Rupam Mishra

Rupam Mishra

2 Books

Hansi Aur Des

  • Author Name:

    Rupam Mishra

  • Book Type:
  • Description: रूपम मिश्र की कविताओं की ‘आत्मा का आयतन’ बड़ा है। इन कविताओं में समाज और राजनीति के फासीवादी दौर में संवेदनशील लोगों के भीषण अन्तर्द्वंद्व अंकित हुए हैं। यहाँ ‘न्याय के लिए तड़पता मन’ है तो अपनापन खोजते थकता-हारता मन भी है और उसी क्षण भाग जाने का भी एक मन है। यहाँ गाँव-क़स्बे में सदियों से गंगा-जमुनी तहज़ीब का देशज मर्सिया है, मुसलमान जोगियों के डर ने उनके बिरहों और निर्गुण सारंगी को ख़ामोश किया है, वही ख़ामोशी इन कविताओं में गूँज उठी है। ‘हँसी और देस’ में जैसे कोई बड़ी ठेठ ज़िद्दी निगाहों से सूचना-संचार के मायाजाल और नफ़रत की बाज़ारू सियासत को बेध रहा है। यहाँ कितनी ही कहानियाँ हैं—बहुत सी तो ऐसी जो बिसरा दिए जाने की कगार पर हैं, लेकिन आदमीपने के अकाल में लड़ते हुए मनुष्यों के जीते रहने की तमन्ना भी है। लोक-रहन, माटी-पानी और हरियाली को मिटते देखना त्रासद है, इस त्रासदी में प्रेम मानो एक आपद्धर्म है, उनके पूरी तरह मिट जाने से पहले ही मिलन की चाह है क्योंकि उनसे विरहित दुनिया में प्रेम का कोई परिवेश न होगा। भले ही ‘नैतिकता की रंगदारी वसूलते लफुए’ हर कहीं दिखते हों लेकिन असम्भव समझ लिए गए प्रतिरोध की छवियाँ जो अभी भी वास्तव हैं, (बस हमने नज़रें फेर ली हैं), उन्हें इस संग्रह की कविताएँ आँख में उँगली डालकर दिखाती हैं। इन कविताओं में हिन्दी का बहुभाषिक वैभव चमकता है। यहाँ अवध के गँवई मुहावरों और शब्दों का भाषिक छिड़काव नहीं, बल्कि अनुभव और सोच की मातृभाषा का आत्मविश्वास है। रूपम की काव्यभाषा जनता की जनवादी राजनीति के संक्रामक हो उठने के क्षण में उससे गलबहियाँ को आतुर है। —प्रणय कृष्ण
Hansi Aur Des

Hansi Aur Des

Rupam Mishra

250

₹ 200

Ek Jeevan Alag Se

  • Author Name:

    Rupam Mishra

  • Book Type:
  • Description: रूपम मिश्र की कविता का वैशिष्ट्य यह है कि वह किसी और की तरह नहीं लिखतीं। हम सभी जानते हैं कि साधारण-सी लगने वाली इस बात की क्या असाधारणता है। कहन की यह मौलिकता उन्हें अपनी अन्तर्वस्तु से मिलती हैं जिसका उत्स वह जनक्षेत्र है जिसके वृत्तान्त उनकी कविता का रूप-रंग तय करते हैं। रूपम अवध के पुरुषवाची लैंडस्केप में औरतों के दुखों और दुविधाओं और द्वन्द्व को मरोड़, उत्ताप और विकलता से कहती तो हैं लेकिन इस कहन में विडम्बना अनुपस्थित नहीं होती। इस तरह वह स्त्री के सन्ताप और उसके संकट का भाववाद नहीं निर्मित करतीं और वजह भी यही होगी कि वह न तो राज्य को बख्शती हैं और न प्रतिगामी मूल्यों को बनाए रखने वाले सामाजिक ढाँचे को, जो सामन्ती सोच-समझ का प्रतिफलन, विस्तार और विद्रूप है। वह उन बहुत कम स्त्री कवियों में हैं जिन्होंने नारी स्वातंत्र्य के बुनियादी प्रत्ययों पर कायम रहते हुए उसकी मुक्ति को भारतीय नागरिकता की बृहत्तर मुक्ति के कार्यभार से अलगाकर नहीं देखा। हिन्दी कविता की समकालीनता में वह लगभग अकेली हैं जो अपनी कविता में अपने इलाके के मनुष्य और मनुष्यता ही नहीं उस भूभाग के सांस्कृतिक पराभव के वर्णन के लिए इलाकाई जबान का बहुत नैसर्गिक और निहितार्थवान उपयोग करती हैं। उनकी कविता को पढ़ना अवध की स्त्रियों की कितनी ही कथाओं और आत्मकथाओं में गूँजते कैद और स्वातंत्र्य, कायरता और प्रतिकार, गलित और नैतिक, परम्परित और अग्रगामी, जड़ीभूत और गतिशील की द्वन्द्वात्मक स्थितियों में पैदा होते सवालों से आप्लावित, विचलित और उत्प्रेरित होना है जहाँ पुरुष वर्चस्व और स्त्री मुखरता का परिपार्श्व अलक्षित नहीं रह पाता। विषम अवस्थितियों में लिखी जाती रूपम मिश्र की कविता और बेहद प्रतिकूल हालात में निर्मित होता और नित निखरता उनका काव्य व्यक्तित्व किसी दन्तकथा से कम नहीं।    —देवी प्रसाद मिश्र
Ek Jeevan Alag Se

Ek Jeevan Alag Se

Rupam Mishra

199

₹ 159.2

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