Paanv Tale Ki Doob
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‘पाँव तले की दूब’ कथित सभ्य समाज की ओर से शोषण-उत्पीड़न की शक्ल में लम्बे समय से जारी उन अस्तित्वघाती हमलों को रेखांकित करता है जिनसे आदिवासी समाज निरन्तर जूझ रहा है। शासन-सत्ता की विकास-नीति आदिवासियों के परम्परागत अधिकारों और संसाधनों को ही नहीं, प्रकृति के साहचर्य में रची-बसी उनकी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने पर तुली है। यह संकट उनके अन्धविश्वासों और रूढ़ियों से जुड़कर और भीषण हो उठता है। ऐसा नहीं है कि उनमें चेतना नहीं है, प्रतिरोध नहीं है; यह सब है लेकिन उनमें भी भटकाव आता है, वे भी भ्रमित होते हैं; अपने चारों तरफ छाये घटाटोप में कई बार वे अपने किसी हितचिन्तक को पहचानने में भी भूल कर बैठते हैं... इन उतार-चढ़ावों के बीच उनका जीवन-संघर्ष जारी है, उस दूब की तरह जो बार-बार कुचली जाने के बावजूद फिर से उग आती है। एक लेखक और एक पत्रकार के ज़रिये कही गई, झारखंड के आदिवासी जनजीवन की यह कथा किसी भी संवेदनशील पाठक को बेचैन कर देगी। प्रख्यात कथाकार संजीव के जनोन्मुख लेखन का अविस्मरणीय उदहारण!
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‘पाँव तले की दूब’ कथित सभ्य समाज की ओर से शोषण-उत्पीड़न की शक्ल में लम्बे समय से जारी उन अस्तित्वघाती हमलों को रेखांकित करता है जिनसे आदिवासी समाज निरन्तर जूझ रहा है। शासन-सत्ता की विकास-नीति आदिवासियों के परम्परागत अधिकारों और संसाधनों को ही नहीं, प्रकृति के साहचर्य में रची-बसी उनकी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने पर तुली है। यह संकट उनके अन्धविश्वासों और रूढ़ियों से जुड़कर और भीषण हो उठता है। ऐसा नहीं है कि उनमें चेतना नहीं है, प्रतिरोध नहीं है; यह सब है लेकिन उनमें भी भटकाव आता है, वे भी भ्रमित होते हैं; अपने चारों तरफ छाये घटाटोप में कई बार वे अपने किसी हितचिन्तक को पहचानने में भी भूल कर बैठते हैं... इन उतार-चढ़ावों के बीच उनका जीवन-संघर्ष जारी है, उस दूब की तरह जो बार-बार कुचली जाने के बावजूद फिर से उग आती है।
एक लेखक और एक पत्रकार के ज़रिये कही गई, झारखंड के आदिवासी जनजीवन की यह कथा किसी भी संवेदनशील पाठक को बेचैन कर देगी।
प्रख्यात कथाकार संजीव के जनोन्मुख लेखन का अविस्मरणीय उदहारण!
Book Details
-
ISBN9789377370350
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Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बाल और किशोर पाठकों के लिए सुप्रसिद्ध कथाकार संजीव का अनन्य उपहार है—‘दिन बनने के लिए’। इस संग्रह की कहानियाँ जितनी मनोरंजक हैं उतनी ही विचारपरक। ये हमारे आसपास जड़ जमाये बैठे अन्धविश्वासों और रूढ़िवादी परम्पराओं की निरर्थकता को चुटीले ढंग से उजागर करती हैं, तार्किक-वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं और समाज के वास्तविक उन्नायकों से परिचित कराती हैं। निश्चय ही इन कहानियों का एक स्पष्ट सन्देश है, जो इस पुस्तक के नाम से भी ज़ाहिर होता है : दिन बनने के लिए तिमिर को भरकर अंक जलो! फिर भी ये उपदेश देने की बोझिल मुद्रा से मुक्त हैं और कहीं भी सरसता से दूर नहीं जातीं। वास्तव में ये कहानियाँ सचाई का साक्षात्कार कराती हैं और उस सोच को सम्बल देती हैं जो पाठकों को लकीर का फ़कीर बनाने के बजाय जायज़ सवाल उठाने के लिए उकसाता है। बेहद पठनीय और संग्रहणीय
Agyey Upanyas Sanchayan
- Author Name:
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya' +1
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अज्ञेय हिन्दी के बहुआयामी, साथ ही विवादास्पद लेखक हैं। प्रेमचन्दोत्तर काल में ‘गोदान’ के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के बाद मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद का यह मॉडल इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि इसकी प्रभावछाया में साहित्य का एक बड़ा भाग आता जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया, भारतीय स्वाधीनता-संग्राम, साहित्य में पश्चिमी प्रभाव की छाया, किशोर से युवा के बीच के कालखंड, युवा मन के अन्तर्द्वन्द्व, अहंकार, विद्रोह और सेक्स के नकारने-स्वीकारने की मनःस्थितियाँ, प्रयोग, रूमानियत से लबरेज़ तरल लाक्षणिक