Saavan Ki Ek Saanjh
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Author:
Harsh RanjanPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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दोस्तों ! ‘एक आग का दरिया’ के बाद मेरी ये दूसरी कृति, एक कहानी संग्रह, ‘सावन की एक साँझ’ आपके सामने प्रस्तुत है। दस कहानियाँ हैं इसमे जिनमे ज़्यादातर नई हैं मतलब पिछले तीन-चार सालों मे लिखी गईं...ये उस दौर की कहानियाँ हैं जब जीवन के ज़ीरो माईल पर खड़े होकर मैंने सावन की मूसलाधार बारिश में भींगना स्वीकार किया था। कभी खुद से सीखा, कभी दूसरों ने सिखाया और मैं पहले की तरह लिखता गया। भगवान ने ऐसी ज़िंदगी दी है कि कहानियों की कभी कोई कमी नहीं हुई...कभी-कभी लगता है ज़िंदगी कम पड़ जाएगी, मेरी लिखने के लिए और आपकी पढ़ने के लिए। सावन की वो साँझ ऐसी साँझ थी जो जीवन के एक दौर और एक कहानी संग्रह की पहचान बन गयी...उस साँझ ने मुझे सुबह का मतलब समझाया और समय ने स्वर्ग की उस सीढ़ी का पता मुझे बताया जिसने मुझे अपनी पहचान बदलने मे सहायता की।
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दोस्तों ! ‘एक आग का दरिया’ के बाद मेरी ये दूसरी कृति, एक कहानी संग्रह, ‘सावन की एक साँझ’ आपके सामने प्रस्तुत है। दस कहानियाँ हैं इसमे जिनमे ज़्यादातर नई हैं मतलब पिछले तीन-चार सालों मे लिखी गईं...ये उस दौर की कहानियाँ हैं जब जीवन के ज़ीरो माईल पर खड़े होकर मैंने सावन की मूसलाधार बारिश में भींगना स्वीकार किया था। कभी खुद से सीखा, कभी दूसरों ने सिखाया और मैं पहले की तरह लिखता गया। भगवान ने ऐसी ज़िंदगी दी है कि कहानियों की कभी कोई कमी नहीं हुई...कभी-कभी लगता है ज़िंदगी कम पड़ जाएगी, मेरी लिखने के लिए और आपकी पढ़ने के लिए। सावन की वो साँझ ऐसी साँझ थी जो जीवन के एक दौर और एक कहानी संग्रह की पहचान बन गयी...उस साँझ ने मुझे सुबह का मतलब समझाया और समय ने स्वर्ग की उस सीढ़ी का पता मुझे बताया जिसने मुझे अपनी पहचान बदलने मे सहायता की।
Book Details
-
ISBN9788193463352
-
Pages256
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल तिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
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