Devgarh Ka Gond Rajya
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Author:
Suresh MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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देवगढ़ के गोंड राजाओं ने 16वीं सदी के अन्त से 18वीं सदी के मध्य तक लगभग पौने दो सौ साल तक अपना गौरवशाली इतिहास रचा तथा उनके वंशज आज भी वारिसों के रूप में विद्यमान हैं। उन्हीं गोंड राजाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं से रू-ब-रू कराती यह पुस्तक भारतीय जनजातीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।</p> <p>यह पुस्तक हमें सतपुड़ा के अंचल में विकसित हुए देवगढ़ के गोंड राजाओं के उत्थान और पतन का क्रमवार विवरण देती है।</p> <p>इस पुस्तक में जहाँ मुग़लों द्वारा निरन्तर प्रताड़ित किए जाते रहे गोंड राजाओं के आन्तरिक क्लेशों और उनकी पीड़ाओं का मार्मिक चित्रण है। वहीं उनकी समृद्धि में सहायक रहे रघुजी भोंसले की कूटनीतिज्ञता का परिचय के साथ-साथ कैसे उन्हें ब्रिटिश गवर्नरों द्वारा पेंशनधारी राजा बनाकर प्रभावहीन कर दिया जाता है, इस तथ्य को भी यहाँ रेखांकित किया गया है।</p> <p>डॉ. सुरेश मिश्र के अथक परिश्रम से तैयार की गई यह ऐसी पुस्तक है जो देवगढ़ के गोंड राजाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर केन्द्रित है। यह पुस्तक शोधकर्ताओं तथा इतिहास में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिए उपादेय है।
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देवगढ़ के गोंड राजाओं ने 16वीं सदी के अन्त से 18वीं सदी के मध्य तक लगभग पौने दो सौ साल तक अपना गौरवशाली इतिहास रचा तथा उनके वंशज आज भी वारिसों के रूप में विद्यमान हैं। उन्हीं गोंड राजाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं से रू-ब-रू कराती यह पुस्तक भारतीय जनजातीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।</p>
<p>यह पुस्तक हमें सतपुड़ा के अंचल में विकसित हुए देवगढ़ के गोंड राजाओं के उत्थान और पतन का क्रमवार विवरण देती है।</p>
<p>इस पुस्तक में जहाँ मुग़लों द्वारा निरन्तर प्रताड़ित किए जाते रहे गोंड राजाओं के आन्तरिक क्लेशों और उनकी पीड़ाओं का मार्मिक चित्रण है। वहीं उनकी समृद्धि में सहायक रहे रघुजी भोंसले की कूटनीतिज्ञता का परिचय के साथ-साथ कैसे उन्हें ब्रिटिश गवर्नरों द्वारा पेंशनधारी राजा बनाकर प्रभावहीन कर दिया जाता है, इस तथ्य को भी यहाँ रेखांकित किया गया है।</p>
<p>डॉ. सुरेश मिश्र के अथक परिश्रम से तैयार की गई यह ऐसी पुस्तक है जो देवगढ़ के गोंड राजाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर केन्द्रित है। यह पुस्तक शोधकर्ताओं तथा इतिहास में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिए उपादेय है।
Book Details
-
ISBN9788126715510
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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"‘गीतगोविंद’ संस्कृत के प्रसिद्ध कवि जयदेव द्वारा रचित एक अनुपम काव्य-ग्रंथ है, जिसमें राधा-कृष्ण की केलि-कथाओं तथा उनकी अभिसार-लीलाओं के अत्यंत रसमय चित्रण के साथ ही प्रेम के सभी भारतीय रूपों का बड़ी तन्मयता और कुशलता के साथ वर्णन किया गया है। समग्र संस्कृत साहित्य में इस कोटि की मधुर रचना दूसरी कोई नहीं। यह आध्यात्मिक शृंगार का अत्यंत मनोरम काव्य-ग्रंथ है, जिसमें शब्द और अर्थ का मनोमुग्धकारी सामंजस्य है। कृष्ण-भक्ति साहित्य में ‘गीतगोविंद’ को धर्मग्रंथ का स्थान प्राप्त है। श्रीवल्लभ संप्रदाय में भी ‘गीतगोविंद’ को श्रीमद्भागवत पुराण के समान प्रतिष्ठा प्राप्त है। यह ग्रंथ देश-विदेश के अनेक मूर्धन्य एवं लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् समीक्षकों द्वारा मुक्त कंठ से प्रशंसित है। प्रस्तुत है, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में सुप्रतिष्ठित इस ग्रंथ-रत्न का सुमधुर हिंदी अनुवाद। आध्यात्मिक साधकों के लिए ही नहीं आम पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी पुस्तक। "
Sarvagunakar Shrimant Shankardev
- Author Name:
Dr. Rishikesh Rai
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भारतभूमि संतों, महात्माओं एवं सिद्ध पुरुषों की लीलाभूमि रही है। उन्होंने दिव्य ईश्वरीय चेतना का साक्षात्कार कर सृष्टि के कल्याण के निमित्त सदाचरण एवं मानवीय आदर्शों का उपदेश दिया। भारतीय संस्कृति का निर्माण ऐसे ही दिव्य पुरुषों के उच्चादर्शों एवं आप्त वचनों का फल है। ऐसे आध्यात्मिक सिद्धपुरुषों का उद्भव प्रत्येक देशकाल में होता रहा है। भारतभूमि के असम प्रांत में 15वीं सदी में जनमे श्रीमंत शंकरदेव ऐसे ही एक दिव्य व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपनी सुकीर्ति से पूरे पूर्वोत्तर के सांस्कृतिक परिदृश्य में अपने एक शरणिया नामधर्म के द्वारा अभूतपूर्व आलोडऩ एवं जनजागरण पैदा किया। घोर निराशाजनक परिदृश्य में असम में श्रीमंत शंकरदेव का आविर्भाव हुआ। पूरा देश उस समय भक्ति आंदोलन की उदार एवं पावन रसधारा से आप्लावित हो रहा था। संपूर्ण भारतवर्ष एक सांस्कृतिक प्राणवत्ता की धड़कन से स्पंदित था। श्रीमंत शंकरदेव ने अपनी सुदीर्घ साधना, विराट प्रतिभा एवं प्रगाढ़ जनसंपर्क से युगीन संकट की प्रकृति एवं दिशा को समझ लिया। समाधान सूत्र के रूप में उन्होंने वैष्णववाद की परंपरागत अवधारणाओं में नवीन तत्त्वों एवं मान्यताओं का अभिनिवेश किया। श्रीमंत शंकरदेव मात्र एक आध्यात्मिक गुरु ही नहीं थे, वरन एक श्रेष्ठ कवि, साहित्यकार, चित्रकार, नाटय व्यक्तित्व, उद्यमकर्ता, संगठक और सच्चे अर्थों में एक जननायक थे।
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