Film Nirdeshan
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भारत विश्व के ऐसे देशों की श्रेणी में शुमार किया जाता है जहाँ सबसे अधिक फ़िल्मों का निर्माण होता है, लेकिन विडम्बना यह है कि फ़िल्म निर्देशन पर अब तक हिन्दी में कोई किताब नहीं थी। कुलदीप सिन्हा ने 'फ़िल्म निर्देशन' पुस्तक लिखकर यह कमी पूरी कर दी है, इसलिए उनकी यह पहल ऐतिहासिक है। श्री सिन्हा पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित फ़िल्मकार हैं। राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अनेक फ़िल्मों के वे निर्माता-निर्देशक रहे हैं। इसलिए उनकी इस पुस्तक में निर्देशन के सैद्धान्तिक विवेचन के साथ ही उसके व्यावहारिक पक्ष को सूक्ष्मता और विस्तार से विवेचित किया गया है। पुस्तक 11 दृश्यों में विभक्त है। प्रत्येक दृश्य में निर्देशन के अलग-अलग मुद्दों तथा तकनीकी प्रसंगों को सहजता के साथ स्पष्ट किया गया है। श्री सिन्हा पहले बताते हैं कि फ़िल्म को फ़्लोर पर ले जाने के पूर्व क्या तैयारी करनी चाहिए! फ़िल्म की निर्माण-योजना में सन्तुलन के लिए क्या सावधानी बरतें! इसके बाद उन्होंने संक्षेप में पटकथा-लेखन के प्रमुख बिन्दुओं की भी चर्चा की है। लाइटिंग और कम्पोजीशन के सिलसिले में व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। फ़िल्म सेंसरशिप की कार्यप्रणाली तथा उसके विषय पर प्रकाश डाला है। और अन्त में 'निर्देशक' कुलदीप सिन्हा ने अपनी पसन्द के कुछ हिन्दी फ़िल्म निर्देशकों जैसे—शान्ताराम, विमल राय, गुरुदत्त और राजकपूर आदि के ऐतिहासिक योगदान का महत्त्वपूर्ण विश्लेषण किया है। इसी प्रसंग में भारत में सिनेमा के इतिहास का संक्षिप्त रेखांकन भी हो गया है। आम लोग इस पुस्तक से यह आसानी से जान सकते हैं कि जो सिनेमा वे इतने चाव से देखते हैं, वह बनता कैसे है? और जो लोग फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक प्रवेशद्वार की तरह है। जो लोग फ़िल्म आलोचना से सम्बद्ध हैं, उनके सामने कुलदीप सिन्हा की यह पुस्तक अनेक अनुद्घाटित व्यावहारिक पक्षों को सामने लाती है। कुलदीप सिन्हा की इस बहुआयामी पुस्तक की उपयोगिता को देखते हुए मैं उन्हें इस नए दौर का 'सिनेमा गुरु' कहना चाहता हूँ। —सुरेश शर्मा, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म आलोचक।
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भारत विश्व के ऐसे देशों की श्रेणी में शुमार किया जाता है जहाँ सबसे अधिक फ़िल्मों का निर्माण होता है, लेकिन विडम्बना यह है कि फ़िल्म निर्देशन पर अब तक हिन्दी में कोई किताब नहीं थी। कुलदीप सिन्हा ने 'फ़िल्म निर्देशन' पुस्तक लिखकर यह कमी पूरी कर दी है, इसलिए उनकी यह पहल ऐतिहासिक है।
श्री सिन्हा पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित फ़िल्मकार हैं। राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अनेक फ़िल्मों के वे निर्माता-निर्देशक रहे हैं। इसलिए उनकी इस पुस्तक में निर्देशन के सैद्धान्तिक विवेचन के साथ ही उसके व्यावहारिक पक्ष को सूक्ष्मता और विस्तार से विवेचित किया गया है।
