kirdar Zinda Hai
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Author:
Rekha KastwarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
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ज़िन्दगी में आस-पास उगे कैक्टस जैसे प्रश्न...। रचनाओं के किरदारों से उन प्रश्नों पर सोते-जागते होनेवाला संवाद...। मेरे भीतर की स्त्री ने सम्भावना की चिट्ठी रची। मैंने महसूस किया कि यह सिर्फ़ मेरे अन्दर की स्त्री नहीं थी। क्या यह तमाम दुनिया के अन्दर की सम्भावना थी? पर लोग तो कहते हैं, नस्ल, जाति, देश, काल के धरातल पर औरत के प्रश्न इतने अलग-अलग हैं कि कभी-कभी मुठभेड़ की मुद्रा में दिखाई देते हैं। जैसे कोई माँ बनकर ख़ुश होता है तो कोई मातृत्व से मुक्ति में राह ढूँढ़ रहा है, कोई परिवार के बाहर खड़ा अन्दर आने का दरवाज़ा खटखटा रहा है तो कोई कुंडी खोल बाहर जाने को छटपटा रहा है। ख़ैर! सम्भावना ने चिट्ठी रची, चिट्ठी की आत्मीयता और संवेदना ने लुब्रीकेशन का काम किया, पत्र लेखों ने अपना आकार लेना शुरू कर दिया। सही पते की तलाश तब भी पूरी कहाँ हुई। मेरा ख़ुद से सवाल था कि यह मैं किसके लिए लिख रही हूँ? सही पते कौन से हैं? आम औरत के जीवन के सवाल और किताबों के उनके पाठकों तक पहुँचाने में, मैं क्या कोई पुल का काम कर सकती हूँ? मेरे लिए मेरे किरदार महत्त्वपूर्ण थे, जो आम ज़िन्दगी के प्रश्नों के वाहक बने। लोगों ने मेरी चिट्ठी में पात्र खोजे, प्रश्नों से साक्षात्कार किया, फिर कहा कि किताब तक कहाँ और कैसे जाएँ, आप कहानी सुना दें। मेरी किताबें गले लगकर रोईं, मुझे लताड़ा भी...लोगों के पास हम तक आने का वक़्त नहीं बचा, ‘जिस्ट’ चाहिए...। हमारा भविष्य तो लाइब्रेरियों में दब के दम घुटकर मरने या फिर ‘राइट ऑफ़’ होकर जल-मरने में है। तुम हमारी कहानी सुना दो उन्हें, वे चलकर नहीं आएँगे हम तक...। कितनी रातें हम साथ-साथ सुबके हैं। हाँ, तो सवाल था कि सही पते कौन से हैं, मेरे लेखक मित्रों ने चिकोटी काटी...किसी ‘नामवर’ तक पहुँची तुम्हारी चिट्ठी? अनाम मोहिनी देवियों की कहानी के इस्तरी-बिस्तरी विमर्श से बुद्धिजीवियों को क्या लेना-देना! आप समाज से सीधे बात करना चाहती हैं, आँकड़ों-वाँकड़ों का खेल समाजशास्त्री खेलते हैं। मैंने चुपचाप रहना ठीक समझा...समाजशास्त्रियों के अपने तर्क थे—वैज्ञानिक दृष्टि से बात कीजिए। ये साहित्यिक भाषा, संवेदना, आत्मीयता...। अरे, तटस्थ होकर सोचिए...! चिट्ठियों को सही पते की तलाश है...यूँ जानती हूँ, ऊपर लिखे सारे पते सही हैं।
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ज़िन्दगी में आस-पास उगे कैक्टस जैसे प्रश्न...। रचनाओं के किरदारों से उन प्रश्नों पर सोते-जागते होनेवाला संवाद...। मेरे भीतर की स्त्री ने सम्भावना की चिट्ठी रची। मैंने महसूस किया कि यह सिर्फ़ मेरे अन्दर की स्त्री नहीं थी। क्या यह तमाम दुनिया के अन्दर की सम्भावना थी? पर लोग तो कहते हैं, नस्ल, जाति, देश, काल के धरातल पर औरत के प्रश्न इतने अलग-अलग हैं कि कभी-कभी मुठभेड़ की मुद्रा में दिखाई देते हैं। जैसे कोई माँ बनकर ख़ुश होता है तो कोई मातृत्व से मुक्ति में राह ढूँढ़ रहा है, कोई परिवार के बाहर खड़ा अन्दर आने का दरवाज़ा खटखटा रहा है तो कोई कुंडी खोल बाहर जाने को छटपटा रहा है। ख़ैर! सम्भावना ने चिट्ठी रची, चिट्ठी की आत्मीयता और संवेदना ने लुब्रीकेशन का काम किया, पत्र लेखों ने अपना आकार लेना शुरू कर दिया। सही पते की तलाश तब भी पूरी कहाँ हुई। मेरा ख़ुद से सवाल था कि यह मैं किसके लिए लिख रही हूँ?
