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वरिष्ठ कथाकार संजीव का यह उपन्यास सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की एक ऐसी गुत्थी हमारे सामने खोलता है, जो जितनी हैरतअंगेज़ है उतनी ही भयावह भी। मनुष्य ने लाखों साल पहले पेट की भूख शान्त करने के लिए शिकार अर्थात् अहेर करना शुरू किया था। लेकिन सभ्यता-संस्कृति के विकास के साथ-साथ उसने न सिर्फ़ तरह-तरह के साधन और कौशल अर्जित किए, बल्कि तमाम तरह की भूख भी इकट्ठा की—कुछ इस क़दर कि उनकी पूर्ति के लिए आज मनुष्य-समाज स्वयं अहेर और अहेरी—शिकार और शिकारी—में बँट चुका है। यह उपन्यास दिखलाता है कि अहेरी बने लोग अपने हिंस्र चेहरे पर संस्कृति, परम्परा, आस्था, विरासत और मर्यादा के मुखौटे चढ़ाए फिर रहे हैं। उनकी असल चिन्ता अपने वर्चस्व को बनाए रखने और अपने हितों को सुरक्षित रखने की है। इस गहन बनैले वक़्त में क्या कोई बदलाव सम्भव है? इसका जवाब उपन्यास के उन किरदारों से मिलता है जो अहेर के थोथे अभियान से अपने गाँव को मुक्त कराने की पहल करते हैं और जल्द ही अकेले पड़ जाते हैं। उन्हें जान देनी पड़ती है। लेकिन उनकी असफलता उनके परिवर्तनकामी स्वप्न का अन्त नहीं है। एक बेहतर मानवीय समाज के निर्माण को अपने लेखन का उद्देश्य माननेवाले संजीव, इस उपन्यास में उस त्रासदी को भी बख़ूबी रेखांकित करते हैं, जिसमें अहेरी बने घूम रहे लोग ख़ुद भी अहेर बन रहे हैं—अपनी ही व्यर्थ हो चुकी मान्यताओं का, वक़्त से बाहर की जा चुकी परम्पराओं का। विरल ग्रामीण परिवेश में विन्यस्त एक असाधारण कथा को समेटे इस उपन्यास की अत्यधिक पठनीयता को रेखांकित करने के लिए किसी ‘जादुई’ अलंकार की आवश्यकता नहीं है।
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वरिष्ठ कथाकार संजीव का यह उपन्यास सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की एक ऐसी गुत्थी हमारे सामने खोलता है, जो जितनी हैरतअंगेज़ है उतनी ही भयावह भी। मनुष्य ने लाखों साल पहले पेट की भूख शान्त करने के लिए शिकार अर्थात् अहेर करना शुरू किया था। लेकिन सभ्यता-संस्कृति के विकास के साथ-साथ उसने न सिर्फ़ तरह-तरह के साधन और कौशल अर्जित किए, बल्कि तमाम तरह की भूख भी इकट्ठा की—कुछ इस क़दर कि उनकी पूर्ति के लिए आज मनुष्य-समाज स्वयं अहेर और अहेरी—शिकार और शिकारी—में बँट चुका है। यह उपन्यास दिखलाता है कि अहेरी बने लोग अपने हिंस्र चेहरे पर संस्कृति, परम्परा, आस्था, विरासत और मर्यादा के मुखौटे चढ़ाए फिर रहे हैं। उनकी असल चिन्ता अपने वर्चस्व को बनाए रखने और अपने हितों को सुरक्षित रखने की है। इस गहन बनैले वक़्त में क्या कोई बदलाव सम्भव है? इसका जवाब उपन्यास के उन किरदारों से मिलता है जो अहेर के थोथे अभियान से अपने गाँव को मुक्त कराने की पहल करते हैं और जल्द ही अकेले पड़ जाते हैं। उन्हें जान देनी पड़ती है। लेकिन उनकी असफलता उनके परिवर्तनकामी स्वप्न का अन्त नहीं है। एक बेहतर मानवीय समाज के निर्माण को अपने लेखन का उद्देश्य माननेवाले संजीव, इस उपन्यास में उस त्रासदी को भी बख़ूबी रेखांकित करते हैं, जिसमें अहेरी बने घूम रहे लोग ख़ुद भी अहेर बन रहे हैं—अपनी ही व्यर्थ हो चुकी मान्यताओं का, वक़्त से बाहर की जा चुकी परम्पराओं का। विरल ग्रामीण परिवेश में विन्यस्त एक असाधारण कथा को समेटे इस उपन्यास की अत्यधिक पठनीयता को रेखांकित करने के लिए किसी ‘जादुई’ अलंकार की आवश्यकता नहीं है।
