Mohd. Iqbal

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मुहम्मद इक़बाल जन्म : 9 नवम्बर, 1877 अल्लामा मुहम्मद इक़बाल आधुनिक इस्लामी जगत् के एकमात्र दार्शनिक हैं जिन्होंने इस्लाम तथा इस्लामी संस्कृति के वैचारिक आधारों को अपने चिन्तन का विषय बनाया है। आधुनिक मनुष्य धार्मिक अनुभूति की एक ऐसी प्रणाली की अपेक्षा करता है जो मूर्त चिन्तन की आदतों वाले मन के लिए उपयुक्त हो। इस्लाम की धार्मिक परम्परा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में होनेवाले नवीनतम विकास के परिप्रेक्ष्य में इस्लामी चिन्तन की पुनर्रचना में इक़बाल ने आधुनिक मन की अपेक्षाओं की पूर्ति का एक महत्त्‍वपूर्ण प्रयास किया है। पुनर्रचना में इक़बाल का उद्देश्य धर्म एवं विज्ञान के प्रवर्गों के माध्यम से उस यथार्थता की अभिपुष्टि एवं व्याख्या करना है जिसका संज्ञान धार्मिक अनुभूति द्वारा होता है। उनका मानना है कि आधुनिक मनोविज्ञान ने धार्मिक अनुभूति की अन्तर्वस्तुओं के मूल्यांकन और विश्लेषण पर ध्यान नहीं दिया है। शिक्षा : 1895 में एफ़.ए., मरे कॉलेज, सियालकोट; 1897 में बी.ए. और 1899 में दर्शनशास्त्र में एम.ए., गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर; 1907 में पीएच.डी., म्यूनिख विश्वविद्यालय। छात्र-जीवन में ही प्रसिद्ध प्राच्यविद् सर टॉमस आर्नल्ड के सम्पर्क में आए। पेशे से प्राध्यापक रहे। राजनीति में भी दख़ल, लेकिन यह जगह उन्हें रास न आई। प्रमुख कृतियाँ : ‘अस् रारे-ख़ुदी’, ‘पयामे-मश् रिक़’, ‘बाँगे-दरा’, ‘ज़बूरे-अजम’, ‘ज़र्बे-कलीम’ आदि। सम्मान : ‘अल्लामा, सर’ का ख़िताब। निधन : 21 अप्रैल, 1938; लाहौर।

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