The Book Of English Grammar Tenses
Author:
Mamta MehrotraPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 140
₹
175
Unavailable
English grammar can be challenging, but it is essential to effective communication. Whether you are writing an essay, sending an email, or engaging in a conversation, using correct grammar can make all the difference in how your message is received. This comprehensive grammar book of tenses for students is designed to help them master the English language. This book is intended to help students improve their grammar and communication skills. In this book, you will find clear explanations of grammar rules and numerous examples and practice exercises to help you reinforce your understanding. The book is organized in a logical and easy-to-follow manner, so you can learn at your own pace and track your progress. Hopefully, this book will be a valuable resource for you as you work to improve your grammar skills.
ISBN: 9788196159047
Pages: 88
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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जब पुराने काव्यरूप नए कथ्य को अभिव्यक्त करने में असमर्थ हो जाते हैं तो रचनाकार नए युग के अनुकूल भावाभिव्यक्ति के लिए नए काव्यरूप की तलाश करता है। पश्चिमी देशों में भी पूँजीवाद के उभार के दौर में नए काव्यरूप की तलाश रचनाकारों द्वारा की गई है। इसीलिए अंग्रेज़ी साहित्य में व्हिटमैन, वड् र्सवर्थ, कीट्स आदि ने लम्बी कविताएँ रचीं। आधुनिक हिन्दी के छायावाद युग में भी नई संरचनाएँ अस्तित्व में आती हैं और नए काव्यरूप बनते हैं।
लम्बी कविता की अवधारणा छायावाद काल की है। कोई इसे ‘परिवर्तन’ से आरम्भ मानता है तो कोई इसे ‘प्रलय की छाया’ से। माना जाता है कि कुछ आलोचक ‘राम की शक्ति-पूजा’ से लम्बी कविता का आरम्भ मानते हैं। बावजूद इसके इतना तो तय है कि लम्बी कविताओं की एक सुदृढ़ एवं नियमित परम्परा मुक्तिबोध से आरम्भ होती है।
लम्बी कविता की परम्परा को मुक्तिबोध के बाद राजकमल चौधरी की ‘मुक्ति प्रसंग’ और धूमिल की ‘पटकथा’ आगे बढ़ाती है। राजकमल चौधरी की ‘मुक्ति प्रसंग’ कविता एक ऐसे आदमी के भटकाव की कविता है, जो सार्थकता की तलाश में निरर्थक होते जाने की पीड़ा को पीठ पर लादे घूम रहा है। धूमिल की कविता ‘पटकथा’ भी राजनीति-केन्द्रित कविता है। यह कविता आज़ादी के बाद की हालत का बखान करती है। कविता का आरम्भ आज़ादी के मोह और आकर्षण से होता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दी की लम्बी कविताएँ युग-बोध की उपज हैं और इस काव्यरूप का भविष्य आगे भी उज्ज्वल है। आज भी लम्बी कविताओं का लेखन जारी है। इस पुस्तक में चार कवियों की नौ लम्बी कविताओं की विवेचना शामिल है। पहले कवि निराला हैं जिनकी चार कविताएँ आलोचना के लिए चुनी गई हैं। उनके बाद अज्ञेय, मुक्तिबोध और धूमिल की कविताओं का विश्लेषण किया गया है।
Kavita Ka Galpa
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Ashok Vajpeyi
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Description:
पिछले तीस बरसों की हिन्दी कविता की रचना, आलोचना, सम्पादन और आयोजन में अशोक वाजपेयी एक अग्रणी नाम रहे हैं। हिन्दी समाज में आज की कविता के लिए जगह बनाने की उनकी अथक कोशिश इतने स्तरों पर और इतनी निर्भीकता और आत्मविश्वास के साथ चलती रही है कि उसे समझे बिना आज की कविता, उसकी हालत और फलितार्थ को समझना असम्भव है।
अशोक वाजपेयी निरे आलोचक नहीं, अज्ञेय, मुक्तिबोध, विजयदेव नारायण साही, कुँवर नारायण, मलयज आदि की परम्परा में कवि-आलोचक हैं। उनमें तरल सहानुभूति और तादात्म्य की क्षमता है तो सख़्त बौद्धिकता और न्यायबुद्धि का साहस भी। आधुनिक आलोचना में अपनी अलग भाषा की स्थायी छाप छोड़नेवाले वे ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने अज्ञेय, मुक्तिबोध और शमशेर से लेकर रघुवीर सहाय, धूमिल, श्रीकान्त वर्मा, कमलेश, विनोदकुमार शुक्ल आदि के लिए अलग-अलग तर्क और औचित्य खोजे परिभाषित किए हैं। कविता की उनकी अदम्य पक्षधरता निरी ज़िद या एक कवि की आत्मरति नहीं है—वे प्रखरता से, तर्क और विचारोत्तेजन से, ज़िम्मेदारी और वयस्कता से हमारे समय में कविता की जगह को सुरक्षित और रौशन बनाने की खरी चेष्टा करते हैं।