Book Details
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ISBN9789389598094
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Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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“परमानन्द की यह अनुभूति कहाँ से जनमती है? यह उत्पन्न होती है प्रेम से, ज़मीन से जुड़ा प्रेम, उस प्रकाश से जुड़ा प्रेम जो पहाड़ियों के नक़ूश पैने करता है, उन्हें देवताओं के लिए सँवारता है। यह अनुभूति उत्पन्न होती है उस परितृप्त जीवन से जो नदियों और पेड़ों के परिपार्श्व में पनपता है, यह लड़ने, हारने और हार कर एक बार फिर से जूझने के लिए उठ खड़े होने से उत्पन्न होती है, और यह एक दिन, हम पर हमेशा के लिए यह ज़ाहिर होने से उत्पन्न होती है कि ज़िन्दगी और ज़मीन एक-दूसरे से कैसे नाभि-नालबद्ध हैं।” इतिहास, मिथक और समकालीन राजनीति को समेटते हुए ‘ज़मीन’ एक निहायत सुन्दर, किन्तु अशान्त प्रदेश और इसके रहवासियों की गाथा है। इसकी मार्फ़त कवि-उपन्यासकार ममंग दई हमें एक अविस्मरणीय यात्रा पर ले चलती हैं—काल के बन्धनों से परे कोजुम-कोजा की पवित्र भूमि से आधुनिक राज्य के रूप में अरुणाचल प्रदेश के गठन तक की यात्रा। मेइंग, जो अपने राज्य से दूर रहती है, अपने लोगों के इतिहास को दर्ज करने के लिए लौटती है—उन लोगों का इतिहास जिन्हें वह जानती है और जिन्होंने उसकी ‘ज़मीन’ को वास्तविक आकार दिया है। उनसे बातें करने, पुराने दस्तावेज़ों को उलटने-पुलटने के क्रम में असंख्य कथाएँ-उपकथाएँ सामने आती हैं, मानो तारों से खचित किसी झील का प्राचीन पानी उफनकर बाहर आने लगा हो। एक-एक कर सारे पात्र अपनी सम्पूर्णता व एक-अपर से सम्बद्धता के साथ सामने आने लगते हैं—वह संघर्ष और जिज्ञासा जो ‘नेफा’ (नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) की स्थापना की नींव में थी, लिपुन जैसे साहसी पुरुष और महिलाएँ जिन्होंने ऊँचे और अलंघ्य पर्वत दर्रों और घने जंगलों को पार कर दूरस्थ जनजातियों के बीच पुलों का निर्माण किया, ‘बारिशवाला’ जो प्रकृति के अबूझ इशारों को पढ़-समझ सकने में सक्षम है क्योंकि वह उससे गहरे जुड़ा हुआ है, उम्सी जो अपने आत्म की खोज में दूर-दुर्गम की यात्रा पर निकल जाती है, और लुतोर, जो अपनी जनता की नब्ज़ को परखने का हुनर रखता है, भले ही सार्वजनिक जीवन से उसका मोहभंग हो चुका है। इन सबके अलावा वहाँ भूमि और वन माफिया भी हैं, हिंसक उपद्रवियों से साँठ-गाँठ रखने वाले भ्रष्ट राजनेता हैं, ऐसे दोस्त हैं जो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जानी दुश्मन में बदल सकते हैं। गीतात्मक, जीवन्त और महाकाव्यात्मक विस्तार लिये हुए ‘ज़मीन’ ऐसे लोगों और स्थान का आख्यान है, जो सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों की तरह, अपनी चौहद्दी को लाँघता हुआ समस्त मानवता की गाथा बन जाता है।
Ashes & Fire
- Author Name:
Prof.. Vikas Sharma
- Book Type:


- Description:
ऐशेज एंड फायर' में आधुनिक लक्ष्मीबाई की तस्वीर को एक विजयी महिला के रूप में चित्रित किया गया है, जिसे गाजियाबाद के गैंगस्टरों ने राख में बदल दिया है। एनसीसी की पूर्व अवर अधिकारी होने के नाते उसने अपने तीन बच्चों को पालने के लिए जीवन की चुनौतियों का सामना किया। बेशक, नाना और लेडी चैटरली की तरह, कामेच्छा उसकी कमजोरी थी, फिर भी उसने पुरुष प्रधान समाज में अपनी नौकरी और संस्थान की रक्षा के लिए नए गैंगस्टरों का सामना किया। दूसरे पति के आधे - पागलपन और मतिभ्रम के बावजूद, उसने कठिन परिस्थितियों के आगे समर्पण नहीं किया। उसने अपने पिता के प्रति एहसानमंद महसूस किया क्योंकि उन्होंने जीवन के हर कदम पर उसकी देखभाल की। प्रस्तुत उपन्यास यथार्थवाद के ऐसे ही विभिन्न रंगों पर लिखी एक रचना है, एक आधुनिक साहसी महिला की कठिनाइयों और रोमांच का लेखा-जोखा है। आखिरकार, सुविधा ने अपने मानसिक साहस और सबलता को साबित किया और अंततः सफलता हासिल की। हर दृष्टि से एक आनंददायक उपन्यास ।
Dikku
- Author Name:
Devidasa Kadam +1
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The novel Dika, which means "direction" in Konkani, tells the story of a farming family from the lower middle class. It is set in the North Kanara district of Karnataka and offers a vivid portrayal of the socio-cultural life of the region's inhabitants. The plot follows Deepak and his family as they struggle to adapt to a new way of life in their village after the sudden death of Deepak's father, a policeman. Along the way, they encounter various challenges, including problematic villagers, conniving relatives, and blind faith. When Deepak's sister falls in love with a Muslim boy, he must confront societal norms and convince his mother to accept their relationship. Ultimately, Deepak leads his family to a new and free existence, breaking free from the constraints imposed on them by society. This is best exemplified in the novel's closing scene, where Deepak witnesses a lone crow moving eastward, away from its flock, in a new direction.
Deh Ki Keemat
- Author Name:
Tejendra Sharma
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Description Awaited
Shailoosh
- Author Name:
Shiv Prashad Singh
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खानाबदोश नटों के जीवन, संस्कृति, उनकी यायावरी और भावनात्मक पक्ष पर केन्द्रित शिवप्रसाद सिंह के अत्यन्त चर्चित उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास में जरायमपेशा और हमेशा चलते रहने वाले नटों की जिन्दगी के आँखों देखे विवरणों के साथ उन्होंने अपने शोध व अनुसन्धान से प्राप्त तथ्यों को भी शामिल किया है। एक कबीलाई जीवन-शैली की यह कथा हमारी कई नैतिक धारणाओं और सामाजिक पूर्वग्रहों को भी तोड़ती है, और हमें एक अलग ढंग के जीवन से परिचित कराती है। नट समाज के जीवन में आने वाले बाहरी दबावों और उनके अपने दायरे के विभिन्न पहलुओं को समेटते हुए इस उपन्यास में भाषा का प्रयोग भी उपन्यासकार ने अत्यन्त सामर्थ्य के साथ किया है और शिक्षित समाज की दृष्टि को एक ओर रखकर नटों के जीवन की एक प्रामाणिक कथा रची है।
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