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सिल्फ़ नाम से ख़ुद को ज़माने के समक्ष रखने वाली मॉनिका मोहन दिल्ली की पैदाइश हैं। एक अक्टूबर उन्नीस सौ इक्यानवे को जन्म हुआ और तब से कभी खुद के बाहर तो कभी अंदर चक्कर लगाती रहती हैं। इन्हें उर्दू से इश्क़ है मगर स्रातक बी. कॉम. ऑनर्स से हुआ। रगों में संगीत बहता है मगर दफ़्तरी से काया संभाले हैं। अपनी पर्सनैलिटी का कुछ श्रेय अपनी स्कूल टीचर मिसेज़ नीरू किनरा को देती हैं और कुछ अपने घर से मिली रोज़मर्रा की तालीम को।हिंदुस्तानी में सोचती हैं, लिखती हैं और लड़ती हैं तो अंग्रेज़ी का फव्वारा फूटने लगता है। इनकी दोस्ती पहाड़ों से है, आबशारों से है। गुलज़ार की नज़्मों को सीने पर रखकर सोती हैं और मंटो की कलम से सीना मज़बूत रखती हैं। मगर माथे को सिर्फ़ मिट्टी से सजाती हैं। अजीब हैं और यह बात जानती भी हैं। ज़िंदगी में कुछ ख़ास कमाने की ख़्वाहिश नहीं रखतीं, न ही खुद को किसी एक साँचे में ढालती हैं। इकलौती ख़्वाहिश जो है तो बस होने की, बहने की। साल 2024 में अपने आसमान में मिट्टी का दख़ल कुबूल किया। इस अटपटे परिचय के लिए मु' मुआफ़ी माँगती हुई, हवा की रूह आपको आदाब करती है।

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