Balwant Kaur
बलवन्त कौर आलोचक, अनुवाद तथा सम्पादक बलवन्त कौर हिन्दी, अंग्रेजी के अतिरिक्त पंजाबी तथा उर्दू की भी जानकार हैं। लगभग तीस वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में अध्यापन कर रही हैं। हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध पत्रिका ‘हंस’ के सम्पादन कार्य से भी अनेक वर्षों तक जुड़ी रहीं। आधुनिक कथा साहित्य, स्त्री अध्ययन, और विभाजन पर आधारित साहित्य इनके अध्ययन के मुख्य क्षेत्र रहे हैं। इनके कई लेख और अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कई महत्वपूर्ण किताबों का सम्पादन भी किया है, जैसे—स्त्री आत्मकथांशों की पुस्तक ‘देहरि भई बिदेस’, राजेन्द्र यादव के सम्पादकीयों की किताबें ‘काश मैं राष्ट्र द्रोही होता’ तथा ‘वे हमें बदल रहे हैं’, 1931 में ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ द्वारा सम्पादित ‘स्त्री कवि कौमुदी’ जैसी दुर्लभ पुस्तक की पुनर्प्रस्तुति , 2009 में ‘हंस’ के विशेषांक ‘स्त्री-विमर्श : अगला दौर’ के अलावा ‘राजेन्द्र यादव रचनावली’ के 15 खंडों का सम्पादन तथा ‘किसान आन्दोलन : लहर भी , संघर्ष भी और जश्न भी’। ई-मेल : tobalwant@gmail.com
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About Balwant Kaur
आलोचक, अनुवाद तथा सम्पादक बलवन्त कौर हिन्दी, अंग्रेजी के अतिरिक्त पंजाबी तथा उर्दू की भी जानकार हैं। लगभग तीस वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में अध्यापन कर रही हैं। हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध पत्रिका ‘हंस’ के सम्पादन कार्य से भी अनेक वर्षों तक जुड़ी रहीं। आधुनिक कथा साहित्य, स्त्री अध्ययन, और विभाजन पर आधारित साहित्य इनके अध्ययन के मुख्य क्षेत्र रहे हैं।
इनके कई लेख और अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कई महत्वपूर्ण किताबों का सम्पादन भी किया है, जैसे—स्त्री आत्मकथांशों की पुस्तक ‘देहरि भई बिदेस’, राजेन्द्र यादव के सम्पादकीयों की किताबें ‘काश मैं राष्ट्र द्रोही होता’ तथा ‘वे हमें बदल रहे हैं’, 1931 में ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ द्वारा सम्पादित ‘स्त्री कवि कौमुदी’ जैसी दुर्लभ पुस्तक की पुनर्प्रस्तुति , 2009 में ‘हंस’ के विशेषांक ‘स्त्री-विमर्श : अगला दौर’ के अलावा ‘राजेन्द्र यादव रचनावली’ के 15 खंडों का सम्पादन तथा ‘किसान आन्दोलन : लहर भी , संघर्ष भी और जश्न भी’।
ई-मेल : tobalwant@gmail.com