Gulzar Ke Geet
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गुलज़ार ने हिन्दी फ़िल्मों में गीतों की एक अलग रवायत शुरू की जो आज तक सिर्फ़ उन्हीं की है। कोई और गीतकार न उसकी नक़ल कर पाया, और न उसे कोई और शक्ल दे सका। गुलज़ार पर जो शुरू होता है, वह गुलज़ार पर ही ख़त्म होता है। ‘गुलज़ार के गीत’ में उनके वे गीत शामिल हैं जो दशकों से गाए-बजाए जाते रहे हैं और जितने लोकप्रिय वे तब थे, उतने ही आज भी हैं। ‘मोरा गोरा अंग लई ले’, ‘रोज़ अकेली आए’, ‘हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुश्बू’ और इन जैसे अनेक गीत हैं जो फ़िल्मों से निकलकर हमारे भाव-जगत का अभिन्न हिस्सा हो गए। संकलन में शामिल गीतों को उनकी प्रकृति के अनुसार दो भागों में प्रस्तुत किया गया है—एक, ‘भाव-गीत’ और दूसरा, ‘रंगारंग’। दूसरे हिस्से में वे गीत हैं जो अपने खिलंदड़पने में भी ज़िन्दगी और दुनियादारी के बारे में गहरी फ़लसफ़ियाना बातें करते हैं, और शायरी को भी एक नई सूरत बख़्शते हैं। गीतों के साथ यहाँ पाठक भूषण बनमाली द्वारा लिखा गया गुलज़ार के बारे में एक आलेख और स्वयं गुलज़ार द्वारा लिखा गया एक दिलचस्प लेख ‘एक गीत का जन्म’ भी पाएँगे। इस लेख में ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ गीत की कहानी बयान की गई है।
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गुलज़ार ने हिन्दी फ़िल्मों में गीतों की एक अलग रवायत शुरू की जो आज तक सिर्फ़ उन्हीं की है। कोई और गीतकार न उसकी नक़ल कर पाया, और न उसे कोई और शक्ल दे सका। गुलज़ार पर जो शुरू होता है, वह गुलज़ार पर ही ख़त्म होता है।
‘गुलज़ार के गीत’ में उनके वे गीत शामिल हैं जो दशकों से गाए-बजाए जाते रहे हैं और जितने लोकप्रिय वे तब थे, उतने ही आज भी हैं। ‘मोरा गोरा अंग लई ले’, ‘रोज़ अकेली आए’, ‘हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुश्बू’ और इन जैसे अनेक गीत हैं जो फ़िल्मों से निकलकर हमारे भाव-जगत का अभिन्न हिस्सा हो गए।
संकलन में शामिल गीतों को उनकी प्रकृति के अनुसार दो भागों में प्रस्तुत किया गया है—एक, ‘भाव-गीत’ और दूसरा, ‘रंगारंग’। दूसरे हिस्से में वे गीत हैं जो अपने खिलंदड़पने में भी ज़िन्दगी और दुनियादारी के बारे में गहरी फ़लसफ़ियाना बातें करते हैं, और शायरी को भी एक नई सूरत बख़्शते हैं।
गीतों के साथ यहाँ पाठक भूषण बनमाली द्वारा लिखा गया गुलज़ार के बारे में एक आलेख और स्वयं गुलज़ार द्वारा लिखा गया एक दिलचस्प लेख ‘एक गीत का जन्म’ भी पाएँगे। इस लेख में ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ गीत की कहानी बयान की गई है।
Book Details
-
ISBN9789348157898
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फ़ार्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इज़ाफ़ा हो गया है।
अथाह प्रेम, प्रेम के गहरे सम्मान और शुद्ध-सुच्चे भारतीय मूल्यों में रसी-पगी गुलज़ार की इस फ़िल्म को न देखा हो ऐसे बहुत कम लोग होंगे। लेकिन मंज़रनामे की शक्ल में इसे पढ़ना बिलकुल भिन्न अनुभव है। इतने कसाव और कौशल के साथ लिखी हुई पटकथाएँ निश्चित रूप से सिद्ध करती हैं कि मंज़रनामा एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा है। बार-बार देखने लायक़ फ़िल्म की बार-बार पठनीय पुस्तकीय प्रस्तुति!
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मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फ़ार्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इज़ाफ़ा हो गया है।
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