाने वाली परीक्षाओं और उसके प्रकाशनों की चर्चा भी इस पुस्तक में विस्तार से की गई है। हिन्दी-नागरी आन्दोलन से सम्बद्ध अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर सम्मेलन ने कैसे काम किया, इसका विश्लेषण भी इसमें हुआ है। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भाषा की राजनीति ने कैसे करवट ली और हिन्दी साहित्य सम्मेलन की इसमें क्या भूमिका रही, इतिहास-लेखन के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य सम्मेलन और उससे जुड़े विद्वानों और इतिहासकारों के मत और उनके योगदान की पड़ताल के साथ ही हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखन के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के योगदान को भी इस पुस्तक में विश्लेषित किया गया है.
Read moreYou pay ₹999/Year
You will be auto-charged ₹999 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Prime Plus
Author-signed copy
25% off on all MRP of books
Book Recomendation Per Year
Delivery is free for the entire year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
पिछले दो-तीन दशकों में हिन्दी नवजागरण और हिन्दी-नागरी आन्दोलन पर केन्द्रित अध्ययनों ने हिन्दी लोकवृत्त की हमारी समझ को निश्चित ही समृद्ध किया है। लेकिन जहाँ तक हिन्दी के भाषाई संगठनों का सवाल है तो ये अध्ययन हिन्दीभाषी क्षेत्र के इन भाषाई संगठनों के समूचे वजूद को प्रायः भाषायी राजनीति के चश्मे से ही देखते हैं। कहना न होगा कि ऐसा कोई भी मूल्यांकन उन भाषायी संगठनों की बहुआयामी गतिविधियों के आकलन का एक संकीर्ण और सीमित नजरिया है। ऐसे मूल्यांकनों में इन भाषायी संगठनों की वह भूमिका परिदृश्य से ओझल हो जाती है, जो वे हिन्दी लोकवृत्त में ज्ञानोत्पादन की प्रक्रिया में निभा रहे थे। इसलिए मौजूदा पुस्तक में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का इतिहास लिखते हुए उसे सिर्फ भाषा की राजनीति या हिन्दी-नागरी आन्दोलन में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की भूमिका तक ही सीमित नहीं किया गया है, बल्कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन की बहुआयामी गतिविधियों और हिन्दी लोकवृत्त में ज्ञान के सृजन में सम्मेलन के योगदान को समग्रता से विश्लेषित करने का प्रयास भी इसमें हुआ है।</p>
<p>‘भाषा की राजनीति, ज्ञान की परम्परा’ एक संस्था के रूप में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इतिहास को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें हिन्दी लोकवृत्त के निर्माण में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की भूमिका और उसके योगदान का विस्तृत विश्लेषण तो हुआ ही है। साथ ही, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के स्थापना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसकी शुरुआती गतिविधियों, सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशनों, सम्मेलन द्वारा कराई जाने वाली परीक्षाओं और उसके प्रकाशनों की चर्चा भी इस पुस्तक में विस्तार से की गई है। हिन्दी-नागरी आन्दोलन से सम्बद्ध अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर सम्मेलन ने कैसे काम किया, इसका विश्लेषण भी इसमें हुआ है। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भाषा की राजनीति ने कैसे करवट ली और हिन्दी साहित्य सम्मेलन की इसमें क्या भूमिका रही, इतिहास-लेखन के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य सम्मेलन और उससे जुड़े विद्वानों और इतिहासकारों के मत और उनके योगदान की पड़ताल के साथ ही हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखन के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के योगदान को भी इस पुस्तक में विश्लेषित किया गया है.
Book Details
-
ISBN9789360863517
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Janane ki Batein (Vol. 10)
- Author Name:
Deviprasad Chattopadhyay +1
- Book Type:

- Description:
Janane ki Batein (Vol. 10) about Social Studies
Ram Manohar Lohiya : Bharat Ki Himalay Niti
- Author Name:
Ashok Pankaj
- Book Type:

