Kis Paar
Author:
Harsh RanjanPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 127.5
₹
150
Available
मेरे दोस्त ! तुम्हारी बुझी आँखों में मुझे उस भारत की तस्वीर दिखती है ,जिसमें रंग भरने को ना जाने कितनी किस्तों में कितनों ने लहू बहाए हैं । मुबारक हो ये रंग तुम्हें और उन्हें जिनके खेतों की खड़ी फसल इस इंसानी आग ने जलाए हैं । भूली मंजिलें ,भटकाती राहें ,शरीर तोड़ती चोटें और निहायती ठंडी आहें ! इनमें उलझे कल तुम्हीं तो मिले थे अंधेरी रात ,सूने रास्ते पर जूतों से गर्द उड़ाते ,हंसते-हंसते कोई उदास गीत गाते !कहाँ खो दिए वो सुकुमार शरीर ,भोली मुस्कुराहटें ,आँखों का रंग ,बचकानी चाहतें ? समूचा शहर जला दिया !क्यों ? तुम्हारे जैसे कितने सुनहरे सपने आसमान से टूटकर बेसहारा ,बिखरकर इस आग में गिर पड़े ! सब कुछ छिन गया ! जरूरतें मिट गयीं ,गया तुम्हारा शौक , तुम्हारे अरमान ;कट गए तुम्हारे पर, टूट गया तुम्हारा आसमान !तुम्हारे अरमानों के प्रेत ,तुम्हारा यह पिंजर बलिदान नहीं अभी बस मौत है । मेरे दोस्त !अपने चिता की एक चिंगारी मुझे दे दो ! इस पाप की लंका के लिए बस इतना ही काफी है ।ये सारे लुटेरे मारे जाऐंगे ,सारे अंधेरे दूर हो जाऐंगे क्योंकि अब तक की उस समझ को हमने दूर करने का प्रण लिया है जो लहू की कीमत को लहू बहने के डर से जोड़ती थी ।
ISBN: 9788193827147
Pages: 126
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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कलकत्ता का माले-मस्त मारवाड़ी समुदाय अर्थात् राजस्थान का ग़रीब, पसीने और परचून से चीकट कपड़ों वाला बनिया जो महानगरी में जाकर विकट धर्मपति हुआ। उग्र जी के इस उपन्यास का विषय है। अपनी देखी-समझी दुनिया की रगों-नसों में विश्वसनीय ढंग से उतरने की कला में माहिर उग्र जी ने यहाँ इस समुदाय की उन तमाम विकृतियों को उजागर किया है जो धन के अनायास आगमन के साथ आती हैं। निर्ममता की हद तक तटस्थ व्यंग्य के साथ खींचे गए राजमल जयपुरिया, घीसालाल और घमंडीलाल आदि के चित्र कलकत्ता के सम्पन्न मारवाड़ियों का बयान तो करते ही हैं, साथ ही वे हमारे समकालीन धनाढ्य वर्ग के भी आधिकारिक चित्र प्रतीत होते हैं।
उग्रजी की सुगठित, तेजवान व्यंग्य से दीप्त शैली का प्रतिनिधित्व करता उपन्यास।
Trymbakam Yajamahe
- Author Name:
Mahendra Madhukar
- Book Type:

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Description:
शिव-चेतना का अनुभव एक अद्वैत अनुभव है। यह विरोधों में सामंजस्य की प्रवृत्ति है। यों कहें कि विरुद्ध को अनुकूल बनाने की दृष्टि है। हम जानते हैं कि मृत्यु एक बड़ी सच्चाई है पर फिर भी हम अमरत्व की कामना करते हैं। हम तो अमर नहीं हो सकते पर हमारा कर्म हमें अमर कर सकता है।
परमात्मा के त्रिगुण रूपों में भगवान शिव परम अनुरक्त और परम विरक्त देवता हैं। इसलिए ये महादेव हैं, क्योंकि महान वही हो सकता है जो सभी स्थितियों में महान लगे। जो नीचे से ऊपर तक, बाहर से भीतर तक एक समान हो। शिव का 'कैलास' शिखर मन का प्रतीक है।
महादेव शिव के लिए 'त्रयम्बकं यजामहे' कहकर उनका पूजन और सम्मान किया गया है। समस्त दिशाएँ उनके वस्त्र हैं, सजल मेघ उनके जटाजूट हैं, आकाश उनका दृप्त भाल, विद्युत् उनका तीसरा नेत्र और पृथ्वी उनकी रंगशाला है, जिसमें निरन्तर अणुओं का नृत्य (dancing atoms) चलता रहता है। शिव ज्ञान के, औषधि के, नृत्य और नाद के, जीवन और मृत्यु के, अमृत और विष के विलक्षण समन्वय हैं। शिव के बाएँ आधे भाग में पार्वती सुशोभित हैं, माथे पर आधा चन्द्रमा चमक रहा है। वे शिव के साथ मिलकर पूर्णत्व प्राप्त करते हैं। शिव स्वीकृति के देवता हैं। उनके लिए सभी ग्राह्य हैं। वहाँ निषेध के लिए अवकाश नहीं। उनके भक्त ताल-बेताल नाचें या गाएँ, मुँह से बम-बम का स्वर निकालें, गाल बजाएँ, उनके दरबार में सब जायज़ है।
शिव-केन्द्रित इस उपन्यास के शिव भूत-प्रेत जैसे दिव्यांग जीवों के शरणदाता और पोषक हैं। वे बहुमुखी, बहुआयामी हैं, गायक, वादक, नर्तक, स्वयंभू, जीव और जन्तुओं के उद्धारक, महावीर, महादेव, अर्द्धनारीश्वर और लोकोपकारक हैं। उनका रोदन-रस ही रुद्राक्ष है। उनकी पार्वती स्त्री-शक्ति और पर्यावरण संरक्षा की प्रतिनिधि हैं। इस इकार रूपा शक्ति के अभाव में शिव भी शव रूप हो जाते हैं। उन पर केन्द्रित यह पौराणिक महाकाव्यात्मक उपन्यास, हमें आशा है, संसार को देखने की हमारी दृष्टि को विस्तृत करेगा।
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