Neki Kar, Akhbar Main Dal
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तमाम दरियाओं की गन्दगी देखकर पता लगता है कि लोग अब दरियाओं में नेकी तो नहीं डालते। कोई वक़्त रहा होगा, जब नेकी दरिया में डाली जाती थी। कोई वक़्त रहा होगा, जब साधु-सन्त प्रवचन करते थे, अब प्रवचनों की मार्केटिंग होती है। रामकथा की मार्केटिंग होती है। राम की मार्केटिंग होती है। राम के चाकर तुलसीदास ने लिखा था कि बड़ी मुश्किल से खाने का इन्तज़ाम हो पाता है, मस्जिद में सोना पड़ता है। अब राम के चाकर एक मस्जिद छोड़, पचास मस्जिद भर की जगह क़ब्ज़ा कर लें। राम की चाकरी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी के रिटर्न इधर समान हो गए हैं। राम की चाकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं। राम का कारोबार इधर बहुत रिटर्न वाला हो गया है। ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि बाज़ार सिर्फ़ वहाँ नहीं है, जहाँ वह दिखाई पड़ता है। बाज़ार वहाँ भी है, जहाँ वह दिखाई नहीं पड़ता है।</p> <p>बाज़ार के इस छद्म को पकड़ने की चुनौती ख़ासी जटिल है। यह किताब इस छद्म को समझने में महत्त्वपूर्ण मदद करती है। व्यंग्य के लपेटे से कुछ भी बाहर नहीं है, इस कथन की पुष्टि इस किताब में बार-बार होती है।</p> <p>
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तमाम दरियाओं की गन्दगी देखकर पता लगता है कि लोग अब दरियाओं में नेकी तो नहीं डालते। कोई वक़्त रहा होगा, जब नेकी दरिया में डाली जाती थी। कोई वक़्त रहा होगा, जब साधु-सन्त प्रवचन करते थे, अब प्रवचनों की मार्केटिंग होती है। रामकथा की मार्केटिंग होती है। राम की मार्केटिंग होती है। राम के चाकर तुलसीदास ने लिखा था कि बड़ी मुश्किल से खाने का इन्तज़ाम हो पाता है, मस्जिद में सोना पड़ता है। अब राम के चाकर एक मस्जिद छोड़, पचास मस्जिद भर की जगह क़ब्ज़ा कर लें। राम की चाकरी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी के रिटर्न इधर समान हो गए हैं। राम की चाकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं। राम का कारोबार इधर बहुत रिटर्न वाला हो गया है। ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि बाज़ार सिर्फ़ वहाँ नहीं है, जहाँ वह दिखाई पड़ता है। बाज़ार वहाँ भी है, जहाँ वह दिखाई नहीं पड़ता है।</p>
<p>बाज़ार के इस छद्म को पकड़ने की चुनौती ख़ासी जटिल है। यह किताब इस छद्म को समझने में महत्त्वपूर्ण मदद करती है। व्यंग्य के लपेटे से कुछ भी बाहर नहीं है, इस कथन की पुष्टि इस किताब में बार-बार होती है।</p>
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Book Details
-
ISBN9788171197804
-
Pages103
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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जब ढोल की बात चल ही पड़ी है, तो एक और खास बात है जिस पर आपको गौर करना चाहिए। ... और वह यह है कि, जो ढोल जितनी गहन, गम्भीर आवाज करता है, वह अन्दर से उतना ही खोखला होता है। ढोल की आवाज, उसके आकार-प्रकार पर कम, उसके खोखलेपन पर ज्यादा निर्भर करती है। ढोल की एक पोल भी होती है, जो कभी-कभी खुल जाती है। परम्परागत ढोल की तो पोल खुलते ही वह बजना बन्द हो जाता है और घर के किसी कोने पर सन्यास लेकर पड़ा रहता है, जब तक कि उसे उसकी पोल के साथ पुनः कस न दिया जाय। लेकिन आधुनिक पीढ़ी के ढोल तो, पोल खुलने के बाद भी उतनी ही गम्भीर रिदम के साथ पूरी बेशर्मी से बजते रहते हैं... और मजे की बात यह है कि लोग उसे सुनते भी रहते हैं... पूरी तन्मयता के साथ। बजनेवाले ढोल, अगर आपके नजदीक बज रहे हों, तो वे आपको कर्कश लग सकते हैं... लेकिन ज्यों-ज्यों ढोल और आपके बीच की दूरी बढ़ती जाती है, उनकी आवाज अपेक्षाकृत मधुर होती जाती है, और विश्वसनीय भी।