सही पते कौन से हैं? आम औरत के जीवन के सवाल और किताबों के उनके पाठकों तक पहुँचाने में, मैं क्या कोई पुल का काम कर सकती हूँ? मेरे लिए मेरे किरदार महत्त्वपूर्ण थे, जो आम ज़िन्दगी के प्रश्नों के वाहक बने। लोगों ने मेरी चिट्ठी में पात्र खोजे, प्रश्नों से साक्षात्कार किया, फिर कहा कि किताब तक कहाँ और कैसे जाएँ, आप कहानी सुना दें। मेरी किताबें गले लगकर रोईं, मुझे लताड़ा भी...लोगों के पास हम तक आने का वक़्त नहीं बचा, ‘जिस्ट’ चाहिए...। हमारा भविष्य तो लाइब्रेरियों में दब के दम घुटकर मरने या फिर ‘राइट ऑफ़’ होकर जल-मरने में है। तुम हमारी कहानी सुना दो उन्हें, वे चलकर नहीं आएँगे हम तक...। कितनी रातें हम साथ-साथ सुबके हैं।
हाँ, तो सवाल था कि सही पते कौन से हैं, मेरे लेखक मित्रों ने चिकोटी काटी...किसी ‘नामवर’ तक पहुँची तुम्हारी चिट्ठी? अनाम मोहिनी देवियों की कहानी के इस्तरी-बिस्तरी विमर्श से बुद्धिजीवियों को क्या लेना-देना! आप समाज से सीधे बात करना चाहती हैं, आँकड़ों-वाँकड़ों का खेल समाजशास्त्री खेलते हैं। मैंने चुपचाप रहना ठीक समझा...समाजशास्त्रियों के अपने तर्क थे—वैज्ञानिक दृष्टि से बात कीजिए। ये साहित्यिक भाषा, संवेदना, आत्मीयता...। अरे, तटस्थ होकर सोचिए...! चिट्ठियों को सही पते की तलाश है...यूँ जानती हूँ, ऊपर लिखे सारे पते सही हैं।
Book Details
-
ISBN9788126718979
-
Pages172
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हिन्दी में विमर्श-ग्रन्थों की दुर्दशा का एक कारण आत्ममन्थन की जगह आत्मश्लाघा का होना है। छोटे-बड़े मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें अवश्य की जाती हैं, पर रूढ़ियों में जकड़े व्यक्ति की नीयत उसकी देह-भाषा और बातचीत से ज़ाहिर हो ही जाती है। हिन्दी में उपलब्ध ज़्यादातर विमर्श-ग्रन्थों का यही द्वन्द्व है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति-केन्द्रित अनुभवों से ऊपर उठकर समष्टि मनुष्य के व्यापक हित की ओर ध्यान केन्द्रित करने की ज़रूरत है। आज प्रचलित सभी विमर्शों में स्त्री-विमर्श अपने सर्वव्यापी वैचारिक महत्त्व के कारण सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसका ताल्लुक़ संसार की आधी आबादी से है। वह आबादी जिसकी रचनात्मकता के सक्रिय योगदान से यह दुनिया अभी तक वंचित रही आई है; और जिसके योगदान को रेखांकित करने की कोई प्रविधि पुरुष की मनीषा ने अभी तक ईजाद नहीं की। आज के स्त्री-विमर्श का यह दायित्व है कि वह सभी वर्गों के लोगों की चेतना को इस दिशा में संवेदित