Shukdev Singh

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शुकदेव सिंह कबीर, रैदास, कीनाराम और गोरखनाथ को लेकर सारी दुनिया में अपनी नई व्याख्याओं की हलचल रहे प्रो. शुकदेव सिंह हिन्दी में भी भुवनेश्वर, धूमिल के लिए विख्यात रहे। आलोचना में हमेशा अपनी नई नज़र से किताबी लोगों को बेचैन कर देते। कबीर पर प्रायः सात वर्षों तक अमेरिका, लन्दन, मेक्सिको, दिल्ली, कोलकाता, बनारस, राजस्थान, महाराष्ट्र और बिहार में उन्होंने विचार का मन्थन कराया। एक हज़ार गोष्ठियाँ, आठ-दस लघु फ़िल्में उन्हीं की सहायता से उनके शब्दों को सूँघ-सूँघकर बनीं। उन्होंने दलित साहित्य-मर्मी के रूप में राष्ट्रपति भवन से लेकर विश्वविद्यालयों और चमटोल तक अपना अलख जगाया। आज उनकी छुई-अनछुई कई चमटोलें अम्बेडकर ग्राम के गौरव से मंडित हैं। बनारस जैसे सवर्ण ढाँचे के नगर में अब रैदास स्मारक, घाट, गेट, पार्क, जन्म मन्दिर, संस्थान, अकादमी, रैदास नगर अर्थात् ‘जेता विप्र तेता रैदास’ की स्थिति है। प्रो. सिंह काशी विश्वनाथ मन्दिर के ट्रस्टी भी थे और रैदास अकादमी के निदेशक भी। उनके अनुवादों के अनुवाद अंग्रेज़ी, इटैलियन, जापानी और रूसी भाषा में भी हैं। उन्होंने मेक्सिको, अमेरिका, लन्दन, जर्मनी की कई यात्राएँ कीं। विश्व मान्यता प्राप्त दुनिया की सभी भाषाओं में भारतीय निर्गुण से सम्बन्धित उनके शिष्य, मित्र, सखा हैं। व्याकरण और साहित्य-पाठ की वे चलती पुस्तक वीथी रहे। उन्होंने कबीरपंथी लीक रमैनी, सबदी, साखी और कबीर वंशी कमाललीक साखी, सबद, रमैनी को ठीक-ठाक चिन्हित करते हुए कबीर के पाठ-सम्पादन का विज्ञान बदल दिया। इस दिशा में अधिकांश कार्य पूरा करके अन्तिम रूप भी दिया। गोरखनाथ को उन्होंने बिलकुल नए ढंग से पढ़ा। मूर्ति मन्दिर और शास्त्र के समानान्तर धर्मकीर्ति को पढ़ते हुए भारतीय समझ को नया रंग देना प्रारम्भ किया। कई झंडे गिरेंगे, कई लहराएँगे और विचारधारा की ऐसी-तैसी के लिए वे लोकायत आजीवक वार्तिककार, सिद्धनाथ, सूफ़ी, जोगी, मलंग और निहंग की समझ को ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’, ‘मन ही पूजा मन ही धूप’ से जोड़कर अस्सी प्रतिशत भारतीय जनता का तर्क तैयार कर चुके थे। निधन : 2007

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