विडम्बनात्मक व्यंजना में रसे-बसे हैं अज्ञेय के उपन्यास—‘शेखर एक जीवनी’ (दो भाग), ‘नदी के द्वीप’ और ‘अपने-अपने अजनबी’। ‘शेखर एक जीवनी’ में एक विद्रोही की निर्मिति उसके घात-प्रतिघात से उसके विकसित या विपर्ययग्रस्त होने की दास्तान है। क़िस्सागोई के अभ्यस्त पाठकों को इस उपन्यास में एक नया ही अस्वाद मिलेगा—स्मृतियों का विश्लेषण, परिनिष्ठित काव्यात्मक और व्यंजनात्मक भाषा की बौद्धिकता की तप्त ख़ुशबू। ‘नदी का द्वीप’ अपनी काव्यात्मक सूक्ष्म दृश्यात्मक परिनिष्ठित भाषा, प्रेम की उदात्तता, व्यंजना और बौद्धिकता के स्तर पर ‘शेखर एक जीवनी’ की अगली कड़ी है जिसमें रेखा, गौरा, भुवन का या फिर इनके साथ चन्द्र मोहन का एक त्रिकोण बनता है जो गहरे झाँकने पर कामायनी के श्रद्धा, इड़ा, मनु के त्रिकोण का प्रतिबिम्ब लग सकता है। प्रेम कथाएँ चाहे अनचाहे त्रिकोणात्मक बन ही जाती हैं, जिनमें किसी-न-किसी कोण को स्थगित होना होता है। तीसरा उपन्यास ‘अपने-अपने अजनबी’ इस अर्थ में प्रायोगिक और प्रायोजित उपन्यास है, वहाँ जान-बूझकर एक नाटकीय स्थिति का निर्माण किया गया है। इस स्थिति में मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही दो औरतें हैं—‘योके’ और ‘सेल्मा’। पृष्ठभूमि विदेशी, ‘योके’ युवा है और ‘सेल्मा’ वृद्धा। बर्फ़ का पहाड़ टूटकर उस घर पर गिरा है और दोनों औरतें एक तरह से बर्फ़ की क़ब्र में क़ैद हो गई हैं। तथता के शिल्पकार अज्ञेय काव्य-भाषा, व्यंजना और आत्मवाची कथा संरचना करते चलते हैं। पात्र भी उन्होंने ऐसे ही विशिष्ट चुने हैं। उपन्यास का ढाँचा भी परम्परागत उपन्यास लेखन से विद्रोह है।
—भूमिका से
Prarthana
- Author Name:
Sanjeev
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नई-नई कथा-भूमियों में पहुँचकर, मनुष्य के जीवन और जिजीविषा की अदेखी अजानी सचाइयों को उद्घाटित करने में संजीव का सानी नहीं है। भारतीय समाज के जटिल से जटिलतर होते गए जन-जीवन के यथार्थ को जिस सूक्ष्मता से उन्होंने अपनी कहानियों में उकेरा है, वह न केवल उनके अनुभव-संसार की व्यापकता का प्रमाण है, बल्कि उस उत्तरदायित्व का भी जो एक लेखक के रूप में अपने लिए उन्होंने ख़ुद चुना है।
यह संवेदना, यह दायित्व-भावना ही उनकी कहानियों का और उनके सम्पूर्ण लेखन का आधार है। इसीलिए उनकी कहानियाँ जादू और यथार्थ से मुक्ति जैसे जुमलों से बेअसर रहते हुए पाठक को उस संसार में ले जाकर खड़ा कर देती हैं जो जितना विस्मित करता है, उतना ही बेचैन। उस संसार से रू-ब-रू होना एक स्तर पर तकलीफ़देह भी है, इसलिए कि उसमें हम ख़ुद को बारहा अपने ही सामने खड़ा पाते हैं, हर झूठ और हर आवरण से परे। लेकिन ठीक यहीं ये कहानियाँ हमें आश्वस्त भी करती हैं, क्योंकि सच से गुज़रते हुए हम आदमियत के उस सिरे को और ज़ोर से पकड़ने लगते हैं जो हम से लगातार छूटता जा रहा है।
प्रार्थना में संकलित कहानियाँ न केवल संजीव के कहानी-संसार के उल्लेखनीय शिखर हैं, बल्कि हिन्दी कहानी के लिए भी उपलब्धि हैं।
Punarutthan
- Author Name:
Leo Tolstoy +1
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आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था।
‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है।
‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है।
Chittakobara
- Author Name:
Mridula Garg
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जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि पूरी पुस्तक में एक अन्तर्धारा बहती हुई दीखती है और एकसूत्रता भी आसानी से पकड़ में आती है। इस उपन्यास में परिच्छेद नहीं हैं। मैं जानती हूँ, जीवन की इतनी प्रवहमान धारा को टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। अन्दर के दबाव के कारण ही शायद यह हो सका है कि क्षणों में जी और लिखी गई इस कहानी के टुकड़ों का क्रम भी बाद में तय हुआ। दरअसल, बहती नदी से किसी किनारे खड़े होकर पानी पियो - क्या फर्क पड़ता है! क्रम-निर्धारण का पूर्वग्रह तो कहानी गढ़ने में होता है; जो कहानी है, वह तो...कोई कहीं से भी साथ हो ले... - इसी पुस्तक से
Suhag Ke Nupur
- Author Name:
Amritlal Nagar
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
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