Anand Mohan

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आनन्द मोहन आनन्द मोहन और आन्दोलन एक-दूसरे के पर्याय हैं। सतत संघर्ष के जीते-जागते प्रतीक हैं—आनन्द मोहन। बिहार के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी परिवार में वर्ष 1956 में जन्मे और सन् 1974 के 'सम्पूर्ण क्रान्ति’ की कोख से पैदा हुए आनन्द मोहन अपने जीवन के 18वें वसन्त में जे.पी. आन्दोलन से राजनीति में आए। एक बार विधायक और दो बार सांसद भी बने, परन्तु मूलत: वे क्रान्तिकारी ही रहे। लड़कपन से उनकी पहचान हठी, ज़िद्दी, ग़ुस्सैल, साहसी, बाग़ी और बेबाक छात्र-युवा नेता की रही। हठ—जिसे ठान लिया, उसे पूरा करने का हठ। ज़िद—लाख नुक़सान के बाद भी अपने फ़ैसलों और उसूलों पर डटे रहने की ज़िद। ग़ुस्सा—सड़ाँध पैदा करती यथास्थितिवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा। साहस—प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सच को सच और ग़लत को ग़लत कहने का साहस। बेबाक—अच्छा-बुरा, तीखा-तीता, ग़लत-सही, जो है उसे पीठ पीछे नहीं, सामने उगल देने की बेबाक़ी। मान्य रूढ़ियों, राजनीतिक ढाँचों, सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने तथा हर तरह के अन्याय, शोषण, विषमता और दमन पर दहाड़ने वाला—बाग़ी नेता, जिसे समय-समय पर मीडिया और आलोचकों ने कभी ‘एंग्री यंग मैन’, ‘राबिनहुड’, ‘फायर ब्रांड लीडर’ और न जाने कितने नामों से नवाज़ा। लेकिन इस बाग़ी, विद्रोही एवं सतत संघर्षशील व्यक्ति के अन्दर एक कल्पनाशील, कोमल, संवेदनशील, चिन्तनशील हृदय और मस्तिष्क भी है, कालान्तर में जिसे लोगों ने जाना और माना भी। वे संघर्ष के योजनाकार ही नहीं, साहित्य के शिल्पकार भी हैं। ज़ाहिर है, उनका साहित्य भी इनके विचार, चरित्र और संघर्षों का प्रतिबिम्ब होगा।

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