Divya Kaidkhane Mein
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पिछले लगभग एक दशक से राकेश रंजन की कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। इधर जो युवा हस्ताक्षर उभरकर आए हैं, उनमें वे कई दृष्टियों से मुझे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लगते रहे हैं। उनके पिछले दो संग्रहों की कविताएँ भी मैंने चाव से पढ़ी थीं और अब यह संग्रह 'दिव्य क़ैदख़ाने में' सामने है। सबसे पहले तो इस शीर्षक ने ही मेरा ध्यान आकर्षित किया, जिसमें एक गहरी व्यंजना छिपी हुई है और आज की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इसकी व्यंजकता और बढ़ जाती है।</p> <p>राकेश रंजन में कुछ बातें ऐसी हैं, जो उन्हें अपनी पीढ़ी से एकदम पृथक् व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस कवि ने हिन्दी कविता की परम्परा के सकारात्मक तत्त्वों को एक गहरे काव्य-विवेक के साथ न केवल आत्मसात् किया है, बल्कि उसे एक नया आयाम देने का भी प्रयास किया है। इस संग्रह के पाठकों से यह बात अलक्षित नहीं रह जाएगी कि इस कवि का मुख्य स्वर व्यंग्य और विडम्बना से भरा है और शायद यह इस गड्डमड्ड समय को व्यक्त करने का सबसे भरोसेमन्द हथियार भी है। इस ज़मीन पर राकेश रंजन अकेले खड़े हैं और मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर वे नागार्जुन की परम्परा के अन्यतम उत्तराधिकारी कहे जा सकते हैं। उन्हीं की भाँति इस कवि ने छन्द और बेछन्द दोनों का पूरी सामर्थ्य के साथ इस्तेमाल किया है। इस संग्रह में मुझे यह देखकर विशेष रूप से प्रसन्नता हुई कि इस युवा कवि ने शायद पहली बार कवित्त-जैसे लगभग छोड़ दिए गए छन्द को एक नई भंगिमा के साथ अपनी कविता में अवतरित किया है। एक और अन्य वैशिष्ट्य भी अलग से रेखांकित किया जा सकता है कि राकेश रंजन गहरे अर्थ में एक राजनीतिक-चेतना-सम्पन्न कवि हैं और यहाँ भी वे नागार्जुन की परम्परा के ही वाहक दिखाई पड़ते हैं।</p> <p>मुझे विश्वास है कि 'दिव्य क़ैदख़ाने में' की कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता के पाठक को एक नई काव्यात्मक उत्तेजना प्रदान करेंगी और किसी हद तक आज की कविता को एक नई दिशा की ओर ले जाती हुई प्रतीत होंगी।</p> <p>—केदारनाथ सिंह
Read moreAbout the Book
पिछले लगभग एक दशक से राकेश रंजन की कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। इधर जो युवा हस्ताक्षर उभरकर आए हैं, उनमें वे कई दृष्टियों से मुझे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लगते रहे हैं। उनके पिछले दो संग्रहों की कविताएँ भी मैंने चाव से पढ़ी थीं और अब यह संग्रह 'दिव्य क़ैदख़ाने में' सामने है। सबसे पहले तो इस शीर्षक ने ही मेरा ध्यान आकर्षित किया, जिसमें एक गहरी व्यंजना छिपी हुई है और आज की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इसकी व्यंजकता और बढ़ जाती है।</p>
<p>राकेश रंजन में कुछ बातें ऐसी हैं, जो उन्हें अपनी पीढ़ी से एकदम पृथक् व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस कवि ने हिन्दी कविता की परम्परा के सकारात्मक तत्त्वों को एक गहरे काव्य-विवेक के साथ न केवल आत्मसात् किया है, बल्कि उसे एक नया आयाम देने का भी प्रयास किया है। इस संग्रह के पाठकों से यह बात अलक्षित नहीं रह जाएगी कि इस कवि का मुख्य स्वर व्यंग्य और विडम्बना से भरा है और शायद यह इस गड्डमड्ड समय को व्यक्त करने का सबसे भरोसेमन्द हथियार भी है। इस ज़मीन पर राकेश रंजन अकेले खड़े हैं और मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर वे नागार्जुन की परम्परा के अन्यतम उत्तराधिकारी कहे जा सकते हैं। उन्हीं की भाँति इस कवि ने छन्द और बेछन्द दोनों का पूरी सामर्थ्य के साथ इस्तेमाल किया है। इस संग्रह में मुझे यह देखकर विशेष रूप से प्रसन्नता हुई कि इस युवा कवि ने शायद पहली बार कवित्त-जैसे लगभग छोड़ दिए गए छन्द को एक नई भंगिमा के साथ अपनी कविता में अवतरित किया है। एक और अन्य वैशिष्ट्य भी अलग से रेखांकित किया जा सकता है कि राकेश रंजन गहरे अर्थ में एक राजनीतिक-चेतना-सम्पन्न कवि हैं और यहाँ भी वे नागार्जुन की परम्परा के ही वाहक दिखाई पड़ते हैं।</p>
