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Kavi Shailendra : Zindagi Ki Jeet Mein Yakeen

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कुछ अकेले नहीं हैं और पहले भी नहीं हैं—शैलेन्द्र, विद्वज्जनों ने जिनकी ओर नज़र नहीं डाली—ऐसे अनेकानेक लोककवि हैं। यूँ हर ज़माने ने अपने ज़माने की लोकरचना की सादगी की संश्लिष्टता को स्वीकार करने में कोताही की—और होकर यूँ रहा कि समय के साथ वह रंग और गहरा होता चला गया। पीढ़ियाँ-दर-पीढ़ियाँ उनके शब्दों में ज़िन्दगी के नए मायने तलाशती रहीं। शैलेन्द्र के गीत हमारे बचपन की गुनगुनाहटों में शामिल होकर आज तक हमसफ़र हैं। दुनिया-भर की पुरकशिश कविता की तरह उन्होंने ज़िन्दगी की पुरपेच गलियों में आलोकित राजपथ प्रशस्त किया। इतने सरल और लुभावने कि आवारामिज़ाजी से ज़ुबाँ पर चढ़ जाएँ, क़दम-ब-क़दम ज़िन्दगी के फ़लसफ़े में तब्दील होते हुए। अपनी मासूम गुनगुनाहटों के शब्द के फ़नकार का नाम हमें सालों बाद पता चला और इस परिचय के ऊषाकाल में ही वह सितारा टूट गया। जब शैलेन्द्र ने आत्मघात किया, हम उन्नीस साल के थे। इसके चंद महीने पहले ही शैलेन्द्र निर्मित एकमात्र फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ प्रदर्शित हुई थी। नहीं मालूम सच है या झूठ, लेकिन कहा जाता है कि शैलेन्द्र को यक़ीन था, इसे ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ मिलेगा—और मिला, लेकिन वह दिन देखने के लिए शैलेन्द्र नहीं थे। जनकवि शैलेन्द्र के बहुआयामी रचनात्मक अवदान का आकलन करने की विनम्र कोशिश है यह पुस्तक।

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कुछ अकेले नहीं हैं और पहले भी नहीं हैं—शैलेन्द्र, विद्वज्जनों ने जिनकी ओर नज़र नहीं डाली—ऐसे अनेकानेक लोककवि हैं। यूँ हर ज़माने ने अपने ज़माने की लोकरचना की सादगी की संश्लिष्टता को स्वीकार करने में कोताही की—और होकर यूँ रहा कि समय के साथ वह रंग और गहरा होता चला गया। पीढ़ियाँ-दर-पीढ़ियाँ उनके शब्दों में ज़िन्दगी के नए मायने तलाशती रहीं।

शैलेन्द्र के गीत हमारे बचपन की गुनगुनाहटों में शामिल होकर आज तक हमसफ़र हैं। दुनिया-भर की पुरकशिश कविता की तरह उन्होंने ज़िन्दगी की पुरपेच गलियों में आलोकित राजपथ प्रशस्त किया। इतने सरल और लुभावने कि आवारामिज़ाजी से ज़ुबाँ पर चढ़ जाएँ, क़दम-ब-क़दम ज़िन्दगी के फ़लसफ़े में तब्दील होते हुए।

अपनी मासूम गुनगुनाहटों के शब्द के फ़नकार का नाम हमें सालों बाद पता चला और इस परिचय के ऊषाकाल में ही वह सितारा टूट गया। जब शैलेन्द्र ने आत्मघात किया, हम उन्नीस साल के थे। इसके चंद महीने पहले ही शैलेन्द्र निर्मित एकमात्र फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ प्रदर्शित हुई थी। नहीं मालूम सच है या झूठ, लेकिन कहा जाता है कि शैलेन्द्र को यक़ीन था, इसे ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ मिलेगा—और मिला, लेकिन वह दिन देखने के लिए शैलेन्द्र नहीं थे।

जनकवि शैलेन्द्र के बहुआयामी रचनात्मक अवदान का आकलन करने की विनम्र कोशिश है यह पुस्तक।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
3rd
Publication year
2005
Weight
324 grams
ISBN-13
9788126710010
Pages
148
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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