करे। स्त्री-विमर्श का सचेतन प्रयास होना चाहिए कि सांस्कृतिक जन-जीवन को समग्रता के साथ ग्रहण कर समष्टि चिन्तन को व्यापक रूप दिया जाए। प्रस्तुत किताब इसी प्रयास को महत्ता के साथ रेखांकित करती है। यह किताब स्पष्ट करती है कि स्त्री-विमर्श के साथ मनुष्य-जीवन के सभी पक्षों व विषयों का उचित समायोजन हो, क्योंकि स्त्री-पक्ष और स्त्री-चिन्तन का सतत पुनर्वाचन एक ऐतिहासिक ज़रूरत है। विज्ञान और संचार-क्रान्ति की सम्भावनाओं में डूबते-उतराते ‘सांस्कृतिक-जनजीवन’ के समक्ष यह किताब स्त्री-विमर्श की राह को प्रशस्त तो करती ही है, साथ ही यह उम्मीद भी करती है कि ख़ुद के साथ समस्त जीवों की संवेदनात्मक तपिश व वैचारिक उधेड़बुन से उपजे कुछ तथ्य सामने आएँ, ताकि स्त्री-विमर्श को नव-अन्तरानुशासिक मार्ग से आगे बढ़ाया जा सके। इसमें सन्देह नहीं कि समकालीन स्त्री-चिन्तन, लिंग-संवेदना, स्त्री-प्रकृति, स्त्री-यौनिकता, देह-विमर्श, सांस्कृतिक संक्रमण, सिनेमा आदि विषयों के समायोजन में हिन्दी में यह पहला प्रयास है।
Paridhi Par Stri
- Author Name:
Mrinal Pande
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आज स्त्रियों के काम तथा राष्ट्रीय उत्पाद में उनके कुल योगदान का बड़ा महत्त्व राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर स्वीकार कर लिया गया है। यह भी मान लिया गया है कि एक पुरुष को साक्षर बनाने से एक व्यक्ति ही साक्षर होता है, जबकि एक स्त्री के शिक्षित होने से एक पूरा कुनबा! अकाट्य तौर से यह भी प्रमाणित हो चुका है, कि ग़रीबतम तबके की औरतों तक स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियों तथा सुविधाएँ पहुँचाए बिना संक्रामक रोगों अथवा आबादी पर अंकुश लगाना क़तई नामुमकिन है। इसलिए ज़रूरत है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की वर्तमान रपट का महत्त्व तथा शरणार्थी समस्या का यह अनदेखा पहलू हमारी सरकार भी समझे और इन उपेक्षित स्त्रियों में कौन हिन्दू है, कौन ग़ैर-हिन्दू, इसकी स्वार्थी विवेचना की बजाय उन तक ज़रूरी नागरिक सुविधाएँ और आजीविका के संसाधन पहुँचाने की यथाशीघ्र चेष्टा की जाए, वरना लाख प्रयत्नों के बावजूद राष्ट्रीय प्रगति सही रफ़्तार नहीं पकड़ पाएगी। कवि रहीम ने कहा भी था, कि जिस व्यक्ति को याचक बनकर जाना पड़ता है, वह तो जीते जी मरता है, पर उससे भी गया-गुज़रा वह है, जिसके मुँह से निकलता है ‘नहीं’। क्या इन अधमरी स्त्रियों की ज़रूरतों को जाति-धर्म की तुला पर तौलते हुए हम हर बार राष्ट्र के ज़मीर की हत्या नहीं करते हैं?
