Parag Singhania
पराग ने साल 2010 में जिस छोटे से बिंदी ब्रांड के साथ अपना व्यावसायिक सफर शुरू किया था, वह आज एक जाना-पहचाना नाम बन चुका है। बिंदियों की दुनिया में पहचान बना चुके पराग अब कहानियों की दुनिया में भी अपने रंग बिखेर रहे हैं। ज़मीनी अनुभव और अद्भुत कल्पनाशक्ति ने उन्हें एक सहज, लेकिन बेहद प्रभावशाली कथाकार बना दिया है। वे कई प्रतिष्ठित लेखन कार्यशालाओं का हिस्सा रह चुके हैं, और साहित्य के प्रति उनका गहरा लगाव उनके लेखन में स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। यह उनकी दूसरी किताब है। उनकी पहली “प्रेम में नहीं रहेंगे तो कहाँ रहेंगे!” थी। वे एक स्नेही पति और समर्पित पिता हैं, लेकिन उनके भीतर का घुमक्कड़ अब भी जीवित है, जो हर नई जगह, हर अनसुने किस्से में कुछ नया खोजने को बेताब रहता है। आर्मी कैंटीन से बमुश्किल जुगाड़ से लायी हुई अधठंडी बियर। ब्रांडेड बियर की एक-एक चूँट का सुख, वो भी मणिपुर जैसे ड्राई स्टेट में। जब तीनों ले रहे थे, तब उस दिन शायद ही उन्हें अंदाज़ा होगा कि उनका जीवन आने वाले कुछ दिनों के लिए मणिपुर और बर्मा के जंगलों में भयानक मच्छर, चींटियों, जानवरों और इंसानों के बीच कटने वाला है। सबकी खोपड़ी बंदूक की नोक पर ऐसे लगी थी कि बस एक गड़बड़ और सबका खेल खत्म। पैर पर मोटी लाल चींटी चढ़ रही थी, पर झुक कर पैर तक खुजा लेना मतलब खोपड़ी खुल जाने का डर। ऐसे में अभय ने अनिल के साथ पिछले साल हुई अपनी पहली फ़ोन कॉल को याद किया— “मणिपुर में माहौल कैसा है आजकल?” अनिल ने उस दिन तो हँसते हुए जवाब दिया था, पता नहीं वो हँसी आज घने जंगलों में कहाँ लापता है— “माहौल को क्या होना है, वो तो बिल्कुल बढ़िया है सर। आप आइये तो सही एक बार, बढ़िया से घुमाते हैं आपको पूरा मणिपुर।” तीसरा व्यक्ति इमरान तो बेचारा बस मेहमाननवाज़ी में इन दोनों के बीच फँस गया था। वो भी क्या करता, उसके शरीर के अंदर इंसान की आत्मा जो बसी थी। तो चलिए अनिल के साथ शुरू करते हैं मणिपुर के इस सफर को, जो कि अब शायद स्टॉकहोम सिंड्रोम से थोड़ा-थोड़ा पीड़ित है...
Parag Singhania
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About Parag Singhania
ज़मीनी अनुभव और अद्भुत कल्पनाशक्ति ने उन्हें एक सहज, लेकिन बेहद प्रभावशाली कथाकार बना दिया है। वे कई प्रतिष्ठित लेखन कार्यशालाओं का हिस्सा रह चुके हैं, और साहित्य के प्रति उनका गहरा लगाव उनके लेखन में स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। यह उनकी दूसरी किताब है। उनकी पहली “प्रेम में नहीं रहेंगे तो कहाँ रहेंगे!” थी।
वे एक स्नेही पति और समर्पित पिता हैं, लेकिन उनके भीतर का घुमक्कड़ अब भी जीवित है, जो हर नई जगह, हर अनसुने किस्से में कुछ नया खोजने को बेताब रहता है।
आर्मी कैंटीन से बमुश्किल जुगाड़ से लायी हुई अधठंडी बियर। ब्रांडेड बियर की एक-एक चूँट का सुख, वो भी मणिपुर जैसे ड्राई स्टेट में। जब तीनों ले रहे थे, तब उस दिन शायद ही उन्हें अंदाज़ा होगा कि उनका जीवन आने वाले कुछ दिनों के लिए मणिपुर और बर्मा के जंगलों में भयानक मच्छर, चींटियों, जानवरों और इंसानों के बीच कटने वाला है।
सबकी खोपड़ी बंदूक की नोक पर ऐसे लगी थी कि बस एक गड़बड़ और सबका खेल खत्म। पैर पर मोटी लाल चींटी चढ़ रही थी, पर झुक कर पैर तक खुजा लेना मतलब खोपड़ी खुल जाने का डर। ऐसे में अभय ने अनिल के साथ पिछले साल हुई अपनी पहली फ़ोन कॉल को याद किया—
“मणिपुर में माहौल कैसा है आजकल?”
अनिल ने उस दिन तो हँसते हुए जवाब दिया था, पता नहीं वो हँसी आज घने जंगलों में कहाँ लापता है—
“माहौल को क्या होना है, वो तो बिल्कुल बढ़िया है सर। आप आइये तो सही एक बार, बढ़िया से घुमाते हैं आपको पूरा मणिपुर।”
तीसरा व्यक्ति इमरान तो बेचारा बस मेहमाननवाज़ी में इन दोनों के बीच फँस गया था। वो भी क्या करता, उसके शरीर के अंदर इंसान की आत्मा जो बसी थी।
तो चलिए अनिल के साथ शुरू करते हैं मणिपुर के इस सफर को, जो कि अब शायद स्टॉकहोम सिंड्रोम से थोड़ा-थोड़ा पीड़ित है...