<p>मुझे विश्वास है कि 'दिव्य क़ैदख़ाने में' की कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता के पाठक को एक नई काव्यात्मक उत्तेजना प्रदान करेंगी और किसी हद तक आज की कविता को एक नई दिशा की ओर ले जाती हुई प्रतीत होंगी।</p>
<p>—केदारनाथ सिंह
Book Details
-
ISBN9788183618274
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रस्तुत कृति बच्चन की बावन कविताओं का संकलन है जिनमें से पैंतालीस उनके पूर्व प्रकाशित चौबीस संग्रहों से चुनी गई हैं और सात कविताएँ यहाँ पहली बार प्रकाशित की जा रही हैं।
बच्चन ने इस सदी के तीसरे दशक की समाप्ति पर लिखना आरम्भ किया था, और आठवें दशक के अन्त तक लिखते रहे हैं। ज़ाहिर है, उन्हें द्विवेदीयुगीन प्रतिष्ठित और छायावादी प्रयोगात्मक काव्य-शैली दाय के रूप में मिली थी।
फिर भी काव्य-क्षेत्रा में पदार्पण करने पर एक प्रख्यात समालोचक ने उनके बारे में लिखा था, ‘‘...बच्चन सारा ढाँचा बदलकर आए...नई भाषा, नई अभिव्यंजना और नए क़िस्म की अनुभूति—उनका सब कुछ नया ही नया है।’’
इस अभिनव भूमि से प्रस्थान करके बच्चन ने जो काव्य-यात्रा लगभग पचास वर्षों तक की है, और उनके दौरान उनकी भाषा भाव-भंगिमा में जो परिवर्तन आते रहे हैं उनकी साक्षी है यहाँ प्रस्तुत ये कविताएँ—उनके सफ़र के ख़ास-ख़ास पड़ाव के रूप में।
हम आपको कवि के साथ एक बार इस काव्य-यात्रा पर निकलने और इन शब्द-पड़ावों पर ठहरने के लिए आमन्त्रित करते हैं।
Qafas
- Author Name:
Brahmdeep Alune
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- Description: Book
Kam Se Kam
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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- Description: ऐसे दौर में जब लोकतन्त्र में कई गैर लोकतान्त्रिक तरीकों से असहमति को दबाये जाने का एक सुनियोजित अभियान ही चल रहा है, तब अशोक वाजपेयी उन सार्वजनिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों में से हैं जो कविता, लेखन, वक्तव्य और कर्म के अनेक स्तरों पर असहमति को विन्यस्त और मुखर कर रहे हैं। तरह-तरह से डराई जा रही व्यवस्था में वे निडर रहकर अपनी बात कहते हैं। वे उन लोगों में से हैं जो अन्त:करण के आयतन को संक्षिप्त होने से लगातार बचाने का अथक यत्न करते रहे हैं। ‘कम से कम’ की कविताएँ ज़्यादा से ज़्यादा मानवीय बने रहने का अभ्यास हैं : वे इसका साक्ष्य हैं कि कठिन से कठिन समय में कविता मनुष्य बने रहने की सम्भावना की जगह होती है।
Ek Charwahe Ka Geet
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Ketan Yadav
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- Description: वे न मनु थे न आदम/ग्रन्थों की गढ़ी हुई छवियों के बाहर/वे केवल और केवल चरवाहे थे। यह एक चरवाहे का गीत है जो सभ्यता के समानान्तर बजते हुए एक अपनी दुनिया का दावा पेश कर रहा है—उस सभ्यता के बरक्स जिसमें चारागाह दफ़्न होते जा रहे हैं। यह सभ्यता की आलोचना नहीं बल्कि प्रकृति के साहचर्य में जीती उस दुनिया का स्मरण है जो अगर अपने ही रास्ते आगे बढ़ती तो वैसी न होती जैसी आज हमारी यह दुनिया है। इन कविताओं को पढ़ते हुए अग्रगामिता की किसी वैकल्पिक सरणि का अभाव हमें लगातार विचलित करता है। हिंसा के नवीनतम दृश्यों की आदी होती आँखें जो कुछ भी देखने की तैयारी कर चुकी हैं, हमारे वर्तमान की आँखें हैं, जिनके लिए अद्यतित होने का अर्थ है और अधिक संवेदनशून्य होना, और भी भीषण को पचा लेने को प्रस्तुत रहना। ये कविताएँ इस प्रक्रिया को अलग-अलग कोणों से देखती हैं, और कहीं अपनी सावधानी को ढीला नहीं होने देतीं। तकनीक के आधुनिक युवा संसार की सत्ता को लेकर भी ये कविताएँ कम सजग नहीं हैं— मेरे मनुष्य के सामने तुमसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, पुरखा कवियो!