Khud Se Kayi Sawal
(0)
Author:
Amit Dutta, Geet ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Lyrics-songs₹
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अमित दत्ता एक युवा फ़िल्मकार हैं और यह पुस्तक उनके नोट्स का संचयन है जिनमें जब-तब सोची गई बातें दर्ज हैं। उनमें खोज की बेचैनी और अचरज, विचार-विनोद, अपने माध्यम की स्वतंत्रता को लेकर प्रश्नाकुलता और खुलापन सब कुछ साथ हैं। फ़िल्म को, सौभाग्य से, रचना और चिन्तन की एक विश्व-परम्परा उपलभ्य है : अमित उसे आसानी से स्वायत्त करते, उससे स्पन्दित होते और अपने ढंग से सोच-विचार करते फ़िल्मकार हैं और उनकी जिज्ञासा, विकलता, प्रश्नवाचकता हमें नई रोशनी में फ़िल्म देखने-समझने की उत्तेजना देती है।
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अमित दत्ता एक युवा फ़िल्मकार हैं और यह पुस्तक उनके नोट्स का संचयन है जिनमें जब-तब सोची गई बातें दर्ज हैं। उनमें खोज की बेचैनी और अचरज, विचार-विनोद, अपने माध्यम की स्वतंत्रता को लेकर प्रश्नाकुलता और खुलापन सब कुछ साथ हैं। फ़िल्म को, सौभाग्य से, रचना और चिन्तन की एक विश्व-परम्परा उपलभ्य है : अमित उसे आसानी से स्वायत्त करते, उससे स्पन्दित होते और अपने ढंग से सोच-विचार करते फ़िल्मकार हैं और उनकी जिज्ञासा, विकलता, प्रश्नवाचकता हमें नई रोशनी में फ़िल्म देखने-समझने की उत्तेजना देती है।
Book Details
-
ISBN9788126730735
-
Pages155
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कुछ अकेले नहीं हैं और पहले भी नहीं हैं—शैलेन्द्र, विद्वज्जनों ने जिनकी ओर नज़र नहीं डाली—ऐसे अनेकानेक लोककवि हैं। यूँ हर ज़माने ने अपने ज़माने की लोकरचना की सादगी की संश्लिष्टता को स्वीकार करने में कोताही की—और होकर यूँ रहा कि समय के साथ वह रंग और गहरा होता चला गया। पीढ़ियाँ-दर-पीढ़ियाँ उनके शब्दों में ज़िन्दगी के नए मायने तलाशती रहीं। शैलेन्द्र के गीत हमारे बचपन की गुनगुनाहटों में शामिल होकर आज तक हमसफ़र हैं। दुनिया-भर की पुरकशिश कविता की तरह उन्होंने ज़िन्दगी की पुरपेच गलियों में आलोकित राजपथ प्रशस्त किया। इतने सरल और लुभावने कि आवारामिज़ाजी से ज़ुबाँ पर चढ़ जाएँ, क़दम-ब-क़दम ज़िन्दगी के फ़लसफ़े में तब्दील होते हुए। अपनी मासूम गुनगुनाहटों के शब्द के फ़नकार का नाम हमें सालों बाद पता चला और इस परिचय के ऊषाकाल में ही वह सितारा टूट गया। जब शैलेन्द्र ने आत्मघात किया, हम उन्नीस साल के थे। इसके चंद महीने पहले ही शैलेन्द्र निर्मित एकमात्र फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ प्रदर्शित हुई थी। नहीं मालूम सच है या झूठ, लेकिन कहा जाता है कि शैलेन्द्र को यक़ीन था, इसे ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ मिलेगा—और मिला, लेकिन वह दिन देखने के लिए शैलेन्द्र नहीं थे। जनकवि शैलेन्द्र के बहुआयामी रचनात्मक अवदान का आकलन करने की विनम्र कोशिश है यह पुस्तक।
Agyeya Ke Uddharan
- Author Name:
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya' +1
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अज्ञेय का लेखन इतना विपुल और वैविध्यपूर्ण है कि उसमें से उद्धरणों के एक चयन की बात सोचते ही पहला सवाल तो उसकी क्रम-प्रक्रिया को लेकर ही सामने आया। लगभग सभी साहित्यिक विधाओं में उत्कृष्ट लेखन के साथ-साथ अज्ञेय ने मानव-जीवन और समाज से जुड़ी सभी समस्याओं पर भी स्वतन्त्र रूप से सम्यक् विचार किया है। अज्ञेय के लिए न केवल साहित्य बल्कि पूरा मानव-जीवन ही मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है। इस क्रम से आरम्भ करने पर सहज ही केन्द्रीय मूल्य स्वतन्त्रता और उनसे जुड़े सवालों को अलगे चरण में रख पाना उचित लगा और साहित्य क्योंकि मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है, अत: भाषा, साहित्य आदि से जुड़े चिन्तन से चयन किये जाने वाले उद्धरणों का क्रम भी तय हो गया। इस चयन से गुज़रते हुए पाठक को यह महसूस हो सकता है कि अज्ञेय जब किसी दार्शनिक या तर्कशास्त्रीय गुत्थी पर भी विचार करते हैं तो उनका चिन्तन अधिकांशत: किसी अकादेमिक दार्शनिक की तरह का नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक दृष्टि, या कहें कि कवि-दृष्टि से किया गया चिन्तन होता है। अज्ञेय का चिन्तन कवि-दृष्टि का चिन्तन है, अकादेमिक नहीं। शायद, इसलिए इस कवि-दृष्टि के विमर्शात्मक चिन्तन और कविताओं के बीज-संवेदन का अहसास भी सुधी पाठकों को हो सकेगा। पाठक यदि चयन की इन मोटी रेखाओं के सहारे अज्ञेय के चिन्तन और कवि-कर्म की विपुलता, विविधता और सूक्ष्मता में प्रवेश करने की प्रेरणा पा सकें, तो यही इस चयन की सार्थकता होगी। अज्ञेय के कवि-कर्म और चिन्तन के द्वन्द्वों-समाधानों और प्रक्रियाओं-निष्कर्षों में ऐसा बहुत कुछ है जो किसी भी समय के लेखक-पाठक के लिए सदैव प्रासंगिक रहेगा। —प्रस्तावना से