पुस्तक 11 दृश्यों में विभक्त है। प्रत्येक दृश्य में निर्देशन के अलग-अलग मुद्दों तथा तकनीकी प्रसंगों को सहजता के साथ स्पष्ट किया गया है। श्री सिन्हा पहले बताते हैं कि फ़िल्म को फ़्लोर पर ले जाने के पूर्व क्या तैयारी करनी चाहिए! फ़िल्म की निर्माण-योजना में सन्तुलन के लिए क्या सावधानी बरतें! इसके बाद उन्होंने संक्षेप में पटकथा-लेखन के प्रमुख बिन्दुओं की भी चर्चा की है। लाइटिंग और कम्पोजीशन के सिलसिले में व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। फ़िल्म सेंसरशिप की कार्यप्रणाली तथा उसके विषय पर प्रकाश डाला है। और अन्त में 'निर्देशक' कुलदीप सिन्हा ने अपनी पसन्द के कुछ हिन्दी फ़िल्म निर्देशकों जैसे—शान्ताराम, विमल राय, गुरुदत्त और राजकपूर आदि के ऐतिहासिक योगदान का महत्त्वपूर्ण विश्लेषण किया है। इसी प्रसंग में भारत में सिनेमा के इतिहास का संक्षिप्त रेखांकन भी हो गया है।
आम लोग इस पुस्तक से यह आसानी से जान सकते हैं कि जो सिनेमा वे इतने चाव से देखते हैं, वह बनता कैसे है? और जो लोग फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक प्रवेशद्वार की तरह है। जो लोग फ़िल्म आलोचना से सम्बद्ध हैं, उनके सामने कुलदीप सिन्हा की यह पुस्तक अनेक अनुद्घाटित व्यावहारिक पक्षों को सामने लाती है। कुलदीप सिन्हा की इस बहुआयामी पुस्तक की उपयोगिता को देखते हुए मैं उन्हें इस नए दौर का 'सिनेमा गुरु' कहना चाहता हूँ।
—सुरेश शर्मा,
राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म आलोचक।
Book Details
-
ISBN9788183610988
-
Pages227
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सिनेमा विधा की जानकारी मुझे बहुत कम है लेकिन केवल इस किताब को पढ़ने से मैं कह सकता हूँ कि मैंने न केवल भारतीय सिनेमा, बल्कि प्रकारान्तर से विश्व सिनेमा की भी अत्यन्त मूल्यवान जानकारी हासिल कर ली। इस किताब को विषयवार भी वर्गीकृत किया गया है और कालक्रमवार भी। मेरा अनुमान है कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हज़ार फ़िल्मों का उल्लेख या सन्दर्भ तो मिल ही जाता है जिनमें हिन्दी सिनेमा किस प्रकार क्रमश: आमजन के मुद्दों से भटककर अभिजन वर्ग का हित करने का साधन बन गया, किस प्रकार जातिवाद को पोषित करने और उच्च जाति का गौरवगान करने का माध्यम बन गया, इसे सोदाहरण और विस्तार से बताया गया है। इसके साथ ही किताब में किसानों के, मजदूरों के, वेश्याओं के, दृष्टिबाधितों के, खिलाड़ियों के, डाकुओं, पत्रकारों और भूमाफ़िया के मुद्दों को विषय बनाकर बनाई गई फ़िल्मों का भी विशद विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक के लिए सामग्री का चयन करने और उसको संयोजित करने में जो अथक परिश्रम किया गया है वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। हिन्दी में सिनेमा पर इतनी समृद्ध किताब मैंने दूसरी नहीं पढ़ी। इसकी भाषा इतनी सरल और सुगम है कि सामान्य पाठक और सिनेमा के शोधार्थियों—दोनों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। —शिवमूर्ति
Kavi Shailendra : Zindagi Ki Jeet Mein Yakeen
- Author Name:
Prahlad Agarwal
