About Laxminarayan Mishra
पण्डित लक्ष्मीनारायण मिश्र का जन्म १९०३ ई. में आजमगढ़ जिले के बस्ती नामक ग्राम में हुआ। उनकी शिक्षा सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज, काशी में हुई जहाँ से १९२८ ई. में उन्होंने बी.ए. पास किया।
१८ वर्ष की अल्पायु में आप साहित्य सृजन की ओर अग्रसर हुए। आपकी प्रथम काव्य-रचना १९२१-२२ ई. में ‘अन्तर्जगत्’ नाम से हुई। इसके उपरान्त उनका रुझान नाटक-लेखन की ओर हुआ। ‘अशोक’ उनका पहला नाटक है जिसका रचनाकाल १९२६ ई. है। इसके उपरान्त उनके जो नाटक आये वे हैं : ‘संन्यासी’ १९३० ई., ‘राक्षस का मन्दिर’ १९३१ ई., ‘मुक्ति का रहस्य’ १९३२ ई., ‘राजयोग’ १९३३ ई., ‘सिन्दूर की होली’ १९३३ ई., ‘आधी रात’ १९३६ ई., ‘गरुड़ध्वज’ १९४५ ई., ‘नारद की वीणा’ १९४६ ई., ‘वत्सराज’ १९५० ई., ‘दशाश्वमेध’ १९५० ई., ‘अशोक वन’ १९५० ई., ‘वितस्ता की लहरें’ १९५३, ‘जगद्गुरु’, ‘मृत्युंजय’, ‘चक्रव्यूह’ १९५५ ई. में प्रकाशित हुए।
इब्सन के दो प्रसिद्ध नाटक ‘पिलर ऑफ द सोसाइटी’ और ‘डाल्स हाउस’ का अनुवाद आपने क्रमश: ‘समाज के स्तम्भ’ और ‘गुड़िया का घर’ नाम से किया।
आपके नाटकों की शिल्पविधि और रंगस्वरूप पर इब्सन और शॉ का स्पष्ट प्रभाव मिलता है। आपके नाटकों में भावुकता और कल्पना के स्थान पर यथार्थ और वास्तविक जीवन के चित्र आये हैं। हिन्दी में समस्या नाटकों के आप निश्चय ही प्रथम अधिष्ठाता हैं।
आपके समस्त नाट्य साहित्य को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है—एक तो सांस्कृतिक अथवा ऐतिहासिक, दूसरा सामाजिक। आपके समूचे नाट्य साहित्य में भारतीय संस्कृति के आदर्शों और मान्यताओं का प्रवाह है। नाटकों की शिल्पविधि आधुनिक है। नाटक अपने बहिरंग में पाश्चात्य नाट्य-शिल्प के अनुरूप हैं और आन्तरिकता में विशुद्ध भारतीय। अपने दृष्टिकोण में आप प्राय: यथार्थवादी हैं, प्रगतिशील स्तर पर नहीं, भारतीय स्तर पर। इनका यथार्थवाद अपनी ही तरह का है।
अपने दृष्टिकोण और विचारधारा के विषय में मिश्र जी स्वयं कहते हैं, ‘‘जो यथार्थ नहीं है, वह आदर्श नहीं हो सकता। कल्पना की रंगीनी और असंगति साहित्य और कला का मानदण्ड नहीं बन सकती। जीवन की पाठशाला में बैठकर साहित्यकार अपनी कला सीखता है। अत: जीवन के अनुभव से परे उसे कहीं कुछ भी नहीं ढूँढ़ना चाहिए।