Sarveshwardayal Saxena
Kitabon mein Billi ne Bachche Diye Hain
- Author Name:
Debabrata Ghosh +1
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Book Type:

- Description: इब्न बतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में Only a great poet such as Sarveshwar Dayal Saxena can write a poem for children about going into a storm. Not a regular storm, but a storm that can break you into two. Stopping only to repair his shoes, Ibn Batuta enters storm after storm. The poem rekindles memories of Ibn Battuta's courageous travels from Morocco to India as it brings life to the rhymes for children. All poems in this collection are equally remarkable. For instance, read the following poem, crisp composition with a breezy rhyme: महँगू ने महँगाई में, पैसे फूँके टाई में While poems' temperament rises and falls, Debabrata Ghosh's illustrations are quiet and serene. The green in these illustrations is at its quietest, and so is the colour blue. Age group 6-8 years
Kitabon mein Billi ne Bachche Diye Hain
Debabrata Ghosh
Mahangoo Ki Tai
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description: ‘महँगू की टाई’ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की बाल-कविताओं का संकलन है। यह कविता-पुस्तक सरल-सुलभ भाषा में बच्चों के सांसारिक अनुभवों को दर्ज़ करती है। पुस्तक की सभी कविताओं में लयात्मक तुकबंदियाँ हैं, जो बचपन के हर्षोल्लास को अपनी गीतात्मक रचनाशीलता के साथ अभिव्यक्त करती हैं।
Mahangoo Ki Tai
Sarveshwardayal Saxena
Lakh Ki Naak
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description: लाख की नाक’ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना द्वारा लिखा गया बाल नाटक है। इस नाटक के विषय में सर्वेश्वर कहते हैं, यदि आप बच्चों के साथ खेल नहीं सकते तो बच्चों के लिए लिख भी नहीं सकते, चाहे नर्सरी कविता हो चाहे नाटक। बच्चों के अनुभव संसार से जुड़कर ही किसी भी आयु वर्ग का अनुभव बच्चों का अपना अनुभव बन पाता है जिसमें तर्क से अधिक बाल अभिरुचि का महत्त्व है। ‘लाख की नाक’ एक ऐसा ही नाटक है। यह नाटक बाल-गीतों के प्रवाह में अपने संवादों को पूर्ण बनाता है।
Lakh Ki Naak
Sarveshwardayal Saxena
Kavitayen : Vol. 1
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description: ‘कविताएँ–1’ में कवि सर्वेश्वर के दो संग्रहों की रचनाएँ एक साथ प्रस्तुत की गई हैं—‘काठ की घंटियाँ’ और ‘बाँस का पुल’। इन कविताओं में वह एक ओर अपनी आत्म–चेतना के प्रति अत्यधिक सजग प्रतीत होते हैं, तो दूसरी ओर व्यापक समष्टि–चेतना के प्रति उनका गहरा लगाव मन को आकर्षित करता है। इनमें रोमानी भाव–बोध जितना सत्य है, उतना ही सत्य है समसामयिक परिवेश से जुड़े रहना। इन कविताओं ने छायावाद के बाद नई कविता की पहचान बनाने में ऐतिहासिक भूमिका अदा की है और कहा गया है कि ‘हिन्दी की कविता का जहाँ भी उल्लेख होगा, सर्वेश्वर की चर्चा के बिना अधूरा ही रहेगा’। ‘सर्वेश्वर ने नई कविता नहीं लिखी वरन् स्वयं नई कविता के विशिष्ट लक्षण किसी हद तक सर्वेश्वर के काव्य के माध्यम से ही प्रस्फुटित हुए हैं।’ इन कविताओं ने दरअसल यह भी सिद्ध किया है कि साहित्यिकता और लोकप्रियता में कोई वैर नहीं होता।