Sara Aakash Patkatha
- Author Name:
Basu Chatterjee
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1960 के आरम्भिक दिनों में मैंने दो मुख्य फ़िल्में (फ़ीचर फ़िल्म) बनाने में मदद की थी और अपने को एक मुख्य फ़िल्म निर्देशन के योग्य मान रहा था। मैं इधर-उधर एक कहानी तलाश रहा था। मेरे मित्र और सहयोगी अरुण कौल ने राजेन्द्र यादव की कहानी ‘सारा आकाश’ का सुझाव दिया। उसकी एक प्रति उनके पास थी, उन्होंने मुझे दे दी। एक शाम मैं उसे एक ही साँस में पढ़ गया और मैं अभिभूत ही था। ‘सारा आकाश’ एक जटिल कथा के रूप में लिखा गया था। लेखक ने सपाट रास्ता नहीं चुना था, इसीलिए इसने मुझे ज़्यादा आकर्षित किया था। दृश्यों को मैंने यथासम्भव वर्णन के निकट रखा है। चूँकि लेखक ने कहानी फ़िल्म के लिए नहीं लिखी थी, अत: उसमें बहुत-सी बातों का विवरण दिया गया है जिनको दृश्यों में रूपान्तरित करना एक चुनौती थी।...ऐसे ही कई स्थान हैं जहाँ नायक अतीत और भविष्य के बारे में बहुत कुछ सोच रहा है। छठे दशक के मध्य में मैंने अनेक यूरोपीय और रूसी फ़िल्में देखी थीं। मुझे ऐसे दृश्य लिखने में इनसे सहायता मिली। पटकथा लिखने के बाद मुझे इसे विक्रम सिंह को दिखाने का अवसर मिला। वे अपने समय में ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म आलोचक थे। उन्होंने मेरे प्रयास की सराहना की और मुझे फ़िल्म बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। और ‘सारा आकाश’ बन गई। 1970 में ‘फ़िल्मफ़ेयर’ के समारोह में इसे वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पटकथा घोषित किया गया। निर्देशन के लिए इसकी सिफ़ारिश राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भी की गई। इसके कैमरामैन को सर्वश्रेष्ठ छायाचित्रण के लिए पुरस्कार भी मिला। —बासु चटर्जी
Rajnigandha : Patkatha
- Author Name:
Mannu Bhandari +1
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मन्नू भंडारी की प्रसिद्ध कहानी ‘यही सच है’ और उस पर आधारित बासु चटर्जी की फ़िल्म ‘रजनीगंधा’। इन दोनों रचनाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में इतिहास रचा था। ‘यही सच है’ अपनी जटिल भावभूमि और सघन संवेदना के चलते जहाँ हिन्दी की उत्कृष्ट कहानियों में शुमार हुई और बड़े पैमाने पर प्रशंसित-चर्चित होती हुई आज भी अपनी प्रासंगिकता में अडिग है, वहीं ‘रजनीगंधा’ फ़िल्म ने हिन्दी सिनेमा के कलात्मक और कॉमर्शियल विभाजन को शायद पहली बार ख़त्म किया और एक अत्यन्त संवेदनशील विषय को बेहद बारीकी से फ़िल्माते हुए लोकप्रियता के मानदंड स्थापित किए। उल्लेखनीय है कि ‘रजनीगंधा’ शायद अकेली ऐसी फ़िल्म है जिसे फ़िल्मफेयर के ‘पब्लिक’ और ‘क्रिटीक’, दोनों अवार्ड मिले। ‘रजनीगंधा’ की यह पटकथा सिनेप्रेमियों को एक बार पुन: अपनी स्मृतियों में बसी उस फ़िल्म के साथ होने का अहसास देगी और फ़िल्म में देखे अपने प्रिय पात्रों-दृश्यों को भाषा के टकराव में ज़्यादा निकट से देखने और समझने का अवसर उपलब्ध कराएगी।
Ijaazat
- Author Name:
Gulzar
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साहित्य में मंज़रनामा एक मुकम्मिल फ़ॉर्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें। लेकिन मंज़रनामा का अन्दाज़े-बयान अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इन्टरप्रेटेशन हो जाता है। मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फ़ॉर्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इज़ाफ़ा हो गया है। यह फ़िल्म ‘इजाज़त’ का मंज़रनामा है। इस फ़िल्म को अगर हम औरत और मर्द के जटिल रिश्तों की कहानी कहते हैं, तो भी बात तो साफ़ हो जाती है लेकिन सिर्फ़ इन्हीं शब्दों में उस विडम्बना को नहीं पकड़ा जा सकता, जो इस फ़िल्म की थीम है। वक़्त और इत्तेफ़ाक़, ये दो चीज़ें आदमी की सारी समझ और दानिशमंदी को पीछे छोड़ती हुई कभी उसकी नियति का कारण हो जाती हैं और कभी बहाना। पानी की तरह बहती हुई इस कहानी में जो चीज़ सबसे अहम है, वह है इंसानी अहसास की बेहद महीन अक्कासी जिसे गुलज़ार ही साध सकते थे। इस कृति के रूप में पाठक निश्चय ही एक श्रेष्ठ साहित्यिक रचना से रू–ब–रू होंगे।
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