About Harsh Ranjan
लेखन के इन दो दशकों में, बीसियों जिल्दों के साथ मैं आज भी बरस दर बरस कभी टूटता, कभी खुद को जोड़कर खड़ा होता रहा। मुझे सिर्फ इतना भान रहा कि संभवतः किसी दैव-प्रयोजन के लिए मैं धारावाहिक बनकर जारी रहा! खुद की रसद जुटाकर, खुद से सीखकर, खुद से वैर रखके व खुद पर रीझकर मैं सिर्फ एक ध्रुव तारे को देखकर इस अंधेरी रात दिशा-ज्ञान पा रहा हूँ कि हर बसंत से पतझड़, फलकर फिर नए फल के लिए खुद को उजाड़ता जा रहा हूँ।
आगे बढ़ने के लिए, साध्य-समय-शक्ति-साधन-सुरक्षा-सकारात्मकता व सार्थक श्रम की जरूरत होती है। इतना धनी कभी नहीं रहा कि सब पास हो पर रुका भी नहीं।