Kavitayen : Vol. 1
Sarveshwardayal Saxena
Kavitayen : Vol. 2
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description:
नई कविता की लोक–सम्पृक्ति के प्रतिनिधि कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की ‘कुआनो नदी’ और ‘जंगल का दर्द’ से पूर्ववर्ती सम्पूर्ण काव्य–साधना का पहला खंड ‘कविताएँ–1’ कविताओं का यह दूसरा खंड है। इसमें पूर्व प्रकाशित कवि के दो संग्रहों (‘एक सूनी नाव’ और ‘गर्म हवाएँ’) की कविताएँ सम्मिलित हैं। इन कविताओं में कवि के निजी जीवन और समसामयिक सामाजिक, राजनीतिक जीवन की त्रासदी परस्पर गुम्फित है। ये कविताएँ राजनीति से भागती नहीं क्योंकि वह आज के जीवन का हिस्सा हैं लेकिन राजनीतिक मतवाद से उनका अलगाव अवश्य है। दरअसल, सर्वेश्वर के तर्इं इनसान से बड़ा कुछ भी नहीं है—न ईश्वर, न प्रकृति—सबका क़द उनके यहाँ एक
है।सर्वेश्वर की कविताएँ भाषा से दुर्व्यवहार करनेवाले कवियों की इधर बढ़ती हुई भीड़ के लिए एक सबक भी है। वे अपनी निजी दुनिया में ले जाकर, सामाजिक ‘सच्चाई’ से सूक्ष्म सम्पर्क करती हुर्इं, पाठक के मन में भाषा के प्रति एक धड़कता हुआ रिश्ता बनाती हैं। ‘एक सूनी नाव’ और ‘गर्म हवाएँ’—ये शीर्षक ही सर्वेश्वर की काव्य–यात्रा के बदलाव को सूचित करते हैं। पर सर्वेश्वर की कविता में जो ‘ग़ुस्सा’ धीरे–धीरे अपेक्षाकृत अधिक मुखर हुआ है, उसके पीछे भाषा पर पड़नेवाले दबाव की स्थिति से एक गहरा रचनात्मक मुक़ाबला है। कविता में निषेधी भाषा की तीव्र उपस्थिति कुछ करने और बदलने की इच्छा से अनुप्रेरित है—सिर्फ़ ग़ुस्से से ही नहीं।
Kavitayen : Vol. 2
Sarveshwardayal Saxena
Kuano Nadi
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description:
“शब्द पड़ने लगे छोटे
दर्द बढ़ने लगा
कहे भी थे जो कभी सब हो गए अनकहे”
छठे दशक में हिन्दी कविता में जो ताज़गी और सम्पन्नता आई थी, वह आज भले ही इधर-उधर छितरा गई दिखती हो, पर सर्वेश्वर के काव्य में आज भी सही-सलामत मौजूद है। इंसान के गहरे दु:खों में सामयिक दृश्यों का अर्थ व्यक्त करनेवाली वही सहजता उनकी कविता में अन्त तक मिलती है जो पहले कविता-संग्रह ‘काठ की घंटियाँ’ के प्रकाशन ने उनके नाम के साथ जोड़ी थी। राजनीति की अमानवीयता और मानव सम्बन्धों के विशृंखलन का त्रास सर्वेश्वर ने समाज के दबे हुए वर्गों, युद्ध में खेत रहे समाजों और प्राकृतिक कोप में असहाय मरते लोगों के बीच महसूस और अभिव्यक्त किया है। यह संग्रह सर्वेश्वर की काव्य-यात्रा में किसी मोड़ का सूचक नहीं, केवल उन अन्तर्धाराओं के पहले से अधिक अधीर और मुखर हो उठने का सूचक है जिन्हें पाठक तथा समीक्षक उनकी कविता में बराबर पाते रहे हैं। ‘कुआनो नदी’ माला की तीन कविताओं के माध्यम से सर्वेश्वर ने एक ऐसा गहन प्रतीक हिन्दी कविता को दिया है, जिसका अर्थवृत्त समय के साथ फैलता रहा है।
Kuano Nadi
Sarveshwardayal Saxena
Khoontiyon Per Tange Log
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description:
‘खूँटियों पर टँगे लोग’ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का सातवाँ काव्य-संग्रह है, जिसमें शामिल अधिकतर कविताएँ 1976-1981 के बीच लिखी गई थीं। इन कविताओं में नियति और स्थिति को स्वीकार कर लेने की व्यापक पीड़ा है। यह पीड़ा कवि के आत्म से शुरू होकर समाज तक जाती है और फिर समाज से कवि के आत्म तक आती है और इस तरह कवि और समाज को पृथक् न कर, एक करती हुई उसके काव्य-व्यक्तित्व को विराट कर जाती है।
सम्प्रेषण की सहजता सर्वेश्वर की कविताओं का मुख्य गुण रहा है और इसकी कलात्मक साध इस संग्रह में और निखरी है। एक समर्थ कवि के स्पर्श से चीज़ें वह नहीं रह जातीं जो हैं—कोट, दस्ताने, स्वेटर सब-के-सब युग की चुनौतियों से टकराकर क्रान्ति, विद्रोह और विरोध से जुड़ जाते हैं। प्रतीकों और बिम्बों का ऐसा सहज इस्तेमाल दुर्लभ है। सर्वेश्वर का काव्य-संसार बहुत व्यापक है। इतना व्यापक संवेदन-क्षेत्र वह रचते हैं कि उनके एक कवि में अनेक कवि देखे जा सकते हैं और सभी सर्वेश्वर हैं। उनकी काव्य-भाषा लोक से आकर इस तरह सम्भ्रान्त भाषा में मिल जाती है कि एक का खुरदरापन और दूसरे का चिकनापन अलग-अलग पहचान पाना कठिन हो जाता है।
वस्तुतः ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ की कविताएँ सर्वेश्वर की काव्य-भाषा को और आगे बढ़ाती हैं तथा समकालीन हिन्दी काव्य को भी, जिसका चरित्र मूल्यों के अभाव और व्यवस्था के दबाव में तेज़ी से बदल रहा है। यह बदलाव, बिना किसी अतिरिक्त आग्रह के, सर्वेश्वर के इस संग्रह में आसानी से देखा जा सकता है।
Khoontiyon Per Tange Log
Sarveshwardayal Saxena
Nepali Kavitayen
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description:
नेपाली साहित्य या भाषा की प्राचीनतम रचना चौदहवीं शती का एक ताम्रपत्र माना जाता है। लेकिन मल्लकाल के अन्त के साथ ही नेपाली में साहित्य सर्जना होने लगी। सुवानन्द दास की पहली कविता, जिसमें पृथ्वीनारायण शाह (प्रथम नेपाल नरेश) की विजय-यात्रा इत्यादि का वर्णन है, नेपाली साहित्य की प्रथम कविता है। लेकिन नेपाली साहित्य की वास्तविक शुरुआत भानुभक्त आचार्य और उनके महाकाव्य ‘नेपाली रामायण’ से माननी चाहिए, जिसे भानुभक्त आचार्य ने जेल के अन्दर लिखा था।
इस काल को हम नेपाली मानस के निराशा-युग, पराजय-काल के रूप में ले सकते हैं। अंग्रेज़ों के साथ अपमानजनक सुगौली सन्धि (1816) के समय अनेक दरबारी षड्यंत्रों की बीभत्सता चरम रूप में थी। सत्ता के लिए हर कोई दूसरे की लाश पर खड़े रहने को तत्पर था। नेपाली इतिहास के लहूलुहान पन्ने इन्हीं दिनों लिखे गए। भानुभक्त की ‘रामायण’ इसी भक्तिकाल (1853) की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है।
सत्ता और शास्त्रीयता के विरुद्ध भयंकर युद्ध के नायक गोपालप्रसाद रिमाल प्रथम कवि हैं जिनका प्रभाव आज तक बरकरार है। 1940 में ही महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा भी स्वतंत्रता युद्ध में कूद गए। रिमाल और देवकोटा दो ऐसे अद्वितीय कवि हैं, वे अब हमारे मध्य नहीं रहे, जिन्होंने नेपाल को नई जागृति दी। 1950 में नेपाल में प्रजातंत्र की स्थापना हुई। 1950-60 के दशक को हम नेपाली साहित्य का अभूतपूर्व दशक कह सकते हैं।
इस संग्रह में 1961 के बाद के कवियों को ही प्रस्तुत किया गया है—अपवाद के रूप में सर्वश्री गोपालप्रसाद रिमाल, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा और मोहन कोइराला हैं।
