Mahila Adhikar
(0)
Author:
Mamta MehrotraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
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यह समय ‘अस्मिता विमर्श’ का है। विमर्श सचेत करते हैं अधिकारों और दायित्वों के प्रति। विभिन्न स्तरों पर जारी ‘स्त्री विमर्श’ ने स्त्रियों से जुड़े अनेक सवालों को मुखर और प्रखर किया है। स्त्रियाँ स्वतंत्रता, सम्मान, समता और सहभागिता के लिए निरन्तर संघर्ष कर रही हैं। इस सन्दर्भ में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि भारत के संविधान ने महिलाओं को कौन-कौन से अधिकार दिए हैं। 'महिला सशक्तिकरण' को सच करते हुए क़ानून ने महिलाओं को क्या-क्या शक्तियाँ प्रदान की हैं। ज़ाहिर है कि इस लोकतंत्र में महिलाएँ यदि अपने अधिकारों को भली प्रकार जान जाएँ तो उनके 'अस्तित्व' का संघर्ष सरल और सकारात्मक हो जाएगा। ‘महिला अधिकार’ पुस्तक में ममता मेहरोत्रा ने मानवाधिकार को विश्व पटल पर रखकर स्त्री-प्रश्नों का विवेचन किया है। बीजिंग घोषणा-पत्र, वियना सम्मेलन—1993, भारतीय विधि आयोग की इक्कीसवीं रिपोर्ट के ज़रिए महिला अधिकारों के प्रति सामाजिक-वैधानिक सतर्कता का जायजा लिया गया है। सती प्रथा, डायन, विज्ञापन, मातृत्व, द्विविवाह, दहेज आदि पक्षों पर तर्कपूर्ण विचार करते हुए लेखिका ने इनके अनेक पक्षों का वर्णन किया है, विशेषत: क़ानूनी पक्ष का। पुस्तक की भाषा प्रवाहपूर्ण है, इसलिए पठनीयता भरपूर है। सचेत और सशक्त करती एक ज़रूरी किताब।
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यह समय ‘अस्मिता विमर्श’ का है। विमर्श सचेत करते हैं अधिकारों और दायित्वों के प्रति। विभिन्न स्तरों पर जारी ‘स्त्री विमर्श’ ने स्त्रियों से जुड़े अनेक सवालों को मुखर और प्रखर किया है। स्त्रियाँ स्वतंत्रता, सम्मान, समता और सहभागिता के लिए निरन्तर संघर्ष कर रही हैं। इस सन्दर्भ में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि भारत के संविधान ने महिलाओं को कौन-कौन से अधिकार दिए हैं। 'महिला सशक्तिकरण' को सच करते हुए क़ानून ने महिलाओं को क्या-क्या शक्तियाँ प्रदान की हैं। ज़ाहिर है कि इस लोकतंत्र में महिलाएँ यदि अपने अधिकारों को भली प्रकार जान जाएँ तो उनके 'अस्तित्व' का संघर्ष सरल और सकारात्मक हो जाएगा।
‘महिला अधिकार’ पुस्तक में ममता मेहरोत्रा ने मानवाधिकार को विश्व पटल पर रखकर स्त्री-प्रश्नों का विवेचन किया है। बीजिंग घोषणा-पत्र, वियना सम्मेलन—1993, भारतीय विधि आयोग की इक्कीसवीं रिपोर्ट के ज़रिए महिला अधिकारों के प्रति सामाजिक-वैधानिक सतर्कता का जायजा लिया गया है। सती प्रथा, डायन, विज्ञापन, मातृत्व, द्विविवाह, दहेज आदि पक्षों पर तर्कपूर्ण विचार करते हुए लेखिका ने इनके अनेक पक्षों का वर्णन किया है, विशेषत: क़ानूनी पक्ष का। पुस्तक की भाषा प्रवाहपूर्ण है, इसलिए पठनीयता भरपूर है। सचेत और सशक्त करती एक ज़रूरी किताब।
Book Details
-
ISBN9788183616423
-
Pages124
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘संगतिन-यात्रा’ उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में दलित और शोषित महिलाओं के हक़ के लिए लड़ती सात ग्राम-स्तरीय महिला-कार्यकर्ताओं की ज़िन्दगी का सफ़रनामा है। नौ लेखिकाओं की क़लम से पिरोया यह सफ़रनामा सात औरतों की निजी डायरियों पर आधारित है। इसमें उन्होंने अपने बचपन, जवानी, शादी-ब्याह और मातृत्व की देहरी से लेकर गाँवों में किए अपने काम तथा उस काम से जुड़े हुए सपनों आदि को बहुत मार्मिकता से लिपिबद्ध किया है। इन कहानियों के माध्यम से लेखिकाओं ने बार-बार हमारा ध्यान उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचों और प्रक्रियाओं की ओर ले जाने की कोशिश की है, जो लिंग-भेद से जुड़े संघर्षों को जाति, वर्ग, मज़हबी भेदभाव और छुआछूत की ज़ंजीरों में जकड़े रहती हैं। साथ ही इसमें उन जटिलताओं और दिक़्क़तों को भी स्वर देने की भरसक कोशिश हुई है, जो आज के दौर में एनजीओ की दुनिया में गहरे तक पैठ गई हैं, लेकिन जिन पर खुलकर बातचीत करने के लिए ग्राम-स्तरीय कार्यकर्ताओं को बहुत कम मंच मिलते हैं। मंच मिले भी हैं, तो खुलकर कहने-बोलने का साहस जुटाना कठिन होता है। ललित और वैचारिक लेखन के बीच की खाई को पाटते हुए अपनी जुदा-जुदा दुनिया में साँस लेती नौ लेखिकाओं ने जिस अनूठी सामूहिक प्रक्रिया से गुज़रकर इस प्रयास को साँचे में ढाला या एक माला की तरह पिरोया है, उसका सिलसिलेवार बयान इस किताब और चिन्तन को एक नया आयाम और गहराई देता है।
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