Mahila Adhikar
- Author Name:
Mamta Mehrotra
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यह समय ‘अस्मिता विमर्श’ का है। विमर्श सचेत करते हैं अधिकारों और दायित्वों के प्रति। विभिन्न स्तरों पर जारी ‘स्त्री विमर्श’ ने स्त्रियों से जुड़े अनेक सवालों को मुखर और प्रखर किया है। स्त्रियाँ स्वतंत्रता, सम्मान, समता और सहभागिता के लिए निरन्तर संघर्ष कर रही हैं। इस सन्दर्भ में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि भारत के संविधान ने महिलाओं को कौन-कौन से अधिकार दिए हैं। 'महिला सशक्तिकरण' को सच करते हुए क़ानून ने महिलाओं को क्या-क्या शक्तियाँ प्रदान की हैं। ज़ाहिर है कि इस लोकतंत्र में महिलाएँ यदि अपने अधिकारों को भली प्रकार जान जाएँ तो उनके 'अस्तित्व' का संघर्ष सरल और सकारात्मक हो जाएगा। ‘महिला अधिकार’ पुस्तक में ममता मेहरोत्रा ने मानवाधिकार को विश्व पटल पर रखकर स्त्री-प्रश्नों का विवेचन किया है। बीजिंग घोषणा-पत्र, वियना सम्मेलन—1993, भारतीय विधि आयोग की इक्कीसवीं रिपोर्ट के ज़रिए महिला अधिकारों के प्रति सामाजिक-वैधानिक सतर्कता का जायजा लिया गया है। सती प्रथा, डायन, विज्ञापन, मातृत्व, द्विविवाह, दहेज आदि पक्षों पर तर्कपूर्ण विचार करते हुए लेखिका ने इनके अनेक पक्षों का वर्णन किया है, विशेषत: क़ानूनी पक्ष का। पुस्तक की भाषा प्रवाहपूर्ण है, इसलिए पठनीयता भरपूर है। सचेत और सशक्त करती एक ज़रूरी किताब।
Dharm Aur Gender
- Author Name:
Ilina Sen +1
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जेंडरगत मानसिकता से ग्रस्त नागरिकों के निर्माण और पुनर्निर्माण में धर्म की भूमिका से सम्बन्धित अध्ययन की ज़रूरत सिर्फ़ यह मान लेने के चलते ही नहीं है कि धर्म रोज़मर्रा के हमारे जीवन के संरचनात्मक ढाँचे में रची-बसी एक प्रभावशाली संस्था है, बल्कि अब यह ज़रूरत इसलिए और ज़्यादा है क्योंकि वर्तमान राजनीतिक सन्दर्भ में हमारी अस्मिताओं को लामबन्द करने या मज़बूत बनाने में भी यह प्रभावी भूमिका निभा रहा है। यह संचयन दो भागों में विभाजित है। पहले भाग के अन्तर्गत दस आलेखों का संकलन है जो भारत, पाकिस्तान और चीन से सम्बन्धित हैं। इन आलेखों को तीन विषयवस्तुओं के तहत बाँटा गया है। पहली विषयवस्तु में शामिल तीन आलेख जाति और धर्म के बीच अन्तर्संवाद और उसके जेंडरगत परिणामों के बारे में सैद्धान्तिक चर्चा करते हैं। दूसरी विषयवस्तु में वे आलेख समाहित हैं जो भिन्न-भिन्न तरीक़ों से जेंडर का निर्माण करनेवाले सांस्थानिक मानकों और नियमों की श्रेष्ठता के आत्मसातीकरण की चर्चा करते हैं। तीसरी श्रेणी में उन लेखों को शामिल किया गया है जो सीधे तौर पर महिलाओं के आन्दोलन से सम्बन्धित हैं या जहाँ धर्म के साथ नारीवादी सम्बद्धता है। इस अन्तर्सम्बन्ध की अभिव्यक्ति अस्मिता-विमर्श, कट्टरपन्थी सामूहिकता या धार्मिक-राजनीतिक आन्दोलनों के रूप में होती है। संचयन के दूसरे भाग में धार्मिक दृष्टि से महिलाओं के आचरण-सम्बन्धी मानकों को निर्देशित करनेवाली हिन्दी और उर्दू की एक-एक प्रचलित पुस्तक (‘बहिश्ती जेवर' और ‘नारी शिक्षा') के चुनिन्दा हिस्सों को शामिल किया गया है। ये उपदेशात्मक पुस्तकें हिन्दू और मुस्लिम महिलाओं के आचरण और व्यवहार से जुड़ी जेंडरगत परम्पराओं को मज़बूत करती हैं। आशा है, पाठकों के सहयोग से यह शुरुआत एक सफल अंजाम तक पहुँचेगी।
Striyon Ki Paradhinta
- Author Name:
John Stuart Mill +1