/यहाँ मनुष्य बनाम मनुष्य नहीं, मशीन है। ऐन्द्रीय स्पर्श के दिन-ब-दिन संकीर्ण और सपाट होते जाने के मुकाबले प्रेम यहाँ एक उम्मीद की तरह आता है, लेकिन क्या वह भी हमारी पहुँच में है, मशीनों की इस्पाती निस्पन्द धवल चौंध को चीरकर क्या उस तक हमारा वह आर्त स्वर पहुँच पाता है जिसके सामने ‘कभी सूर्योदय न होनेवाली रात’ किसी भी दिन आ खड़ी होगी! आशंका जो मौजूदा समय की निर्मिति के अभिन्न हिस्से के रूप में हमारे चारों ओर उपस्थित है, इन कविताओं में बार-बार लौटती है। यह इस युवा कवि की सूक्ष्म संवेदना का प्रमाण है और सामाजिक-राजनीतिक बोध का भी जिसका एक सिरा जरूरी तौर पर तकनीक के आतंक से जा जुड़ता है जो अब मनुष्य को सामने से नहीं, ऊपर से देख रही है—देवता की तरह। पेड़ों, पशुओं और पत्तियों की भाषा से लेकर मशीनों की चीख तक को सुनतीं ये कविताएँ पाठक को निःसन्देह एक भिन्न धरातल पर ले जाएँगी।
Vidyapati Padavali
- Author Name:
Ramvriksh Benipuri
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यह ‘विद्यापति पदावली’ इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसका संग्रह बेनीपुरी जी ने किया है। हिन्दी के प्रसिद्ध ललित निबन्धकार बेनीपुरी कवि, कहानीकार ही नहीं ग़रीबों, पीड़ितों और शोषितों के लिए आजीवन संघर्षरत रहे। ऐसे लेखक के द्वारा विद्यापति की पदावली का सम्पादन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है।
पुस्तक के प्रारम्भ में बेनीपुरी जी द्वारा लिखी गई भूमिका केवल विश्लेषण और सूचना की दृष्टि से नहीं, बल्कि नई अर्थ-मीमांसा की दृष्टि से नई है। इससे विद्यापति को हम पहले से कुछ अधिक जानने लगते हैं।
विद्यापति की यह पदावली शब्दों के अर्थ की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। बेनीपुरी जी शब्द पारखी थे। उन्होंने इस पदावली में शब्दों के सांकेतिक अर्थ को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है जो अन्यत्र दुर्लभ है। विद्यापति के पदों को गाते हुए चैतन्य महाप्रभु समाधिस्थ हो जाते थे। आनन्द कुमार स्वामी को पदावली काव्य-कला की दृष्टि से बहुत प्रिय थी। उन्होंने लिखा भी है। उस पदावली का यह प्रस्तुतीकरण अत्यन्त उपयोगी है। बेनीपुरी जी विद्यापति को ‘हिन्दी का जयदेव’ और ‘मैथिल कोकिल’ कहते थे। उनकी वाणी का बेनीपुरी द्वारा भावित यह संस्करण लोगों को अवश्य रुचेगा। भूमिका में बेनीपुरी ने अपनी चिर-परिचित शैली में पदों की भाषा और कविता माधुरी का जो वर्णन किया है, वह तो अन्यत्र दुर्लभ है ही।
‘राजा की गगनचुम्बी अट्टालिका’ से लेकर ग़रीबों की टूटी हुई फूस की झोंपड़ी तक में विद्यापति के पदों का जो सम्मान है; भूतनाथ के मन्दिर और कोहबर घर में पदों की जो प्रतिष्ठा है, उसको ध्यान में रखते हुए ही यह पुस्तक बेनीपुरी जी ने सम्पादित की है। इससे विद्यापति और उनकी पदावली की नई अर्थवत्ता और चमक उजागर होती है। पाठ्यक्रम की दृष्टि से यह सर्वोत्तम है।
Siya-Piya Katha
- Author Name:
Ushakiran Khan
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सीता-कथा राम के पश्चाताप-विगलित विलाप पर पूर्णता पाती है। वही राम जिन्हें पाकर सीता ने अपने होने को सार्थक समझा, वही राम जिनके पीछे-पीछे वे चौदह वर्षों के लिए वन जाने को साथ हो लीं, और जिनके महान, लोकोपकारी उद्देश्य के लिए उन्होंने रावण की लंका में बन्दी-जीवन व्यतीत किया। वही राम सब कुछ प्राप्त कर लेने के बाद लोक-भय के चलते उन्हें पुनः वनगमन करा देते हैं। वही राम फिर उस स्वाभिमानिनी सीता के लिए विलाप करते हैं जो उनके राजवंश को दो वीर-पुत्र देकर हमेशा के लिए चली जाती है।
