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Author:
Doodhnath SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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यह कथा-कृति उपन्यास की सारी सीमाओं और लालचों को उलट-पुलट देती है। चरित्रों के टकराव से कथा का विकास—यह जो उपन्यास-लेखन की आदत बन चुकी है, यहाँ इस आदत से लगभग इनकार है। फिर भी यह कथा-कृति एक उपन्यास ही है। इसमें गद्य और वृत्तान्त का एक अजब संयोजन है, जहाँ से ढाँचागत वर्जनाएँ समाप्त होती हैं और कथा का विस्तार और खुलापन बातों और विचारों को आमंत्रित करते-से लगते हैं। गद्य और गल्प का एक नया रसायन तैयार होता है जो अपने रस और सुर से अद्भुत पठनीयता पैदा करता है। इस तरह यह उपन्यास गल्प की एक नई, अबाध निरन्तरता का प्रमाण है। इस उपन्यास में मिथकीय संस्कृति के विश्लेषण की एक पवित्र और निहत्थी छटपटाहट है। मिथक को इतिहास में बदलने की कोशिशों का पर्दाफाश है; विचार, संरचना और संस्कृति पर एकल बहसों का निर्वेद है। इसी के भीतर कहानी के तार बिखरे पड़े हैं। इन्हीं तकलीफ़ों के भीतर से इतिहास के उन सूत्रों को ढूँढ़ने का प्रयत्न है, जो एक मिले-जुले समाज की बुनियाद हैं और जिनको उलट-पुलट देने की बर्बर आहटें इधर चौतरफ़ा सुनाई दे रही हैं। इसी तरह यह उपन्यास अपने समय के संसार की एक चित्र-रचना बनता है। अपने अतीत, इतिहास, मिथक और साहित्य-संस्कृति को उकेरता-उधेड़ता हुआ उसकी एक विस्फोटक और स्तब्धकारी पुनर्रचना सामने रखता है। उन बातों, अर्थों और व्याख्याओं को सामने लाता है, जो उसी में छुपी थीं लेकिन लोग और समाज, संस्कृति और विचार के धनुर्धर उसकी ओर से अक्सर आखें मूँदे रहते हैं। अन्तत: यह उपन्यास हमारे अतीत और वर्तमान की एक नई ‘पोलेमिक्स' है। इंसाफ़ की इच्छा का एक दुखद-द्वंद्वात्मक संवाद है, जो अपने लोगों और अपनी जनता को ही सम्बोधित है।
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About the Book
यह कथा-कृति उपन्यास की सारी सीमाओं और लालचों को उलट-पुलट देती है। चरित्रों के टकराव से कथा का विकास—यह जो उपन्यास-लेखन की आदत बन चुकी है, यहाँ इस आदत से लगभग इनकार है। फिर भी यह कथा-कृति एक उपन्यास ही है। इसमें गद्य और वृत्तान्त का एक अजब संयोजन है, जहाँ से ढाँचागत वर्जनाएँ समाप्त होती हैं और कथा का विस्तार और खुलापन बातों और विचारों को आमंत्रित करते-से लगते हैं। गद्य और गल्प का एक नया रसायन तैयार होता है जो अपने रस और सुर से अद्भुत पठनीयता पैदा करता है। इस तरह यह उपन्यास गल्प की एक नई, अबाध निरन्तरता का प्रमाण है।
इस उपन्यास में मिथकीय संस्कृति के विश्लेषण की एक पवित्र और निहत्थी छटपटाहट है। मिथक को इतिहास में बदलने की कोशिशों का पर्दाफाश है; विचार, संरचना और संस्कृति पर एकल बहसों का निर्वेद है। इसी के भीतर कहानी के तार बिखरे पड़े हैं। इन्हीं तकलीफ़ों के भीतर से इतिहास के उन सूत्रों को ढूँढ़ने का प्रयत्न है, जो एक मिले-जुले समाज की बुनियाद हैं और जिनको उलट-पुलट देने की बर्बर आहटें इधर चौतरफ़ा सुनाई दे रही हैं। इसी तरह यह उपन्यास अपने समय के संसार की एक चित्र-रचना बनता है। अपने अतीत, इतिहास, मिथक और साहित्य-संस्कृति को उकेरता-उधेड़ता हुआ उसकी एक विस्फोटक और स्तब्धकारी पुनर्रचना सामने रखता है। उन बातों, अर्थों और व्याख्याओं को सामने लाता है, जो उसी में छुपी थीं लेकिन लोग और समाज, संस्कृति और विचार के धनुर्धर उसकी ओर से अक्सर आखें मूँदे रहते हैं।
अन्तत: यह उपन्यास हमारे अतीत और वर्तमान की एक नई ‘पोलेमिक्स' है। इंसाफ़ की इच्छा का एक दुखद-द्वंद्वात्मक संवाद है, जो अपने लोगों और अपनी जनता को ही सम्बोधित है।
Book Details
-
ISBN9788126712939
-
Pages435
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ईरान के ही नहीं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिने जाने वाले उपन्यास ‘अन्धा उल्लू’ का लेखन इसके लेखक ने बम्बई में अपने भारत प्रवास के दौरान किया था। एक हताश व्यक्ति के भीतरी अँधेरे और उसे चारों तरफ़ से भींचकर रखे रहने वाली दुनिया के प्रति उसका क्षोभ इस उपन्यास के शब्द-शब्द में बिंधा है जिसे सुपरिचित कथाकार नासिरा शर्मा ने बड़े मनोयोग से मूल फ़ारसी से हिन्दी में प्रस्तुत किया है। अपने असंगत अतियथार्थ में यह उपन्यास जहाँ हमें ख़ुद से दूर की कोई चीज़ लगता है, वहीं अपने उन्हीं विवरणों और प्रतिक्रियाओं में अपने बहुत क़रीब भी लगता है। संवेदनहीन ज्यामितिक आकृतियों से घिरे हमारे आधुनिक मनोजगत का वह स्याह विस्तार इसमें अंकित हुआ है, जहाँ पाँव रखने का साहस हम अक्सर नहीं कर पाते। अथाह निराशा, भयावह दुःस्वप्नों, घोर अकेलेपन और मृत्युबोध के हौलनाक चित्रण के चलते ईरान में इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध भी लगा जिसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि इसे पढ़ने के बाद कुछ पाठकों ने अपना जीवन समाप्त करने के प्रयास भी किए। लेकिन इस उपन्यास में अभिव्यक्त सचाई को नकार पाना कभी सम्भव नहीं हुआ और समय के साथ ‘अन्धा उल्लू’ हरेक सजग संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक अपरिहार्य पाठ के तौर पर अधिक से अधिक मान्य होता गया।
