Sankshipt
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Author:
Harsh RanjanPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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मैं अपने तीसरे कहानी-संग्रह की दुनिया में आपका स्वागत करता हूँ। कुछ कहानियाँ शब्दों से ही नहीं, स्वभाव से भी बड़ी होती हैं और जीवन के एक पूरे के पूरे दौर की व्याख्या कर जाती हैं। ऐसी ही कहानियां ‘संक्षिप्त’ में संकलित हैं। ये सारी कहानियाँ मेरी ज़िंदगी का झूठा-सच हैं, मतलब अनुभूतियों से सच और पात्रों से झूठ। इन्हें मैंने इतने करीब से जिया है कि इनपर मेरा एक सौ एक प्रतिशत अधिकार है। मैं इन्ही कहानियों पर उपन्यास बनाने की कोशिश कर रहा हूँ जो एक-एक करके आपके सामने आएंगी। एक-दो कहानियाँ पुरानी हैं और शेष कहानियाँ नयी हैं। इनके कथ्य, इनकी शैली, इनके शब्दों में वो सारे परिवर्तन परिलक्षित होते हैं जो मुझमें जीवन के इस कठिन दौर में चलते-चलते आए थे। ये कहानियाँ ज़्यादातर प्रेम-कहानियाँ हैं और अगर कुछ और भी है तो उसका भी आधार प्रेम ही है।
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मैं अपने तीसरे कहानी-संग्रह की दुनिया में आपका स्वागत करता हूँ। कुछ कहानियाँ शब्दों से ही नहीं, स्वभाव से भी बड़ी होती हैं और जीवन के एक पूरे के पूरे दौर की व्याख्या कर जाती हैं। ऐसी ही कहानियां ‘संक्षिप्त’ में संकलित हैं। ये सारी कहानियाँ मेरी ज़िंदगी का झूठा-सच हैं, मतलब अनुभूतियों से सच और पात्रों से झूठ। इन्हें मैंने इतने करीब से जिया है कि इनपर मेरा एक सौ एक प्रतिशत अधिकार है। मैं इन्ही कहानियों पर उपन्यास बनाने की कोशिश कर रहा हूँ जो एक-एक करके आपके सामने आएंगी। एक-दो कहानियाँ पुरानी हैं और शेष कहानियाँ नयी हैं। इनके कथ्य, इनकी शैली, इनके शब्दों में वो सारे परिवर्तन परिलक्षित होते हैं जो मुझमें जीवन के इस कठिन दौर में चलते-चलते आए थे। ये कहानियाँ ज़्यादातर प्रेम-कहानियाँ हैं और अगर कुछ और भी है तो उसका भी आधार प्रेम ही है।
Book Details
-
ISBN9788193463369
-
Pages354
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल तिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
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