Draupadi
(0)
Author:
Kaajal Oza VaidyaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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भरे राजदरबार में द्रौपदी ने कुरुवंश के अनेक बड़े-बुजुर्गों और दुर्योधन से सवाल पूछा था, ‘‘मेरे पति पहले मुझे हारे थे कि अपने आपको?’’ तब उसका अपमान किया गया था। उसी द्रौपदी ने वर्षों तक निरंतर बिना कोई प्रश्न पूछे पाँच पतियों की सेवा की थी, इस बारे में कहीं किसी ने कोई उल्लेख तक नहीं किया है। समाज की यह संपूर्ण व्यवस्था स्त्री-विरोधी क्यों है? स्त्री का स्वभाव एक ही पुरुष के साथ बँधकर रहना और सुरक्षा की अपेक्षा करना है, परंतु वह सहन कर सके, उससे अधिक अत्याचार अगर उस पर किए जाएँ तो उसमें से जागा विद्रोह सर्वनाश करता है। स्त्री का विद्रोह समाज को बदलता है, बदलने के लिए मजबूर करता है। जिस प्रकार बीज को उगाने के लिए धरती में दबाना पड़ता है, उसी प्रकार दबाई हुई, कुचली हुई स्त्री जमीन फोड़कर अंकुर की तरह फूटती है, विकसित होती है और विशालकाय वृक्ष बन जाती है, जबकि पुरुष मिट्टी की तरह वहीं-का-वहीं रह जाता है। प्रस्तुत पुस्तक में द्रौपदी के रूप में स्त्रियों की पीड़ा, उनकी मनोव्यथा, उनके सुख अथवा उनकी समझदारी की कथा उनकी जुबानी ही लिखी गई है। पर यह ‘द्रौपदी’ वर्तमान की है, ‘आज’ की है। अभी भी जी रही है—शायद हर स्त्री में! स्त्री-विषयक समस्याओं, विसंगतियों एवं विद्रूपताओं को विश्लेषित करती एक पठनीय कृति।
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भरे राजदरबार में द्रौपदी ने कुरुवंश के अनेक बड़े-बुजुर्गों और दुर्योधन से सवाल पूछा था, ‘‘मेरे पति पहले मुझे हारे थे कि अपने आपको?’’ तब उसका अपमान किया गया था। उसी द्रौपदी ने वर्षों तक निरंतर बिना कोई प्रश्न पूछे पाँच पतियों की सेवा की थी, इस बारे में कहीं किसी ने कोई उल्लेख तक नहीं किया है। समाज की यह संपूर्ण व्यवस्था स्त्री-विरोधी क्यों है?
स्त्री का स्वभाव एक ही पुरुष के साथ बँधकर रहना और सुरक्षा की अपेक्षा करना है, परंतु वह सहन कर सके, उससे अधिक अत्याचार अगर उस पर किए जाएँ तो उसमें से जागा विद्रोह सर्वनाश करता है। स्त्री का विद्रोह समाज को बदलता है, बदलने के लिए मजबूर करता है।
जिस प्रकार बीज को उगाने के लिए धरती में दबाना पड़ता है, उसी प्रकार दबाई हुई, कुचली हुई स्त्री जमीन फोड़कर अंकुर की तरह फूटती है, विकसित होती है और विशालकाय वृक्ष बन जाती है, जबकि पुरुष मिट्टी की तरह वहीं-का-वहीं रह जाता है।
प्रस्तुत पुस्तक में द्रौपदी के रूप में स्त्रियों की पीड़ा, उनकी मनोव्यथा, उनके सुख अथवा उनकी समझदारी की कथा उनकी जुबानी ही लिखी गई है। पर यह ‘द्रौपदी’ वर्तमान की है, ‘आज’ की है। अभी भी जी रही है—शायद हर स्त्री में! स्त्री-विषयक समस्याओं, विसंगतियों एवं विद्रूपताओं को विश्लेषित करती एक पठनीय कृति।
Book Details
-
ISBN9789350485460