अज्ञेय की महिमा, तार सप्तक के अर्थ, रघुवीर सहाय के स्वदेश, शमशेर के शब्दों के बीच नीरवता आदि की पहचान जिस तरह से अशोक वाजपेयी करवाते हैं, शायद ही कोई और कराता हो। उनमें से हरेक को उसके अनूठेपन में पहचानना और फिर एक व्यापक सन्दर्भ में उसे लोकेट करने का काम वे अपनी पैनी और पुस्तक-पकी नज़र से करते हैं।
कविता और कवियों पर उनका यह नया निबन्ध-संग्रह ताज़गी और उल्लास-भरा दस्तावेज़ है और उसमें गम्भीर विचार और विश्लेषण के अलावा उनका हाल का, हिन्दी आलोचना के लिए सर्वथा अनूठा, कविता के इर्द-गिर्द ललित चिन्तन भी शामिल है।
Vishva Kavi Ravindranath
- Author Name:
Soma Bandyopadhyay
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Description:
‘आमि ढालिबो करुणा-धारा
आमि भांगिबो पाषाण-कारा
आमि जगत् प्लाबिया बेड़ाबो गहिया
आकुल पागोल पारा’।
(मैं बहाऊँगा करुणा-धारा
मैं तोड़ूँगा पाषाण-कारा
मैं संसार को प्लावित कर घूमूँगा गाता हुआ
व्याकुल पागल की तरह)।
—रवीन्द्रनाथ
करुणाधारा से प्लावित वह विशाल साहित्य जिसके सृजनकर्ता थे रवीन्द्रनाथ, ‘रवीन्द्र-साहित्य’ के नाम से विख्यात है और आज भी मनुष्य के हर विषम परिस्थिति में उसे सटीक पथ की दिशा देता है, निरन्तर कठिनाइयों से जूझते रहने की प्रेरणा देता है, मनुष्यत्व के लक्ष्य की ओर अग्रसर होने की इच्छा को बलवती बनाता है। ‘रवीन्द्र-साहित्य’ सागर में एक बार जो अवगाहन करता है, वह बहता ही जाता है, डूबता ही जाता है, पर किनारा नहीं मिलता—ऐसा विराट-विशाल जलधि है वह।
—इसी पुस्तक से
Bhakti Kavya Yatra
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Vraj Ke Vaishnav Sampradaya Aur Hindi Sahitya
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प्रस्तुत पुस्तक में कृष्ण-भक्ति के इतिहास तथा सिद्धान्तों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। सम्यक् ज्ञान के बिना जिज्ञासु विषय अपूर्ण और अस्पष्ट ही रह जाता है। साम्प्रदायिक कृष्ण-भक्ति से अनुप्राणित होकर लिखे गए हिन्दी साहित्य का अनुशीलन उनके सिद्धान्तों को पृष्ठभूमि में करने से अनेक भ्रमों का निराकरण हो जाता है। इस निबन्ध में साहित्य पर उनके प्रभाव का विवेचन व्यष्टि नहीं, अपितु समष्टि रूप से किया गया है।
कृष्ण-भक्ति का प्रारम्भ सहस्राब्दियों पूर्व हुआ था। समयानुसार अनेक धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक कारणों से उसका क्रमिक विकास होता गया। आन्दोलन के फलस्वरूप उसके प्रचलित रूप को देखकर अनेक विद्वान् उस पर विदेशी प्रभाव सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। जिन अनेक भारतीय साधनाओं के उपकरणों ने उसे पल्लवित किया है, उनका क्रमिक इतिहास इस प्रकरण का प्रमुख विषय है। अध्ययन की सामग्री यत्र-तत्र विकीर्ण मिलती है। उसका कहीं भी एकत्र उपयोग नहीं प्राप्त होता। यहाँ न केवल उसे शृंखलाबद्ध किया गया है, अपितु उसमें अनेक अस्पष्ट गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास भी है।
वल्लभ और गौडीय सम्प्रदायों के अतिरिक्त अन्य सम्प्रदायों का विस्तृत विवरण भी साहित्य के अध्येताओं के समक्ष रखा गया है। निम्बार्क सम्प्रदाय का विचार इस निबन्ध की सीमा से परे है, क्योंकि हिन्दी साहित्य के सृजन में उसका कोई प्रत्यक्ष योग नहीं रहा है। ब्रजभाषा साहित्य के निर्माण का प्रारम्भ वस्तुत: वल्लभाचार्य की प्रेरणा से हुआ है। इस प्रकरण का महत्त्व अनेक स्थलों पर नवीन सामग्रियों के समावेश से बढ़ गया है। कृष्ण-भक्ति के प्रमुख कवियों का इसमें नाम निर्देश मात्र है। साहित्यिक कृतियों की समीक्षा भी नहीं है। ग्रन्थ के लघु कलेवर में उसकी अपेक्षा भी नहीं है। इस ग्रन्थ को हम एक परिचयात्मक ग्रन्थ ही कह सकते हैं। हिन्दी साहित्य में ब्रजभाषा के योगदान का उल्लेख भी किया गया है। ‘ब्रज के वैष्णव सम्प्रदाय और हिन्दी साहित्य’ के अनुशीलन से जो ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित होती है, निश्चित ही पाठक उससे लाभान्वित होंगे।
Yashpal Ka Kahani Sansar : Ek Antrang Parichya
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यह सर्वविदित है कि यशपाल प्रेमचन्दोत्तर कथाकारों में श्रेष्ठतम हैं। भारतीय जीवन के आदर्शवादी विचारों और व्यवहार में जो झूठ की दीवारें खड़ी थीं, उन्हें गिराने में यशपाल ने अपनी क़लम का इस्तेमाल किया। जीवन का कोई भी क्षेत्र उनके प्रहारों से बच न सका।
यशपाल कालजयी लेखक हैं। कथाकार की हैसियत से यशपाल की लोकप्रियता हिन्दी-जगत में जितनी व्यापक है, हिन्दीतर-जगत में उससे थोड़ी भी कम नहीं है। इसका कारण यह है कि कथाकार यशपाल ने शोषित वर्ग के जीवन का यथार्थपरक चित्र अंकित किया है।
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