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कुछ अकेले नहीं हैं और पहले भी नहीं हैं—शैलेन्द्र, विद्वज्जनों ने जिनकी ओर नज़र नहीं डाली—ऐसे अनेकानेक लोककवि हैं। यूँ हर ज़माने ने अपने ज़माने की लोकरचना की सादगी की संश्लिष्टता को स्वीकार करने में कोताही की—और होकर यूँ रहा कि समय के साथ वह रंग और गहरा होता चला गया। पीढ़ियाँ-दर-पीढ़ियाँ उनके शब्दों में ज़िन्दगी के नए मायने तलाशती रहीं। शैलेन्द्र के गीत हमारे बचपन की गुनगुनाहटों में शामिल होकर आज तक हमसफ़र हैं। दुनिया-भर की पुरकशिश कविता की तरह उन्होंने ज़िन्दगी की पुरपेच गलियों में आलोकित राजपथ प्रशस्त किया। इतने सरल और लुभावने कि आवारामिज़ाजी से ज़ुबाँ पर चढ़ जाएँ, क़दम-ब-क़दम ज़िन्दगी के फ़लसफ़े में तब्दील होते हुए। अपनी मासूम गुनगुनाहटों के शब्द के फ़नकार का नाम हमें सालों बाद पता चला और इस परिचय के ऊषाकाल में ही वह सितारा टूट गया। जब शैलेन्द्र ने आत्मघात किया, हम उन्नीस साल के थे। इसके चंद महीने पहले ही शैलेन्द्र निर्मित एकमात्र फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ प्रदर्शित हुई थी। नहीं मालूम सच है या झूठ, लेकिन कहा जाता है कि शैलेन्द्र को यक़ीन था, इसे ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ मिलेगा—और मिला, लेकिन वह दिन देखने के लिए शैलेन्द्र नहीं थे। जनकवि शैलेन्द्र के बहुआयामी रचनात्मक अवदान का आकलन करने की विनम्र कोशिश है यह पुस्तक।
Saaye Mein Dhoop
- Author Name:
Dushyant Kumar
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जिंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है । उसमे फंसकर गेम-जाना और गेम-दौरां तक एक हो जाते हैं । ये गजलें दरअसल ऐसे ही एक दौर की देन हैं । यहाँ मैं साफ़ कर दूँ कि गजल मुझ पर नाजिल नहीं हुई । मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आया हूँ और मैंने कभी चोरी-छिपे इसमें हाथ भी आजमाया है । लेकिन गजल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तंग करती रही है और वह है कि भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि मिर्जा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए गजल का माध्यम ही क्यों चुना ? और अगर गजल के माध्यम से ग़ालिब अपनी निजी तकलीफ को इतना सार्वजानिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ (जो व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती ? मुझे अपने बारे में कभी मुगालते नहीं रहे । मैं मानता हूँ, मैं ग़ालिब नहीं हूँ । उस प्रतिभा का शतांश भी शायद मुझमें नहीं है । लेकिन मैं यह नहीं मानता कि मेरी तकलीफ ग़ालिब से कम हैं या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया है । हो सकता है, अपनी-अपनी पीड़ा को लेकर हर आदमी को यह वहम होता हो...लेकिन इतिहास मुझसे जुडी हुई मेरे समय की तकलीफ का गवाह खुद है । बस...अनुभूति की इसी जरा-सी पूँजी के सहारे मैं उस्तादों और महारथियों के अखाड़े में उतर पड़ा ।
Awara Sajde
- Author Name:
Kaifi Azmi +1
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आवारा सजदे उर्दू भाषा के विख्यात साहित्यकार कैफ़ी आज़मी द्वारा रचित एक कविता–संग्रह है जिसके लिये उन्हें सन् 1975 में उर्दू भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
Vishya Chalchitra
- Author Name:
Satyajit Ray +1
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Talkies : Cinema Ka Safar-2
- Author Name:
Jagran Film Festival
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