सीता की कथा मर्यादा कही जाने वाली नैतिक-सामाजिक संरचनाओं के पुरुष-केन्द्रित संस्थानीकरण की सीमाओं की कथा भी है। कितना सहज है पुरुषों की तमाम पौरुष-प्रतिष्ठापक गतिविधियों की सबसे तीखी नोक का स्त्री के मर्मस्थल में कार बिंध जाना। सिय पिय कथा की सीता कहती हैं :
गड़ता है काँटा/अनेकानेक हीन-भाव का/अधैर्य का/ संशय का/और अन्ततः अस्तित्व का राजा राम/आज मैं करती हूँ मुक्त/बिला रही हूँ माटी में
यह उस स्त्री का अन्तिम कथन है जो अपने प्रेम और समर्पण भाव की गहनता के कारण पुरुष के तथाकथित मर्यादा-तंत्र को प्रश्नांकित नहीं करती, बस उसके बीच से सिर तानकर निकल जाती है। यही पुरुष के बल-वैभव पर उसकी टिप्पणी है, यही उसका प्रतिरोध है। लेकिन राम का विलाप उसकी उपलब्धि नहीं, क्योंकि प्रतिशोध उसका ध्येय नहीं। सिय पिय कथा की सीता पश्चाताप-दग्ध राम को पुनः यह कहने आती हैं :
जब राजधर्म पसरेगा/बनकर अन्धकार/सीता का प्रेम प्रकट होगा/सीता ही होगी समाहार
यह खंडकाव्य इसी सीता की महिमा का गान करते हुए हमारे बाहुबली वर्तमान में स्त्री-तत्व की आवश्यकता की ओर इंगित करता है।
Raat Samundar Mein
- Author Name:
Amjad Islam Amjad
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- Description: कहाँ आ के रुकने थे रास्ते! कहाँ मोड़ था! उसे भूल जा वो जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला, उसे भूल जा वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं दिल-ए-बेख़बर मिरी बात सुन, उसे भूल जा, उसे भूल जा मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में, तिरी आस तेरे गुमान मे सबा कह गई मिरे कान में, मिरे साथ आ, उसे भूल जा किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बाद कुछ भी नहीं है कम तुझे ज़िन्दगी ने भुला दिया, तू भी मुस्कुरा, उसे भूल जा
KAHAN ACHHE HUMARE DIN
- Author Name:
Keshav Sharan
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- Description: collection of ghazals
Utsava
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
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कविता, सर्वत्र तथा सार्वकालिक भाव से नित्य उपस्थित है। अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन कविताओं ने मुझे माध्यम चुना, तो इसका तात्पर्य भी यही है कि कविता का कोई कर्त्ता नहीं होता; और यदि कोई है, तो वह स्वयं अपनी आत्मकर्ता है, स्वयंसृष्टा है।
अनभिव्यक्त कविता भी परम सत्य या परात्पर-सत्ता की भाँति ही एक अविभक्त-चेतना है, बल्कि चेतना प्रवाह, जो सतत विद्यमान है। अनभिव्यक्त एक, अभिव्यक्त हो जाने पर अनेक हो जाता है, क्योंकि अभिव्यक्तकर्ता अनेक होते हैं। अभिव्यक्ति एक को अनेक बनाती है। कविता भी वस्तुतः एक ही है, उसका रचनात्मक स्वरूप अनेक का हो जाता है। रचना, अनभिव्यक्त कविता का सम्प्रेषित स्वरूप है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि रचना, अनभिव्यक्त कविता की प्रतीक है। मूर्ति प्रभु नहीं, प्रभु की प्रतीक होती है। एक प्रकार से रचना, काव्य के महत्- प्रासाद का मात्र प्रवेश द्वार है। रचना, कविता की प्रतीति है, कविता नहीं। कविता का प्राप्य-रूप रचना ही हो सकता है। सर्वत्र, सार्वकालिक होने पर भी वह अप्राप्य है। समुद्र ही मेघ वर्षण का कारण होने पर भी हम समुद्र से सीधे जल नहीं ग्रहण कर सकते। रचना की गुणात्मकता, कविता की न होकर कवि की होती है। कविता जिस भाव, मुद्रा और स्वरूप में अभिव्यक्त होकर रचना कहलाती है, उससे मात्र इतना ही स्पष्ट होता है कि एक कवि विशेष ने कविता का साक्षात किस आनुभाविक स्तर पर किया था।
- श्रीनरेश मेहता
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