- Description:
लोहिया पूछते हैं कि 'हिमालय भारत का संतरी है' यह ख्याल कहाँ से आया? जिस हिमालय का भारत के लिए चातुर्दिक महत्त्व है क्या उसको लेकर भारत की कोई नीति है? तिब्बत का जितना गहरा संबंध भारत से रहा है क्या उसी तरह के संबंध उसके चीन से रहें हैं? नेपाल, भूटान जिसे उन्होंने 'भाई हिमालय' कहा है, के साथ भारत के संबंधों का आधार क्या होना चाहिए? तिब्बत में स्थित कैलाश-मानसरोवर किसकी विरासत है? भारत-चीन संबंधों का आधार और समझने का दृष्टिकोण क्या होना चाहिए? एशिया की दो पुरातन सभ्याताएँ जो आज दो विभिन्न प्रणालियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, और जिनकी प्रतिस्पर्द्धात्मक महत्त्वकांक्षाएँ हैं, में सामंजस्य कैसे हो ? इन प्रश्नों का उत्तर लोहिया भारत की हिमालय नीति के माध्यम से देते हैं और इसी क्रम में भारत की विदेश एवं रक्षा नीति को लेकर कुछ स्थूल सिद्धांत देते हैं, जिसके कुछ सूत्र को 'बांह और मुट्ठी', 'कबूतर एवं बाज' की उपमा से भी स्पष्ट करते हैं। लोहिया नीतिगत परामर्श देते हैं कि, भारत को इतिहास की गलतियों से सबक सीखना चाहिए और अपनी अंदरूनी कमजोरियों को भी दुरुस्त करना चाहिए। इसी क्रम में वे एक ओर शिवाजी और प्रताप को पुकारते हैं तो दूसरी ओर गांधी को ही गुरू मानते हैं। क्या भारत लोहिया के विचारों से कुछ सीख ले सकता है? यही इस पुस्तक की मूल भावना है।
Rashtra Nirman Mein Adivasi By Dr. Jitendra Meena
- Author Name:
Dr. Jitendra Meena
- Book Type:

- Description:
*राष्ट्र-निर्माण में आदिवासी* लेखक: डॉ. जितेंद्र मीणा यह पुस्तक उनके लिए है: जो इतिहास को सिर्फ विजेताओं की कथा नहीं मानते जो भारत की सामूहिक स्मृति में आदिवासियों की उपस्थिति दर्ज करना चाहते हैं जो वैकल्पिक और समावेशी विमर्श की तलाश में हैं *"इतिहास में किसी को नज़रअंदाज़ करना, वर्तमान में उसकी हिस्सेदारी छीनने का सबसे महीन तरीका होता है।"* यह पुस्तक उसी ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त हस्तक्षेप है- जो सदियों से भारत के आदिवासी समुदायों के साथ होता आया है। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक फैले इन समुदायों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सबसे शुरुआती और सबसे दीर्घकालिक विद्रोह किए, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। ‘राष्ट्र-निर्माण में आदिवासी’ सिर्फ एक इतिहास पुस्तक नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा है जो हमें भारत के भूले-बिसरे जननायकों से मिलवाती है। यह किताब पूछती है- क्यों आदिवासी विद्रोह, बलिदान और संघर्ष हमारी ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा नहीं बन सके? लेखक डॉ. जितेंद्र मीणा इतिहास के प्रोफ़ेसर और सामाजिक विमर्शकार हैं। उन्होंने प्रमाणों और वैकल्पिक इतिहास दृष्टि से भारत के हर हिस्से से आदिवासी संघर्ष की बहुरंगी छवियाँ प्रस्तुत की है। यह पुस्तक न केवल पाठकों को एक भुला दिए गए इतिहास से जोड़ती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आदिवासी भारत के राष्ट्र-निर्माण में कैसे केंद्रीय भूमिका निभाते रहे हैं।
Rashtra Nirman Mein Adivasi By Dr. Jitendra Meena
Dr. Jitendra Meena
17% off₹ 249
₹ 206.67
Available
Bolna Hi Hai
- Author Name:
Ravish Kumar
- Book Type:

- Description:
रवीश कुमार की यह किताब ‘बोलना ही है’ इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर संवाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई है और इससे देश में नफ़रत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है। कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मज़बूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं। इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज़ है जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है। हिन्दी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेज़ी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है।
Man-Man Ke Sawal
- Author Name:
Narendra Dabholkar +4
- Book Type:

- Description:
मनोविकार एक ऐसा विषय है जिसको लेकर भारतीय समाज में कई तरह के अन्धविश्वास व्याप्त हैं। मानसिक बीमारियाँ भी शरीर की अन्य व्याधियों की ही तरह होती हैं, इस तथ्य को आज भी भारत के लोग स्वीकार नहीं कर पाते। शिक्षित समाज का व्यवहार भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है। पहले तो वे हर मनोविकार को पागलपन से जोड़ देते हैं, और इसे छिपाने की कोशिश करने लगते हैं। दूसरे ऐसे अनेक मनोरोग जो व्यक्ति के जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव डालते रहते हैं, उन्हें इलाज के योग्य ही नहीं माना जाता। यही वजह है कि हमारे यहाँ मनोरोग-विशेषज्ञों की भी भारी कमी है, और उनके स्थान पर झाड़-फूँक और गंडा-ताबीज का बोलबाला है।
अपने मौजूदा हालात से सामंजस्य न बिठा पाने की स्थिति को मानसिक तनाव कहा जाता है, इस परिभाषा की रोशनी में देखें तो हमारे आसपास कोई भी ऐसा नहीं है जो आज की बदलती हुई सामाजिक-पारिवारिक-नैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते तनाव से पूरी तरह मुक्त हो। तनाव की शुरुआती अवस्थाओं से लेकर सिज़ोफ्रेनिया और पागलपन तक मनोविकारों की एक लम्बी शृंखला होती है। इसलिए यह जरूरी है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और तनाव कम करने की आध्यात्मिक विधियाँ बेचनेवाले गुरुओं और बाबाओं की शरण में जाने के बजाय इसे वैज्ञानिक ढंग से देखा-समझा जाए।
तार्किक जीवन-पद्धति के जुझारू पैरोकार नरेंद्र दाभोलकर की यह पुस्तक इसी विषय पर केन्द्रित है। इस पुस्तक का लेखन उन्होंने मनोविकार विशेषज्ञ हमीद दाभोलकर के साथ संयुक्त रूप से किया है। इस तरह एक तरफ़ जहाँ हम इसमें मानसिक विकारों की संरचना का वैज्ञानिक परिचय पाते हैं, वहीं भारतीय समाज में मनोरोगों को लेकर जो धार्मिक-सामाजिक और आध्यात्मिक अन्धविश्वास व्याप्त हैं, उनकी विसंगतियों को भी समझ पाते हैं। साथ ही मनोविकारों और उनके उपचार, मन के व्यवहार, बच्चों और स्त्रियों के मनोविकार तथा व्यसनों से जुड़े मानसिक दोषों को भी तर्कसंगत रूप में यहाँ विश्लेषित किया गया है?
Gatiman Bharat
- Author Name:
K.J. Alphons +1
- Book Type:

- Description:
गतिमान भारत' पुस्तक मोदी सरकार के विगत आठ वर्षो में सरकार की नीतियों और नागरिकों के साथ ही देश पर उनके प्रभाव का अत्यंत व्यावहारिक और वस्तुपरक मूल्यांकन करती है। यह शिक्षा, डिजिटल क्रांति, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, ग्रामीण विकास, स्वच्छता, बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था सहित पच्चीस प्रमुख क्षेत्रों पर विहंगम दृष्टि डालती है। प्रत्येक अध्याय में संबंधित क्षेत्र का अनुभव रखनेवाले विशेषज्ञों एवं प्रख्यात सिविल सेवकों ने अपने गहन अध्ययन के आधार पर भारत को गति देने में विभिन्न सरकारी नीतियों और योजनाओं के प्रभाव की विवचना की है। इनमें से कुछ क्षेत्रों में पूर्ण सुधार हुआ है, जबकि अन्य क्षेत्रों को दक्ष बनाने के लिए उन्हें फिर से व्यवस्थित किया गया है। प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में भारतीय लोकतंत्र ने जो सफर तय किया है और प्रत्येक क्षेत्र में आगे की जो राह है, उस पर एक वस्तुनिष्ठ एवं अनुभवजन्य विश्लेषण को प्रस्तुत करना ही इस पुस्तक का उद्देश्य है। भारत के चहुँमुखी विकास और विश्व में भारत के बढ़ते सम्मान और स्वीकार्यता का दिग्दर्शन करवाती यह पुस्तक हर भारतीय को स्वर्णिम भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। Hindi Translation of Accelerating India
Mahila Lekhan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
- Book Type:

- Description:
लेखन में बीसवीं सदी से आज तक का समय यदि एक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लिया जाए तो यह स्पष्ट है कि इन सौ वर्षों में स्त्रियों की लेखनी में सबसे अधिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखी। पुरुष-लेखन में मात्र एक पात्र होने की भूमिका से निकलकर स्त्री-लेखक ने स्वयं अपनी क़लम से अस्तित्व, व्यक्तित्व और विचार को अभिव्यक्ति देना अभीष्ट समझा। प्रस्तुत संकलन में स्त्री-रचनाकारों के कोमल संवेगों के साथ-साथ आत्मसजग सृजन और विकास-प्रक्रिया का परिचय मिलता है। राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) से लेकर अलका सरावगी तक एक लम्बी परम्परा तैयार हुई है जहाँ क़लम की साँकलें कहीं अनायास तो कहीं सायास खुली हैं। हर्ष और गर्व का विषय है कि महिला-लेखन अब हिन्दी साहित्य में एक सशक्त सचेत और संवेदनायुक्त धारा है। आनेवाला समय यह याद रखे कि अपने इर्द-गिर्द खड़े किए समस्त चौखटे और कोष्ठक तोड़कर इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने पूरे तेवर के साथ हर क्षेत्र में उठ खड़ी हुई है। प्रस्तुत संकलन में हमें कहानी और निबन्ध, जीवनी और संस्मरण, आलोचना और विमर्श, गोया हर विधा और विषय पर स्त्री की तेजस्विता का परिचय मिलेगा। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, सारा राय और अलका सरावगी तक अपने पूरे तेवर के साथ यहाँ मौजूद हैं। पृष्ठ सीमा के चलते कई विधाओं का मात्र उल्लेख ही कर पाये हैं। यहीं से अगले खंड की सम्भावना नज़र आती है।
Bhram Aur Nirsan
- Author Name:
Narendra Dabholkar +4
- Book Type:

- Description:
नरेंद्र दाभोलकर का ज़िन्दगी के सारे चिन्तन और सामाजिक सुधारों में यही प्रयास था कि इंसान विवेकवादी बने। उनका किसी जाति-धर्म-वर्ण के प्रति विद्रोह नहीं था। लेकिन षड्यंत्रकारी राजनीति के चलते अपनी सत्ता की कुर्सियों, धर्माडम्बरी गढ़ों को बनाए रखने के लिए उन्हें हिन्दू विरोधी करार देने की कोशिश की गई और कट्टर हिन्दुओं के धार्मिक अन्धविश्वासों के चलते एक सुधारक का ख़ून किया गया।
एक सामान्य बात बहुत अहम है, वह यह कि विवेकवादी बनने से हमारा लाभ होता है या हानि इसे सोचें। अगर हमें यह लगे कि हमारा लाभ होता है तो उस रास्ते पर चलें। दूसरी बात यह भी याद रखें कि धर्माडम्बरी, पाखंडी बाबा तथा झूठ का सहारा लेनेवाले व्यक्ति का अविवेक उसे स्वार्थी बनाकर निजी लाभ का मार्ग बता देता है, अर्थात् उसमें उसका लाभ होता है और उसकी नज़र से उस लाभ को पाना सही भी लगता है; लेकिन उसके पाखंड, झूठ के झाँसे से हमें हमारा विवेक बचा सकता है।
‘भ्रम और निरसन’ किताब इसी विवेकवाद को पुख्ता करती है। हमारी आँखों को खोल देती है और हमें लगने लगता है कि भाई आज तक हमने कितनी ग़लत धारणाओं के साथ ज़िन्दगी जी है। मन में पैदा होनेवाला यह अपराधबोध ही विवेकवादी रास्तों पर जाने की प्राथमिक पहल है।
सोलह से पच्चीस की अवस्था में मनुष्य का मन एक तो श्रद्धाशील बन जाता है या बुद्धिवादी बन जाता है। बहुत सारे लोग समझौतावादी बन जाते हैं। इसीलिए अन्धविश्वास का त्याग करने के ज़रूरी प्रयास कॉलेजों के युवक-युवतियों में ही होने चाहिए। क्षण-प्रतिक्षण तांत्रिक, गुरु अथवा ईश्वर के पास जाने की आदत बन गई कि पुरुषार्थ ख़त्म हो जाता, यह उन्हें समझना चाहिए या समझाना पड़़ेगा। भारतीय जनमानस और देश को लग चुका अन्धविश्वास का यह खग्रास ग्रहण श्री नरेंद्र दाभोलकर जी के प्रयासों से थोड़ा-बहुत भी कम हो गया तो भी लाभप्रद हो सकता है। वैज्ञानिक खोजबीन अपनी चरमसीमा को छू रही है। ऐसे दौर में अन्धविश्वासों का चश्मा आँखों पर लगाकर लडख़ड़ाते क़दम उठाने में कौन सी अक्लमन्दी है? —नारायण गणेश गोरे
Aise Kaise Panpe Pakhandi
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
अन्धविश्वासों की मानव-समाजों में एक समानान्तर सत्ता चली आई है। शिक्षा, विज्ञान और सामाजिक चेतना के विस्तार के साथ इसके औचित्य पर लगातार प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं और लम्बे समय तक इसका शिकार बनते रहे लोगों ने एक समय पर आकर अन्धविश्वासों की जड़ों को मज़बूत करके अपना कारोबार चलानेवाले पाखंडी बाबाओं से मुक्ति भी पाई है, लेकिन वे नए-नए रूपों में आकर वापस लोगों के मानस पर अपना अधिकार जमा लेते हैं।
आज इक्कीसवीं सदी के इस दौर में भी जब तकनीक और संचार के साधनों ने बहुत सारी चीज़ों को समझना आसान कर दिया है, ऐसे बाबाओं की कमी नहीं है जो किसी मनोशारीरिक कमज़ोरी के किसी क्षण में अच्छे-खासे शिक्षित लोगों को भी अपनी तरफ़ खींचने में कामयाब हो जाते हैं। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और उनकी 'अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति' ने महाराष्ट्र में इन बाबाओं और जनसाधारण की सहज अन्धानुकरण वृत्ति को लेकर लगातार संघर्ष किया। लोगों से सीधे सम्पर्क करके, आन्दोलन करके और लगातार लेखन के द्वारा उन्होंने कोशिश की कि तर्क और ज्ञान से अन्धविश्वास की जड़ें काटी जाएँ ताकि भोले-भाले लोग चालाक और चरित्रहीन बाबाओं के चंगुल में फँसकर अपनी ख़ून-पसीने की कमाई और जीवन तथा स्वास्थ्य को ख़तरे में न डालें।
इस पुस्तक में उन्होंने क़िस्म-क़िस्म के बाबाओं, गुरुओं, अपने आप को भगवान या भगवान का अवतार कहकर भ्रम फैलानेवालों का नाम ले-लेकर उनकी चालाकियों का पर्दाफाश किया है। इनमें भगवान रजनीश और साईं बाबा जैसे नाम भी शामिल हैं जो इधर शिक्षित लोगों में भी ख़ासे लोकप्रिय हैं। बाबाओं की ठगी का शिकार होनेवाले अनेक लोगों की कहानियाँ भी उन्होंने यहाँ दी हैं।
Jati Vyavstha Aur Pitri Satta
- Author Name:
Periyar E.V. Ramasamy +1
- Book Type:

- Description:
‘जाति और पितृसत्ता’ ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' के चिन्तन, लेखन और संघर्षों की केन्द्रीय धुरी रही है। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि इन दोनों के विनाश के बिना किसी आधुनिक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। जाति और पितृसत्ता के सम्बन्ध में पेरियार क्या सोचते थे और क्यों वे इसके विनाश को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अपरिहार्य एवं अनिवार्य मानते थे? इन प्रश्नों का हिन्दी में एक मुकम्मल जवाब पहली बार यह किताब देती है।
इस संग्रह के लेख पाठकों को न केवल पेरियार के नज़रिए से बख़ूबी परिचित कराते हैं बल्कि इसकी भी झलक प्रस्तुत करते हैं कि पेरियार जाति एवं पितृसत्ता के विनाश के बाद किस तरह के सामाजिक सम्बन्धों की कल्पना करते थे। इन लेखों को पढ़ते हुए स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते होने चाहिए, इसकी एक पूरी तस्वीर सामने आ जाती है। इस किताब के परिशिष्ट खंड में पेरियार के सम्पूर्ण जीवन का वर्षवार लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। पेरियार क़रीब 94 वर्षों तक जीवित रहे और अनवरत अन्याय के सभी रूपों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते रहे। इस दौरान उन्होंने जो कुछ लिखा-कहा, उसमें से उनके कुछ प्रमुख उद्धरणों का चयन भी परिशिष्ट खंड में है। यही नहीं, इस खंड में तीन लेख पेरियार के अध्येताओं द्वारा लिखे गए हैं। पहले लेख में प्रसिद्ध विदुषी ललिता धारा ने महिलाओं के सन्दर्भ में पेरियार के चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध आयामों को प्रस्तुत किया है। दूसरा और तीसरा लेख पेरियार के सामाजिक सघर्षों का एक गहन और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इनके लेखक टी. थमराईकन्न और वी. गीता तथा एस.वी. राजादुरै हैं। ये तीनों लेखक पेरियार के गम्भीर अध्येता माने जाते हैं। किताब का यह अन्तिम हिस्सा उनके चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध चरणों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
Political Observer
- Author Name:
Varun Sakhaji
- Book Type:

- Description:
द पॉलिटिकल ऑब्जर्वर में 1998 से लेकर 2022 तक के विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक बड़े घटनाक्रम पर समकाल में लिखे गए आलेखों का विराट संकलन है। इसमें छत्तीसगढ़ की सियासत से लेकर देश की बदलती, ढहरती राजनीतिक तस्वीर को सिनेमा की तरह फ्रेम दर फ्रेम पेश किया गया है। रोमांचक राजनीतिक, सामाजिक घटनाओं का ऐसा कोलाज है जहां आप महसूस करेंग जैसे टाइम मशीन में बैठकर अतीत के वर्तमान में जा पहुंचे हैं। द पॉलिटिकिल ऑब्जर्वर भारत की सियासत की गवाह ही नहीं बल्कि यहां हो रहे हर घटना पर मुखरता से दखल भी है। लगभग 100 घटनाक्रम और उन पर लेखक व वरिष्ठ पत्रकार बरुण सखाजी की पैनी कलम सियासत को अपना रवैया बदलने को मजबूर कर देती है। तोहमतों और अविश्वास के इस दौर में भी मीडिया में ऐसे पत्रकार और विचारशील राजनीैतिक विश्लेषक हैं, यह तसल्ली की बात है। इस पुस्तक की भूमिका देश के प्रख्यात साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध ने लिखी है। लेखक व पत्रकार बरुण सखाजी छत्तीसगढ़ के स्थापित पत्रकार व राजनीतिक चिंतन, विश्लेषण और परामर्श के क्षेत्र में प्रमुखता से सक्रिय हैं।
Dharma Ki Sadhana
- Author Name:
Swami Vivekanand
- Book Type:

- Description:
स्वामी विवेकानंद ने भारत में उस समय अवतार लिया, जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आडंबरवादी और अंधविश्वासपूर्ण बना दिया था। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक अलग पहचान दिलाई। स्वामीजी का विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ; यह संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। प्रस्तुत पुस्तक ' धर्म की साधना' में स्वामीजी ने भारत के प्राचीन गौरव का उल्लेख करते हुए देश के युवकों का आह्वान किया है कि यही उचित समय है, जब वे हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना में जुट जाएँ और भारतीय पुनर्जागरण में सहभागी बनें। सही अर्थों में धर्म की साधना करना, उस पर चलना सिखाने वाली प्रेरणादायी पुस्तक!
Vishwas Aur Andhvishwas
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Jung Andhvishwaso Ki
- Author Name:
Narendra Dabholkar +4
- Book Type:

- Description:
कुशेरा के नेत्रोपचार करनेवाले गुरव बंधु हों, निःसन्तानों को सन्तान प्रदान करानेवाली पार्वती माँ हों, या एक ही प्रयास में व्यसनमुक्त करानेवाले शेषराव महाराज हों, थोड़ा-सा विचार करें, तो समझ में आता है कि लोग असहाय होते हैं। अतः वे दैववादी बनते हैं। इसी से अंधविश्वास का जन्म होता है। समाज जागरूक नहीं है। लोग अविवेकी, व्याकुल हैं, यह बिल्कुल सच है; लेकिन क्या लोगों की इस कमज़ोरी का इस्तेमाल उनकी लूट करने के लिए किया जाए? क्या लोगों की पीड़ा से अपनी झोली भरी जाए?
लोग श्रद्धा रखते हैं, देवाचार माननेवाले हैं, इसका यह मतलब नहीं कि लोग मूर्ख हैं और इसी कारण वे श्रद्धा, देवाचार, नैतिकता, पवित्रता आदि से सम्बन्धित बन्धनों का पालन करते हैं। हम देवताओं की ओर जाते हैं, वह चमत्कार के डर से नहीं बल्कि प्रेमभाव के कारण होता है। लेकिन प्रेम में भय और दहशत का कोई स्थान नहीं है। इस श्रद्धा में जो चीज़ें ग़ैरज़रूरी और अतार्किक हैं, उनका परीक्षण क्यों न किया जाए? कालबाह्य मूल्यों के प्रभावहीन होने से तथा नवविचारों के प्रभावी व्यवहार से लोग परिवर्तन चाहते हैं। हम जब ऐसा कहते हैं कि हिन्दू धर्म की बुनियादी मूल्य-व्यवस्था ही असमानता पर आधारित है, तो वास्तव में यह विधान भूतकाल को सम्बोधित करके किया गया होता है। जन्म से जातीय वरीयता का पुनरुज्जीवन आज कोई नहीं चाहता। प्रत्येक धर्म में मूल नीति तत्त्व बहुतांश रूप में समान हैं। प्रखर नास्तिक भी इसे स्वीकार करेगा। धर्म जब कर्मकांड मात्र रह जाता है, तब उसका विकृतिकरण होता है। क्या चमत्कार धर्मश्रद्धा का हिस्सा है?
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "जिस शुद्ध हिन्दू धर्म का सम्मान मैं करता हूँ, वह चमत्कार पर आधारित नहीं है। चमत्कार एवं गूढ़ता के पीछे मत पड़ो। चमत्कार सत्य-प्राप्ति के मार्ग में आनेवाला सबसे बड़ा रोड़ा है। चमत्कारों का पागलपन हमें नादान और कमज़ोर बनाता है।"
इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में 'महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति' विगत 24 वर्षों से कार्यरत है। अपने नि:स्वार्थ कार्यकर्ताओं के साथ उसने इस दौरान अनेक बार आन्दोलन किए हैं, अनेक बार अपनी जान जोखिम में डालकर और अपनी जेब से पैसा ख़र्च करके समाज में चल रहे अन्धविश्वासों के व्यापार का विरोध किया है। इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ आन्दोलनों की रपट है। इन घटनाओं का विवरण पढ़कर पाठक स्वयं ही समझ सकता है कि अन्धविश्वासों से यह जंग कितनी ख़तरनाक लेकिन कितनी ज़रूरी है।
Vivek Ki Pratibaddhata
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अर्थात् कार्यकारण भाव। चमत्कार अर्थात् वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव। यह सम्बन्ध प्रकाश और अँधेरे के समान है। एक का होना याने अनिवार्यतः दूसरे का ना होना। विज्ञान में चमत्कार नहीं होते। चमत्कार या तो रासायनिक, भौतिक प्रक्रिया होती है या हाथ की सफ़ाई होती है। बदमाशी भी हो सकती है और प्रसंग के अनुसार प्रकृति की अनसुलझी पहेली भी चमत्कार में शामिल होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवन में स्वीकारने का अर्थ है, आज या कल समझ में आनेवाली वैज्ञानिक विचार-पद्धति पर समाज का विश्वास होना।
चमत्कारों को चुनौती देने की भूमिका को ठीक से समझना चाहिए। संविधान ने हर व्यक्ति को उपासना, अलौकिक जीवन, आध्यात्मिक कल्याण की आज़ादी दी है, इसका सम्मान करना चाहिए। लेकिन चमत्कार पर विश्वास करना, उसकी जाँच-पड़ताल का विरोध और ऐसे चमत्कारों का प्रसार करते रहना, यह धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। भारतीय समाज बहुत जल्द भयग्रस्त हो जाता है। दैववादी मानसिकता के कारण लोग संकट को भाग्य का परिणाम मानते हैं। कई लोगों को लगता है कि दैवी-शक्ति प्राप्त कोई बाबा या कोई धार्मिक तीर्थ उन्हें कठिनाई से उबार लेगा। इस मानसिकता में रहनेवाला समाज स्वाभिमानशून्य, भगौड़ा, डरपोक और बुद्धि को रेहन पर रखनेवाला होता है। स्वाभिमानी, प्रयत्नवादी और निर्भय समाज बनाने के लिए चमत्कार का विरोध आवश्यक है।
मानसिक ग़ुलामी की सबसे बड़ी भयानकता यह है कि उस अवस्था में व्यक्ति की बुद्धि से प्रश्न पूछना तो दूर की बात है, व्यक्ति की बुद्धि, निर्णय-शक्ति, सम्पूर्ण विचार-क्षमता ये सभी बातें चमत्कार के आगे शून्य हो जाती हैं। व्यक्ति दासता में चला जाता है और फिर परिवर्तन की लड़ाई अधिक कठिन हो जाती है।
इस किताब में दाभोलकर जी के 2003 से 08 के दौरान लिखे आलेख शामिल हैं जो उन्होंने अन्धविश्वास और अवैज्ञानिकता के विरोध में विभिन्न मोर्चों और आन्दोलनों में काम करते हुए लिखे। उनके आन्दोलन का एकमात्र उद्देश्य एक विवेकशील मन का निर्माण था ताकि भारतीय लोग अपनी भौतिक लाचारगी और लिप्साओं के कारण धन्धेबाजों का शिकार न हों। उनके लेखन को पढ़ते हुए हम इक्कीसवीं सदी के भारत की धार्मिक-आध्यात्मिक-आर्थिक-सामाजिक विडम्बनाओं से भी परिचित होते हैं।
Vidhyarthiyon Ke Liye Gita
- Author Name:
Acharya Mayaram 'Patang'
- Book Type:

- Description:
‘गीता’ कालजयी ग्रंथ है। यह भक्ति के साथ-साथ कर्म की ओर प्रवृत्त करती है। अपने कर्तव्य-पथ से भटक रहे अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर ही कर्म-पथ पर प्रवृत्त किया। इसलिए हमारे जीवन में गीता का बहुत व्यावहारिक उपयोग है, महती योगदान है। विद्यार्थी काल में ही गीता का भाव समझ गए तो यह जीवन में पग-पग पर काम आएगा। जीने की कला आ जाएगी। आपत्तियों तथा कष्टकर परिस्थितियों में निराशा नहीं घेरेगी। अपने-पराए और मित्र-शत्रु के मोह से मुक्त होने का ज्ञान हो जाएगा। अधिकांश लोग सेवानिवृत्त होकर गीता पढ़ते हैं। जब सारा जीवन मोह, लोभ, काम, क्रोध और अहंकार की भेंट चढ़ गया, दुःख और संतापों का ताप सह लिया, तिल-तिल कर मरते रहे, फिर गीता पढ़ी तो क्या लाभ हुआ? पाप और पुण्य कर्मों का फल तो भोगना निश्चित ही हो गया! इस पुस्तक को विशेष रूप से छात्रों-विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। गीता के हर अध्याय में जो महत्त्वपूर्ण श्लोक हैं, जिन्हें स्मरण किया जा सके, गाया जा सके, उन्हें संकलित किया गया है। स्पष्ट है कि यह संपूर्ण गीता नहीं है, बल्कि मात्र प्रेरणा है। इसे पढ़कर छात्र सन्मति पाएँ, नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए सन्मार्ग पर चलकर जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचें, यही इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य है। विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण तथा कर्तव्य-पथ पर सतत चलने की प्रेरणा देनेवाली एक अनुपम पुस्तक।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 2 : Aachar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : आचार' पुस्तक में धर्म के नाम पर कर्मकांड और पाखंडों के ख़िलाफ़ आन्दोलन, जन-जागृति कार्यक्रम और भंडाफोड़ जैसे प्रयासों का ब्योरा है।
पुस्तक में भूत से साक्षात्कार कराने का पर्दाफाश, ओझाओं की पोल खोलती घटनाएँ, मंदिर में जाग्रत देवता और गणेश देवता के दूध पीने के चमत्कार के विवरण पठनीय तो हैं ही, उनसे देखने, सोचने और समझने की पुख्ता ज़मीन भी उजागर होती है। निस्सन्देह अपने विषयों के नवीन विश्लेषण से यह पुस्तक पाठकों में अहम भूमिका निभाने जैसी है।
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली यह पुस्तक परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 1 : Vichar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : विचार' पुस्तक में अंधविश्वास उन्मूलन से सम्बन्धित बुनियादी बातों का ज़िक्र है। इसमें 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण', 'विज्ञान की कसौटी पर फलित ज्योतिष', 'वास्तुशास्त्र नहीं वास्तुश्रद्धाशास्त्र', 'छद्म विज्ञान अर्थात् स्यूडो साइंस', 'मनोविकार', 'भूतप्रेत बाधा या भूतावेश', 'सम्मोहन', 'देवी सवारना' जैसे विषयों पर विचार और विवेचन किया गया है जिससे यथार्थ और भ्रम का सदियों पुराना अन्तर स्पष्ट होता है।
लेखक के आत्मप्रत्यय और चेतना की नींव पर खड़ी यह पुस्तक अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Choori Bazar Mein Ladki
- Author Name:
Krishna Kumar
- Book Type:

- Description:
यह पुस्तक लड़कियों के मानस पर डाली जानेवाली सामाजिक छाप की जाँच करती है। वैसे तो छोटी लड़की को बच्ची कहने का चलन है, पर उसके दैनंदिन जीवन की छानबीन ही यह बता सकती है कि लड़कियों के सन्दर्भ में 'बचपन' शब्द की व्यंजनाएँ क्या हैं। कृष्ण कुमार ने इन व्यंजनाओं की टोह लेने के लिए दो परिधियाँ चुनी हैं। पहली परिधि है घर के सन्दर्भ में परिवार और बिरादरी द्वारा किए जानेवाले समाजीकरण की। इस परिधि की जाँच संस्कृति के उन कठोर और पैने औज़ारों पर केन्द्रित है जिनके इस्तेमाल से लड़की को समाज द्वारा स्वीकृत औरत के साँचे में ढाला जाता है। दूसरी परिधि है शिक्षा की जहाँ स्कूल और राज्य अपने सीमित दृष्टिकोण और संकोची इरादे के भीतर रहकर लड़की को एक शिक्षित नागरिक बनाते हैं। लड़कियों का संघर्ष इन दो परिधियों के भीतर और इनके बीच बची जगहों पर बचपन भर जारी रहता है। यह पुस्तक इसी संघर्ष की वैचारिक चित्रमाला है।
Goongi Rulaai Ka Chorus
- Author Name:
Ranendra
- Book Type:

- Description:
भारतीय जन-जीवन का एक लम्बा दौर ऐसा भी रहा जिसमें हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के अति-साधारण लोग बिना किसी वैचारिक आग्रह या सचेत प्रयास के, जीवन की सहज धारा में रहते-बहते एक साझा सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित हो रहे थे। एक साझा समाज का निर्माण कर रहे थे, जो अगर विभाजन-प्रेमी ताकतें बीच में न खड़ीं होतीं तो एक विशिष्ट समाज-रचना के रूप में विश्व के सामने आता। हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी इसके अवशेष मिल जाते हैं। परम्परा का एक बड़ा हिस्सा तो उसके ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में हमारे पास है ही। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत भी उसी विरासत का हिस्सा है जो इस उपन्यास के केंद्र में है। खिलजी शासनकाल में देवगिरी के महान गायक गोपाल नायक और अमीर खुसरो के मेल से जिस संगीत की धारा प्रवाहित हुई, अकबर, मुहम्मद शाह रंगीले और वाजिद अली शाह के दरबारों से बहती हुई वह संगीत के अलग-अलग घरानों तक पहुँची। मैहर के बड़ो बाबा अलाउद्दीन खान की तरह इस उपन्यास के बड़ो नानू उस्ताद मह्ताबुद्दीन खान के यहाँ भी संगीत ही इबादत है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के खुर्शीद जोगी और बंगाल के बाउल परम्परा के कमोल उनके घर से दामाद के रूप में जुड़े। लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में विभाजन-प्रेम एक नशे के तौर पर उभर कर आता है। गुजरात में सदी के शुरू में जो हुआ वह अब यहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक मुख्यधारा का सबसे तेज़ रंग है। इस जहरीले परिवेश में नानू अयूब खान, अब्बू खुर्शीद जोगी, बाबा मदन बाउल और अंत में कमोल कबीर एक-एक कर खत्म कर दिए जाते हैं। बच जाती है एक रुलाई जो खुलकर फूट भी नहीं पाती। हलक तक आकर रह जाती है। यह उपन्यास इसी रुलाई का कोरस है। विभाजन को अपना पवित्रतम ध्येय मानने वाली वर्चस्वशाली विचारधारा के खोखलेपन और उसकी रक्त-रंजित आक्रामकता को रेखांकित करते हुए यह उपन्यास भारतीय संस्कृति के समावेशी चरित्र को हिन्दुस्तानी संगीत की लय-ताल के साथ पुनः स्थापित करने का प्रयास करता है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book