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स्त्रियों की पराधीनता’ पुस्तक में मिल पुरुष-वर्चस्ववाद की स्वीकार्यता के आधार के तौर पर काम करनेवाली सभी प्रस्तरीकृत मान्यताओं-संस्कारों-रूढ़ियों को, और स्थापित कानूनों को तर्कों के ज़रिए प्रश्नचिह्नों के कठघरे में खड़ा करते हैं। निजी सम्पत्ति और असमानतापूर्ण वर्गीय संरचना के इतिहास के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ पाने के बावजूद, मिल ने परिवार और विवाह की संस्थाओं के स्त्री-उत्पीड़क, अनैतिक चरित्र के ऊपर से रागात्मकता के आवरण को नोच फेंका है और उन नैतिक मान्यताओं की पवित्रता का रंग-रोगन भी खुरच डाला है जो सिर्फ़ स्त्रियों से ही समस्त एकनिष्ठता, सेवा और समर्पण की माँग करती हैं और पुरुषों को उड़ने के लिए लीला-विलास का अनन्त आकाश मुहैया कराती हैं। पुरुष-वर्चस्ववाद की सामाजिक-वैधिक रूप से मान्यता प्राप्त सत्ता को मिल ने मनुष्य की स्थिति में सुधार की राह की सबसे बड़ी बाधा बताते हुए स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में पूर्ण समानता की तरफ़दारी की है। स्त्री-पुरुष समानता के विरोध में जो उपादान काम करते हैं, उनमें मिल प्रचलित भावनाओं को प्रमुख स्थान देते हुए उनके विरुद्ध तर्क करते हैं। वे बताते हैं कि (उन्नीसवीं शताब्दी में) समाज में आम तौर पर लोग स्वतंत्रता और न्याय की तर्कबुद्धिसंगत अवधारणाओें को आत्मसात् कर चुके हैं लेकिन स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के सन्दर्भ में उनकी यह धारणा है कि शासन करने, निर्णय लेने और आदेश देने की स्वाभाविक क्षमता पुरुष में ही है। स्त्री-अधीनस्थता की समूची सामाजिक व्यवस्था एकांगी अनुभव व सिद्धान्त पर आधारित है। मिल के अनुसार, प्राचीन काल में बहुत-से स्त्री-पुरुष दास थे। फिर दास-प्रथा के औचित्य पर प्रश्न उठने लगे और धीरे-धीरे यह प्रथा समाप्त हो गई लेकिन स्त्रियों की दासता धीरे-धीरे एक क़िस्म की निर्भरता में तब्दील हो गई। मिल स्त्री की निर्भरता को पुरातन दासता की ही निरन्तरता मानते हैं जिस पर तमाम सुधारों के रंग-रोगन के बाद भी पुरानी निर्दयता के चिह्न अभी मौजूद हैं और आज भी स्त्री-पुरुष असमानता के मूल में ‘ताक़त’ का वही आदिम नियम है जिसके तहत ताक़तवर सब कुछ हथिया लेता है। —सम्पादकीय से,
Stritva Se Hindutva Tak
- Author Name:
Charu Gupta
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प्रस्तुत पुस्तक का विषय है औपनिवेशिक उत्तर भारत में हिन्दू संगठनों, प्रचारकों और विचारों के सांस्कृतिक जगत में लिंग की केन्द्रीय भूमिका, यौनिकता का संकीर्ण विमर्श और साम्प्रदायिक उभार से इसके अन्तर्सम्बन्ध। अभिलेखागारों और प्रचलित साहित्य विधाओं के विशद शोध के ज़रिए यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार मुख्यतः मध्यवर्गीय हिन्दू प्रचारकों ने हिन्दी के प्रिंट-पब्लिक माध्यमों के इस्तेमाल से नए सामाजिक और नैतिक प्रतिमान गढ़ने, और एक विविध आबादी को एकरूप, आधुनिक हिन्दू समुदाय बनाने की कोशिश की। पुस्तक के पहले भाग में हिन्दू प्रचारकों की नैतिक और यौनिक चिन्ताएँ हैं। बाज़ारू साहित्य, कामोत्तेजक इश्तहार, लोकप्रिय संस्कृति, अश्लीलता, महिलाओं के मनोरंजन, शिक्षा और घरेलू परिदृश्यों की पड़ताल के ज़रिए लेखिका ने स्पष्ट किया है कि किस प्रकार एक ‘सम्माननीय’, ‘सुसंस्कृत’ हिन्दू सामाजिक और राजनैतिक पहचान बनाने के