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Cinema Ke Mudde : Muddon Ka Cinema

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सिनेमा विधा की जानकारी मुझे बहुत कम है लेकिन केवल इस किताब को पढ़ने से मैं कह सकता हूँ कि मैंने न केवल भारतीय सिनेमा, बल्कि प्रकारान्तर से विश्व सिनेमा की भी अत्यन्त मूल्यवान जानकारी हासिल कर ली। इस किताब को विषयवार भी वर्गीकृत किया गया है और कालक्रमवार भी। मेरा अनुमान है कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हज़ार फ़िल्मों का उल्लेख या सन्दर्भ तो मिल ही जाता है जिनमें हिन्दी सिनेमा किस प्रकार क्रमश: आमजन के मुद्दों से भटककर अभिजन वर्ग का हित करने का साधन बन गया, किस प्रकार जातिवाद को पोषित करने और उच्च जाति का गौरवगान करने का माध्यम बन गया, इसे सोदाहरण और विस्तार से बताया गया है। इसके साथ ही किताब में किसानों के, मजदूरों के, वेश्याओं के, दृष्टिबाधितों के, खिलाड़ियों के, डाकुओं, पत्रकारों और भूमाफ़िया के मुद्दों को विषय बनाकर बनाई गई फ़िल्मों का भी विशद विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक के लिए सामग्री का चयन करने और उसको संयोजित करने में जो अथक परिश्रम किया गया है वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। हिन्दी में सिनेमा पर इतनी समृद्ध किताब मैंने दूसरी नहीं पढ़ी। इसकी भाषा इतनी सरल और सुगम है कि सामान्य पाठक और सिनेमा के शोधार्थियों—दोनों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। —शिवमूर्ति

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सिनेमा विधा की जानकारी मुझे बहुत कम है लेकिन केवल इस किताब को पढ़ने से मैं कह सकता हूँ कि मैंने न केवल भारतीय सिनेमा, बल्कि प्रकारान्तर से विश्व सिनेमा की भी अत्यन्त मूल्यवान जानकारी हासिल कर ली।

इस किताब को विषयवार भी वर्गीकृत किया गया है और कालक्रमवार भी। मेरा अनुमान है कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हज़ार फ़िल्मों का उल्लेख या सन्दर्भ तो मिल ही जाता है जिनमें हिन्दी सिनेमा किस प्रकार क्रमश: आमजन के मुद्दों से भटककर अभिजन वर्ग का हित करने का साधन बन गया, किस प्रकार जातिवाद को पोषित करने और उच्च जाति का गौरवगान करने का माध्यम बन गया, इसे सोदाहरण और विस्तार से बताया गया है। इसके साथ ही किताब में किसानों के, मजदूरों के, वेश्याओं के, दृष्टिबाधितों के, खिलाड़ियों के, डाकुओं, पत्रकारों और भूमाफ़िया के मुद्दों को विषय बनाकर बनाई गई फ़िल्मों का भी विशद विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक के लिए सामग्री का चयन करने और उसको संयोजित करने में जो अथक परिश्रम किया गया है वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। हिन्दी में सिनेमा पर इतनी समृद्ध किताब मैंने दूसरी नहीं पढ़ी। इसकी भाषा इतनी सरल और सुगम है कि सामान्य पाठक और सिनेमा के शोधार्थियों—दोनों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है।

—शिवमूर्ति

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2026
Weight
330 grams
ISBN-13
9789347043932
Pages
328
Reading time
~11 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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