Ajnabi
- Author Name:
Albert Camus +1
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फ्रांस के अमर लेखक, नोबेल पुरस्कार-विजेता अल्बैर कामू मानव-अन्तर्मन के संवेगों और कुंठाओं को अनावृत करने में पटु हैं। नियति में उनका विश्वास है और कृत्य की स्वतंत्रता एक निर्दिष्ट परिधि में ही वह मानते हैं। आरम्भ से अन्त तक पाठक की रुचि को साधे रखनेवाले इस उपन्यास में नायक के समस्त क्रिया-कलाप और उसके साथ घटी घटनाओं में उनका यही जीवन-दर्शन व्यक्त हुआ है। विश्व के विशिष्ट उपन्यास-साहित्य में स्थान पानेवाले उपन्यास ‘अजनबी’ की कथा-वस्तु न केवल हमारे मर्म को मथ देने में सफल होती है, वरन् हमें जीवन और कर्म, और इन दोनों के उद्देश्यों के सम्बन्ध में भी सोचने पर विवश करती है। सन् 1942 में प्रकाशित इस उपन्यास को द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न हताशा और विसंगतियों को अभिव्यक्त करनेवाली कृति माना जाता है। उपन्यास के नायक से कामू यहाँ जीवन की निरुद्देश्यता और मृत्यु की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं; नायक की समाज से विरक्ति और उदासीनता का जैसा मार्मिक चित्रण कामू ने इस उपन्यास में किया है, वह आज भी स्तब्ध कर देता है।
Chittakobara
- Author Name:
Mridula Garg
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जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि पूरी पुस्तक में एक अन्तर्धारा बहती हुई दीखती है और एकसूत्रता भी आसानी से पकड़ में आती है। इस उपन्यास में परिच्छेद नहीं हैं। मैं जानती हूँ, जीवन की इतनी प्रवहमान धारा को टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। अन्दर के दबाव के कारण ही शायद यह हो सका है कि क्षणों में जी और लिखी गई इस कहानी के टुकड़ों का क्रम भी बाद में तय हुआ। दरअसल, बहती नदी से किसी किनारे खड़े होकर पानी पियो - क्या फर्क पड़ता है! क्रम-निर्धारण का पूर्वग्रह तो कहानी गढ़ने में होता है; जो कहानी है, वह तो...कोई कहीं से भी साथ हो ले... - इसी पुस्तक से
Boudam
- Author Name:
Fyodor Dostoyevsky +1
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Awating description for this book
Yeh Kothewaliya
- Author Name:
Amritlal Nagar
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आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूति से इस जीवन को देखा है, जिसे आम तौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के करण इसकी प्रमाणिकता अद्धितीय है। भारतीय समाज के अध्येताओं के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
Banbhatt Ki Aatmakatha
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की विपुल रचना-सामर्थ्य का रहस्य उनके विशद शास्त्रीय ज्ञान में नहीं, बल्कि उस पारदर्शी जीवन-दृष्टि में निहित है, जो युग का नहीं युग-युग का सत्य देखती है। उनकी प्रतिभा ने इतिहास का उपयोग ‘तीसरी आँख’ के रूप में किया है और अतीत-कालीन चेतना-प्रवाह को वर्तमान जीवनधारा से जोड़ पाने में वह आश्चर्यजनक रूप से सफल हुई है। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्यत्व की गरिमा से पूर्ण है। इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूँथकर एक ऐसी कथाभूमि निर्मित की है जो जीवन-सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है। बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का ढेला नहीं’, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है। ‘अपने को निःशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखने वाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती हैद-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे?’’
Punarutthan
- Author Name:
Leo Tolstoy +1
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आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था। ‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है। ‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है।
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