Rakesh Ranjan
Mendhak Bola
- Author Name:
Rakesh Ranjan +1
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Book Type:

- Description: मेंढक बोला अभी अभी पढ़ना सीख रहे या पढ़ना सीखने जाने वाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी किताब हो सकती है। इसमें हर बार टीचर एक सवाल पूछते हैं और मेंढक हर बार उनका जवाब देता है। मसलन, टीचर बोले नाम बताओ मेंढक बोला टर टर टर दो तीन पंक्तियों में ही बच्चे को इस कविता का स्ट्रक्चर समझ में आ जाता है। आप उनसे सवाल पूछेंगे और वे उत्तर दे देंगे। एक बहुत सरल सी दिखने वाली कविता है यह। बच्चों का भाषा की तरफ आने के लिए ज़रूरी सेंस ऑफ एचीवमेंट महसूस करने वाली। ये वे कविताएँ हैं जो बच्चे अनेकानेक बार पढ़ना चाहते हैं। बार बार पढ़ने का सुख उठाने के लिए। इसके चित्र भी इस कविता को समझने और इस कविता का परिवेश समझने में मददगार साबित होते हैं। इस कविता की पृष्ठभूमि भी बताते हैं। और इस कविता का अन्त भी बताते हैं। एक मायने में वे इस पूरी कविता में शरारत भर देते हैं। तो कविता का एक स्तर तो यह है। एक इस कविता का भीतरी संसार है। जो पाठक को फिलहाल न खुले मगर उसके जेहन में कहीं न कहीं इसकी छाया बनी रहेगी। वह यह कि टीचर इस कविता में मेंढक को समझ नहीं पा रहे हैं। मेंढक हर बार जवाब दे रहा है। उसकी अपनी टर टर भाषा में। वह जो कहेगा टर टर ही करेगा। शिक्षक इस बात से बेखबर हैं। यह स्कूलों में आम है। कुछ बच्चे हमेशा शिक्षक से यह उन्हें समझने की ख्वाहिश लिए ही स्कूल से विदा हो जाते हैं। मेंढक इन सब बच्चों का प्रतिनिधि बनकर इस कविता में आता है। राजीव आइप के चित्र इस कविता को विस्तार देते हैं। गवाही देते हैं। इस कविता की कचोट को कुछ हलका करते हैं। इस कविता को क्लासरूम में या घर पर कई कई पंक्तियों को जोड़कर विस्तारित किया जा सकता है। मेंढक की जगह घोड़ा बोला हिन हिन हिन भी किया जा सकता है। Age group 0-6 years and Age group 6-8 years
Mendhak Bola
Rakesh Ranjan
Divya Kaidkhane Mein
- Author Name:
Rakesh Ranjan
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Book Type:

- Description:
पिछले लगभग एक दशक से राकेश रंजन की कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। इधर जो युवा हस्ताक्षर उभरकर आए हैं, उनमें वे कई दृष्टियों से मुझे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लगते रहे हैं। उनके पिछले दो संग्रहों की कविताएँ भी मैंने चाव से पढ़ी थीं और अब यह संग्रह 'दिव्य क़ैदख़ाने में' सामने है। सबसे पहले तो इस शीर्षक ने ही मेरा ध्यान आकर्षित किया, जिसमें एक गहरी व्यंजना छिपी हुई है और आज की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इसकी व्यंजकता और बढ़ जाती है।
राकेश रंजन में कुछ बातें ऐसी हैं, जो उन्हें अपनी पीढ़ी से एकदम पृथक् व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस कवि ने हिन्दी कविता की परम्परा के सकारात्मक तत्त्वों को एक गहरे काव्य-विवेक के साथ न केवल आत्मसात् किया है, बल्कि उसे एक नया आयाम देने का भी प्रयास किया है। इस संग्रह के पाठकों से यह बात अलक्षित नहीं रह जाएगी कि इस कवि का मुख्य स्वर व्यंग्य और विडम्बना से भरा है और शायद यह इस गड्डमड्ड समय को व्यक्त करने का सबसे भरोसेमन्द हथियार भी है। इस ज़मीन पर राकेश रंजन अकेले खड़े हैं और मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर वे नागार्जुन की परम्परा के अन्यतम उत्तराधिकारी कहे जा सकते हैं। उन्हीं की भाँति इस कवि ने छन्द और बेछन्द दोनों का पूरी सामर्थ्य के साथ इस्तेमाल किया है। इस संग्रह में मुझे यह देखकर विशेष रूप से प्रसन्नता हुई कि इस युवा कवि ने शायद पहली बार कवित्त-जैसे लगभग छोड़ दिए गए छन्द को एक नई भंगिमा के साथ अपनी कविता में अवतरित किया है। एक और अन्य वैशिष्ट्य भी अलग से रेखांकित किया जा सकता है कि राकेश रंजन गहरे अर्थ में एक राजनीतिक-चेतना-सम्पन्न कवि हैं और यहाँ भी वे नागार्जुन की परम्परा के ही वाहक दिखाई पड़ते हैं।
मुझे विश्वास है कि 'दिव्य क़ैदख़ाने में' की कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता के पाठक को एक नई काव्यात्मक उत्तेजना प्रदान करेंगी और किसी हद तक आज की कविता को एक नई दिशा की ओर ले जाती हुई प्रतीत होंगी।
—केदारनाथ सिंह
Divya Kaidkhane Mein
Rakesh Ranjan
Christopher Columbus
- Author Name:
Rakesh Ranjan
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- Description: क्रिस्टोफर कोलंबस का जन्म सन् 1449 में जेनोआ (इटली) में हुआ था। उसके पिता एक जहाजी थे, इसलिए बचपन से ही वह समुद्र एवं जलपोतों से लगाव रखता था। इन सबके चलते भूगोल व मानचित्रों के प्रति उसकी जिज्ञासा अत्यंत तीव्र हो गई थी। कोलंबस ने पृथ्वी के नक्शे पर एशिया की स्थिति का जो अनुमान लगाया था, वह गलत निकला और वह समुद्री यात्रा के द्वारा एशिया के बजाय अमेरिका पहुँच गया। इस यात्रा के दौरान किसी को यह जानकारी नहीं थी। इसी कारण एशियाई मार्ग की खोज का श्रेय कोलंबस के बजाय वास्को डि गामा को मिला। वास्को डि गामा कोलंबस की अमेरिका यात्रा के 6 वर्ष बाद सन् 1498 में अफ्रीका का चक्कर लगाता हुआ दक्षिण भारत के कोचीन बंदरगाह पर पहुँचा था। 14 वर्षों तक कोलंबस पुर्तगाल की राजधानी में रहा, लेकिन वहाँ के शासकों ने उसके साथ धोखा किया और उसको शहर से बाहर न जाने का आदेश दिया। परंतु कोलंबस अपने पुत्र डिएगो के साथ वहाँ से निकल भागा। 12 अक्तूबर, 1492 को कोलंबस ने एक नए द्वीप को खोज निकाला। इस स्थल को कोलंबस ने ‘इंडिया’ नाम दिया, जो आज संयुक्त राज्य अमेरिका के 48 राज्यों में से एक ‘इंडियाना’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस पुस्तक में कोलंबस के जीवन और उसके साहसिक समुद्री अभियानों का वर्णन, जो सुधी पाठकों को जानकारीपरक एवं रुचिकर लगेगा।