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कामिनी काय कांतारे’ अर्थात कामिनी काया के जंगल में! राजा भर्तृहरि, गृहस्थ भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि, योगी भर्तृहरि! बहुमखी प्रतिभा के धनी विविध रूप-गुणों से संपन्न भर्तृहरि के जीवन पर आधारित यह उपन्यास कामिनी कंचन के बीच से ही नहीं गुजरता, कामिनी काया के जंगल से भी गुजरता है और कथा, इतिहास, मिथक के बल पर एक महान क्लासिक रचना वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार महेश कटारे की कलम से पूर्णता को प्राप्त करती है। यह उपन्यास न मात्र बेहद पठनीय और रोचकता के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है, ज्ञान को दीप्त करने वाली विशिष्ट कृति है। भारतीय परंपरा की थाती। उपन्यासकार के शब्दों में, ''भरथरी गाने वालों की कथा में बीवी की बेवफाई से दुखी राजा भरथरी जोगी बनकर महल, हवेली, राजपाट छोड़कर निकल गए। गुरु गोरखनाथ के कहने पर वह अपनी उसी पत्नी रानी पिंगला से भीख माँगने द्वार पर पहुँचे तो राजा को जोगी के भेष में देख रानी पछाड़ खाकर गिर पड़ी। 'भरथरी’ सुनती स्त्रियों की भीड़ राजा के घर से निकलते ही आँसू बहाने लगती और रानी के पछाड़ खा गिरने पर तो अनेक की 'कीक’ फूट जाती। इस भर्तृहरि से मेरा बचपन का परिचय था। बाद में सरसरी दृष्टि से शतकत्रय भी पढ़े थे तो उस रात मैंने मित्रों को दो-तीन श्लोक सुना डाले। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि भर्तृहरि बहुत बड़ा कवि है। हमारे यहाँ ऐसे लोगों पर बहुत कम काम हुआ है, सो मैं एक उपन्यास लिखूँ।...’’ और अब यह उपन्यास दो खण्डों में आपके सामने है। हिंदी की एक अनमोल कृति के रूप में!...
Amar Desva
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Praveen Kumar
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कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बीतते-न-बीतते उस पर केन्द्रित एक संवेदनशील, संयत और सार्थक औपन्यासिक कृति का रचा जाना एक आश्चर्य ही कहा जाएगा। कहानियों-कविताओं की बात अलग है, पर क्या उपन्यास जैसी विधा के लिए इतनी अल्प पक्वनावधि/जेस्टेशन पीरियड काफ़ी है? और क्या इतनी जल्द पककर तैयार होनेवाले उपन्यास से उस गहराई की उम्मीद की जा सकती है जो ऐसी मानवीय त्रासदियों को समेटनेवाले उपन्यासों में मिलती है? इनका उत्तर पाने के लिए आपको अमर देसवा पढ़नी चाहिए जिसने अपने को न सिर्फ़ सूचनापरक, पत्रकारीय और कथा-कम-रिपोर्ट-ज़्यादा होने से बचाया है, बल्कि दूसरी लहर को केन्द्र में रखते हुए अनेक ऐसे प्रश्नों की गहरी छान-बीन की है जो नागरिकता, राज्यतंत्र, भ्रष्ट शासन-प्रशासन, राजनीतिक निहितार्थों वाली क्रूर धार्मिकता और विकराल संकटों के बीच बदलते मनुष्य के रूपों से ताल्लुक़ रखते हैं। इस छान-बीन के लिए प्रवीण संवादों और वाचकीय कथनों का सहारा लेने से भरसक परहेज करते हैं और पात्रों तथा परिस्थितियों के घात-प्रतिघात पर ज़्यादा भरोसा करते हैं। इसीलिए उनका आख्यान अगर मानवता के विरुद्ध अपराध घोषित किए जाने लायक़ सरकारी संवेदनहीनता और मौत के कारोबार में अपना लाभ देखते बाजार-तंत्र के प्रति हमें क्षुब्ध करता है, तो निरुपाय होकर भी जीवन के पक्ष में अपनी लड़ाई जारी रखनेवाले और शिकार होकर भी अपनी मनुष्यता न खोनेवाले लोगों के प्रति गहरे अपनत्व से भर देता है। संयत और परिपक्व कथाभाषा में लिखा गया अमर देसवा अपने जापानी पात्र ताकियो हाशिगावा के शब्दों में यह कहता जान पड़ता है, ‘कुस अस्ली हे... तबी कुस नकली हे। अस्ली क्या हे... खोज्ना हे।’ असली की खोज कितनी करुण है और करुणा की खोज कितनी असली, इसे देखना हो तो यह उपन्यास आपके काम का है।
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