Shrimad Bhagavadgita Mein Karma Aur Netratva Siddhant | Shrimad Bhagwat Geeta Hindi
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Author:
Dr. Asmika SinhaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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We read the dialogue between Shri Krishna and Arjuna and these teachings of Shri Krishna as the Srimad Bhagavad Gita. Shrimad Bhagavad Gita means the song of wisdom sung by God. We can see Shri Krishna not only as Arjuna's charioteer, but also as the charioteer of our lives. By following the path shown by him, we can find relief from all the worries and sorrows of life. The Bhagavad Gita is like a continuously flowing river of ideas and knowledge, irrigating Indian culture for ages and giving the message of moving forward on the path of action. Its ocean of knowledge is deep and vast; the more we immerse ourselves in it, the more pearls of wisdom we receive. The Bhagavad Gita, a journey of knowledge, defines action and leadership in seven chapters; this is the aim of this book. Like almost every major religious text in India, the Gita cannot be accurately dated to its composition. However, it appears to have been composed later than the 'classical' Upanishads, with the possible exception of Maitri, and to have been a work of Buddhism post-dating the period. It is clear from materials dating from the fifth and second centuries BCE that the major teachings of both the Upanishads and early Buddhism were similar to those of the Gita, as was the dualistic teaching, commonly known as Samkhya, later defined in the Samakhya-karika Ishakrpa.
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About the Book
We read the dialogue between Shri Krishna and Arjuna and these teachings of Shri Krishna as the Srimad Bhagavad Gita. Shrimad Bhagavad Gita means the song of wisdom sung by God. We can see Shri Krishna not only as Arjuna's charioteer, but also as the charioteer of our lives. By following the path shown by him, we can find relief from all the worries and sorrows of life. The Bhagavad Gita is like a continuously flowing river of ideas and knowledge, irrigating Indian culture for ages and giving the message of moving forward on the path of action. Its ocean of knowledge is deep and vast; the more we immerse ourselves in it, the more pearls of wisdom we receive. The Bhagavad Gita, a journey of knowledge, defines action and leadership in seven chapters; this is the aim of this book.
Like almost every major religious text in India, the Gita cannot be accurately dated to its composition. However, it appears to have been composed later than the 'classical' Upanishads, with the possible exception of Maitri, and to have been a work of Buddhism post-dating the period. It is clear from materials dating from the fifth and second centuries BCE that the major teachings of both the Upanishads and early Buddhism were similar to those of the Gita, as was the dualistic teaching, commonly known as Samkhya, later defined in the Samakhya-karika Ishakrpa.
Book Details
-
ISBN9789392013997
-
Pages244
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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उपनिषद् भारत के गौरव-ग्रंथ हैं। ये वेदों के अंतिम भाग हैं। वैसे तो ये विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ हैं, किंतु दुःख की बात है कि इनसे हम भारतीय ही बहुत कम परिचित हैं। अत्यंत सरल किंतु ओजस्वी भाषा में ये ग्रंथ दार्शनिक समस्याओं पर विचार करते हैं, ऐसी दार्शनिक समस्याओं पर जो मानवजीवन से जुड़ी हुई हैं। ये भारत को श्रेष्ठ मार्ग तो दिखाते ही हैं...प्रेरित करते हैं...चेतावनी भी देते हैं कि यदि हमने इसे नहीं अपनाया तो जीवन में महान हानि निश्चित है।
इस तरह उपनिषदों की शिक्षा सदियों से मानव पर उपकार करती आई है। उपनिषदों ने न केवल भारतीयों को अथवा हिंदुओं को प्रभावित किया है वरन् इन्होंने अन्य देश एवं धर्म के लोगों को भी प्रभावित किया है। अनेक विदेशी विद्वान भी इनके मुरीद हुये हैं। इनसे न केवल परवर्ती आस्तिक दर्शन सिंचित हुये हैं वरन् नास्तिक दर्शन भी सिंचित हुये हैं।
उपनिषदों की एक बड़ी विशेषता यह भी रही है कि वेदों के कर्मकांड की ओर बढ़ते कदमों को रोककर यहां के तेजस्वी ऋषियों ने ज्ञानकांड की गंगा बहाकर भारतीय दर्शन, भारतीय समाज और भारतीय धर्म को एक नई दिशा की ओर मोड़ा है। भगवत्गीता पर उपनिषदों का अत्यंत प्रभाव पड़ा है। गीता को इसीलिये उपनिषदों का सार कहा जाता है।
उपनिषदों के विचार मुख्यतः गुरु और शिष्य के मध्य संवाद रुप में प्रस्तुत हुये हैं। वैसे तो उपनिषदों की संख्या 108 मानी जाती है किंतु इस ग्रंथ में हमने 11 प्रमुख उपनिषदों में आये संवादों को 31 अध्यायों में प्रस्तुत किया है। बृहदारण्यक एवं छांदोग्य उपनिषद् से सर्वाधिक संवाद लिये गये हैं जो इन उपनिषदों का बृहत् आकार देखते हुये स्वाभाविक है।
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