Mohammad Kazim

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दिल्ली यूनिवर्सिटी के शोब-ए-उर्दू में दरसो-तदरीस से वाबस्ता हैं। 2001 में उनकी किताब ‘मशरिकी हिन्द में नुक्कड़ नाटक’ शाया हुई। उनका ख़ास मैदान ड्रामा और उसकी तनक़ीद है। उनकी शा-ए-शुदा किताबों में ‘हिन्दुस्तानी नुक्कड़ नाटक और उसकी समाजी मानवीयत’, ‘बंगाल में उर्दू नुक्कड़ नाटक’, ‘मुज्तबा हुसैन : फ़न और शख़्सियत’, ‘योगराज की कहानियाँ’, ‘नसर गज़ाली : फ़न और शख़्सियत’, हेनरिक इब्सन के तीन ड्रामे, ‘इशारिया’ उर्दू साइंस मंथली अहम हैं। हिन्दुस्तान की मुख़्तलिफ़ रियासतों से शाया होनेवाली तीस से ज़्यादा किताबों में उनके मज़ामीन शामिल हैं। पचास से ज़्यादा मज़ामीन मुख़्तलिफ़ मोक़ामात से निकलनेवाले रेसायल व जरायद में शाया हो चुके हैं। साठ से ज़्यादा नेशनल और इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंसों में शिरकत कर चुके हैं। हुकूमत मारीशस की उर्दू स्पीकिंग यूनियन की दावत पर मारीशस में उर्दू ड्रामे के फ़रोग़ के लिए दस दिन का वर्कशाप किया जिसमें स्क्रिप्ट राइटिंग और अदाकारी के फ़न की बारीकियों पर गुफ़्तगू के साथ-साथ उसकी मश्क भी कराई। उनकी हिदायत में तैयार किए गए ड्रामे मुल्क के मुख़्तलिफ़ फ़ेस्टिवल बशमुल दिल्ली उर्दू अकादमी और साहित्य कला परिषद में एक से ज़्यादा बार शरीक हो चुके हैं। उनकी तहक़ीक़ी, तनक़ीदी और थियेटर की ख़िदमात का एतराफ़ करते हुए उन्हें दिल्ली उर्दू अकादमी, मग़रिबी बंगाल उर्दू अकादमी, राजस्थान उर्दू अकादमी, बिहार उर्दू अकादमी, और ग़ालिब इंस्टीट्यूट ने ईनामो-व-इकराम से नवाज़ा है।

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