लिए इन सारे क्षेत्रों को पुनर्परिभाषित करने की कोशिशें हुईं। साथ ही इन प्रयासों के विरोध भी हुए, जिनसे हिन्दी साहित्य और हिन्दू पहचान की जटिलताओं और विषमताओं का भान होता है। दूसरे भाग में लिंग के प्रिज़्म से रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बढ़ता हुआ साम्प्रदायिककरण देखा गया है। लेखिका ने हिन्दू पुरुषत्व की चिन्ताओं, मुस्लिम मर्द की साँचेदार तस्वीर, अपहरण-विरोधी अभियान, गाज़ी मियाँ की आलोचना और विधवा-विवाह के बदलते विमर्श पर ध्यान देते हुए बताया है कि हिन्दू प्रचारक हिन्दू औरत और मुस्लिम मर्द के बीच मेल-जोल कैसे रोकना चाहते थे। इन सबके बीच, यह पुस्तक महिलाओं के हस्तक्षेप—नकार और प्रतिकार—की भी चर्चा करती है, जिससे हिन्दू पहचान की तस्वीर खंडित होती है।
Uttradhikar Banam Putradhikar
- Author Name:
Arvind jain
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“यह पुस्तक पितृसत्ता की लगभग सभी वैधानिक और संवैधानिक अभिव्यक्तियों पर लिपटे आवरणों को तार-तार करती जाती है। विधि सम्बन्धी स्त्री-विमर्श दीर्घकालीन संघर्ष में महत्त्वपूर्ण औज़ार की तरह इस्तेमाल हो सकता है।” —(‘हंस’; जून, 2000) “‘उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार’ पढ़कर स्वयं को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की आधुनिक नारी समझने का नशा हिरण हो जाता है। विश्वसुन्दरी, अधिकारी, प्रबन्धक, वर्किंग वूमेन या घर की लक्ष्मी, जो भी हो, तुम होश में आओ...इस किताब को पढ़ो; आधुनिक, आज़ादी और बराबरी के सारे दावों की हवा निकल जाएगी। यह किताब ख़ौफ़नाक तथ्यों की तह तक उजागर करती है।” -(‘नई दुनिया’, इन्दौर; 8 जुलाई, 2000) “इस पूरी पुस्तक को पढ़ने पर अरविन्द की यह बात सही मालूम होती है कि बीसवीं सदी के आरम्भ से लेकर अब तक अदालत, क़ानून और न्याय की भाषा-परिभाषा मूलत: स्त्री के प्रति अविश्वास, घृणा और अपमान से उपजी भाषा है।”—(‘साक्षात्कार’, अगस्त, 2000) “इस पुस्तक ने औरत की पक्षधर लोकतंत्र की चार सत्ताओं को बेनक़ाब कर दिया। इसने इस तथ्य को पुन: स्थापित किया कि पुरुष नि:स्वार्थ भाव से, पुरुष दमन से मुक़ाबले के लिए, औरत का रक्षाकवच और उसके दमन के विरुद्ध लावा बन सकता है। —(‘दैनिक नवज्योति’, जयपुर; 16 सितम्बर, 2000)
Choori Bazar Mein Ladki
- Author Name:
Krishna Kumar
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यह पुस्तक लड़कियों के मानस पर डाली जानेवाली सामाजिक छाप की जाँच करती है। वैसे तो छोटी लड़की को बच्ची कहने का चलन है, पर उसके दैनंदिन जीवन की छानबीन ही यह बता सकती है कि लड़कियों के सन्दर्भ में 'बचपन' शब्द की व्यंजनाएँ क्या हैं। कृष्ण कुमार ने इन व्यंजनाओं की टोह लेने के लिए दो परिधियाँ चुनी हैं। पहली परिधि है घर के सन्दर्भ में परिवार और बिरादरी द्वारा किए जानेवाले समाजीकरण की। इस परिधि की जाँच संस्कृति के उन कठोर और पैने औज़ारों पर केन्द्रित है जिनके इस्तेमाल से लड़की को समाज द्वारा स्वीकृत औरत के साँचे में ढाला जाता है। दूसरी परिधि है शिक्षा की जहाँ स्कूल और राज्य अपने सीमित दृष्टिकोण और संकोची इरादे के भीतर रहकर लड़की को एक शिक्षित नागरिक बनाते हैं। लड़कियों का संघर्ष इन दो परिधियों के भीतर और इनके बीच बची जगहों पर बचपन भर जारी रहता है। यह पुस्तक इसी संघर्ष की वैचारिक चित्रमाला है।
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