संग्रह के कवियों में दुरूहतावादी और ‘कला कला के लिए’ माननेवाले और अपने को प्रगतिशील कहनेवाले किसी वाद के समर्थक कवियों को शामिल नहीं किया गया है।
नेपाली कविता में साठ के दशक के बाद जो पीढ़ी उभरी है, वह साहित्य को आदमी की व्यथा, वेदना, विसंगति, कटुता और जीवन के घिनौने यथार्थ को प्रकट करने का माध्यम स्वीकारती है और उसे आम आदमी तक ले जाना चाहती है। ऐसे सभी कवियों को इस संग्रह में शामिल करने का प्रयास किया गया है जो सौ साल बाद के पाठक के लिए नहीं लिखते बल्कि आज के पाठकों के सामने आज की संवेदना को लेकर जाना चाहते हैं।
Nepali Kavitayen
Sarveshwardayal Saxena
Jungle Ka Dard
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

- Description: ‘जंगल का दर्द’ में कवि सर्वेश्वर की अपने अन्तर्जगत और बाह्य-जगत के जानवरों से लड़ाई, समसामयिक हिन्दी कविता की उपलब्धि है। ‘कुआनो नदी’ की कविताएँ डूबते सूरज की लम्बी परछाइयाँ थीं। अब ‘जंगल का दर्द’ में अंधकार सिमटकर बुलेट–सा छोटा, ठोस और भारी हो गया है। काव्य–विन्यास में इस परिवर्तन को कवि की यातना और दृष्टि से जोड़कर ही समझा जा सकता है। भेड़िए, कुत्ते, तेन्दुए, चिड़ियाँ, तितलियाँ, इस जंगल में सबसे उसका सामना होता है, उनसे वह जूझता है, बचता है, सीखता है और मानव नियति की राह टटोलता, झाड़ियों की रगड़ से अपनी देह का संगीत सुनता, ख़ुद को उधेड़ता–बुनता आगे बढ़ता जाता है। यह यात्रा जारी है, और हिन्दी कविता की भावी यात्रा के प्रति आश्वस्त करती है। यह काव्य–संग्रह ढहते मूल्यों के बीच खड़े रहने की सामर्थ्य देता है और यह स्पष्ट करता है कि कविता का मुख्य प्रयोजन सौन्दर्य–बोध के विस्तार के साथ–साथ मानव–आत्मा को निर्भीक करना और उसे कर्म से जोड़ना है।
Jungle Ka Dard
Sarveshwardayal Saxena
Pratinidhi Kavitayen : Sarveshwar Dayal Saxena
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
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Book Type:

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समकालीन हिन्दी कविता की व्यापक जनवादी चेतना और प्रगतिशील जीवन-मूल्यों के सन्दर्भ में सर्वेश्वर एक ऐसे कवि के रूप में सुपरिचित हैं जिनकी रचनाएँ पाठकों से बराबर धड़कता हुआ रिश्ता बनाए हुए हैं। उनकी कविताएँ ‘नई कविता’ की ऊहा और आत्मग्रस्तता से बड़ी हद तक मुक्त रही हैं। इस संग्रह में उनके समूचे काव्य-कृतित्व से महत्त्वपूर्ण कविताएँ संकलित की गई हैं।
ज़िन्दगी के बड़े सरोकारों से जुड़ी उनकी कविताएँ उन शक्तियों का विरोध करती हैं जो उसे किसी भी स्तर पर कुरूप करने के लिए ज़िम्मेदार हैं। वे घेरों के बाहर के कवि हैं। उनकी कविताओं में हिन्दी कविता का लोकोन्मुख जातीय संस्कार घनीभूत रूप में मौजूद है और उन्हें न तो राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों से काटकर देखा जा सकता है और न कवि के अपने आत्मसंघर्ष को नकारकर। वस्तुत: दु:ख और गहन मानवीय करुणा से प्रेरित संघर्षशीलता, उदात्त सौन्दर्यबोध, मधुर भावनाओं के सन्धि संस्पर्श और ‘फ़ार्म’ की छन्दाछन्द विभिन्न मुद्राएँ इन कविताओं को व्यापक अर्थ में मूल्यवान बनाती हैं।