Hashiye Par
- Author Name:
K. D. Singh
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व्यंग्य का उद्देश्य यह होता है कि आप अपनी ख़ामियों को जान भी लें, और आहत भी महसूस करें। कई बार करुणा भी पैदा करता है। इस पुस्तक में संकलित व्यंग्य-रचनाएँ हल्की चोट मारकर गहरे और दीर्घकालीन प्रभाव को सम्भव करती हैं। शायद इसीलिए व्यंग्यकार ने अधिकांशत: यहाँ ऐसे विषयों को चुना है जो हमारे सामाजिक जीवन में परम्पराओं के रूप में निहित हैं। मसलन धार्मिक कर्मकांड और आज के युग में उनकी धन-केन्द्रीयता। पहले ही व्यंग्य, ‘गंगे तव दर्शनात् मुक्ति’ में गंगा-स्नान और उसके इर्द-गिर्द होनेवाली अन्य धार्मिक क्रियाओं के बहाने होनेवाली लूट को दिलचस्प ढंग से दिखाया गया है। इसी तरह ‘धर्मोपदेश:’, ‘जिन्नबबूता की भारत यात्रा’ और अन्य रचनाओं में प्रशासन, राजनीति, पुलिस-तंत्र आदि को केन्द्र में रखते हुए हमारे सामाजिक व्यवहार की बारीक पड़ताल की गई है। इन व्यंग्य रचनाओं में कहीं कहानी की तरह, तो कहीं सीधी टिप्पणियों और कहीं रूपक के माध्यम से हास्य की रचना की गई है, लेकिन लेखक के सरोकार कहीं भी ओझल नहीं होते। हर साहित्यिक प्रयास का अन्तिम लक्ष्य जीवन जैसा है, उसे उससे बेहतर बनाना होता है, इस पुस्तक में शामिल व्यंग्य भी इस लक्ष्य से नहीं भटकते। एक अंश देखें, “शाम को एकान्त में बैठकर जिवनू ने लिखा—‘प्रान्त का सामाजिक जन-जीवन धर्म और अध्यात्म से परिपूर्ण है।...इस कार्य में युवाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण है। देवी-पूजा के नौ दिन अधार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को दंडित करने का प्रचलन है। युवा नागरिकगण मद्य-भाँग-धतूरा आदि के नशे में उन्मत्त होकर अधार्मिक वर्ग की महिलाओं का स्तन-मर्दन करते तथा पुरुषों की माँ -बहन को विभिन्न पशुओं के साथ यौन-क्रियाओं के लिए आमंत्रित करते चला करते हैं।’’
KUCHH SHARIF KUCHH SHARARTI
- Author Name:
Ram Badan Ray
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Satire
Shaadi Himaqat Hai
- Author Name:
Shauqat Thanvi
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इस किताब में शौकत थानवी की चुनिन्दा मज़ाहिया तहरीरें शामिल हैं जिसमें न केवल आपको हँसाने और गुदगुदाने का सामान है बल्कि उर्दू की मिज़ाह-निगारी से आपका तआरुफ़ भी कराती हैं।
White House Mein Ramleela
- Author Name:
Alok Puranik
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आलोक पुराणिक ने अपनी रचनाओं से व्यंग्य विधा को एक नया शिल्प और सौन्दर्य प्रदान कर विशिष्ट पहचान दी है। ‘व्हाइट हाउस में रामलीला’ उनका महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इस व्यंग्य-संग्रह में उनकी आकार में छोटी दिखनेवाली टिप्पणियाँ विचार का एक
बड़ा कैनवस रचती हैं। आम आदमी की रोज़मर्रा की पीड़ा से लेकर व विश्व फ़लक पर होनेवाली घटनाओं तक सबको उन्होंने इसमें समेटा है।
आज की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व आर्थिक विडम्बनाओं का परत-दर-परत खोलते हुए व्यंग्यकार ने उन कारणों की ओर भी संकेत किया है जो इन स्थितियों के मूल में हैं।
कुछ लेखों में धार्मिक आडम्बरों और ढोंगों पर भी व्यंग्य किया गया है जो लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर अपनी जेब भरते हैं।
समसामयिक जीवन और समाज के विभिन्न पक्षों पर तीखी निगाह से दृष्टिपात करते ये व्यंग्य-लेख निश्चय ही पाठकों को लम्बे समय तक याद रहेंगे।
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