Taranand Viyogi

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मिथिला के प्रसिद्ध गाँव महिषी में 1966 में जन्म। गाँव के विद्यालयों में विधिवत् संस्कृत की पढ़ाई। शिक्षा : साहित्याचार्य, एम.ए., पीएच.डी. आदि। अस्सी के दशक से साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रियता। सात वर्ष केन्द्रीय विद्यालय में अध्यापन किया, फिर बिहार प्रशासनिक सेवा में आ गए। आरम्भिक दिनों में हिन्दी तथा मैथिली दोनों भाषाओं में लेखन। हिन्दी में तब उनका नाम तारानन्द होता था। फिर उन्होंने अपने आपको मैथिली में एकाग्र कर लिया, जहाँ पिछले तीन दशक से बहुलवाद के प्रतिष्ठापन के लिए संघर्षरत हैं। मैथिली के वर्तमान लेखन में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नाम। चालीस के क़रीब उनकी मौलिक, सम्पादित, अनूदित किताबें छपी हैं। रचनाओं के अनुवाद अंग्रेज़ी सहित कई भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुए हैं। नागार्जुन पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'तुमि चिर सारथि' भी उन्होंने मूलत: मैथिली में ही लिखी थी। बाद में पहल-पुस्तिका के रूप में जारी होने पर हिन्दी-संसार इससे परिचित हुआ। हाल में राजकमल चौधरी के प्रसंगों पर लिखी उनकी किताब 'जीवन क्या जिया' भी ख़ासी चर्चित रही। इसे पहले ‘तद्भव' ने अपने एक अंक में छापा था। एक ज़माने में ‘कल के लिए' ने उनकी कविताओं के लिए ‘मुक्तिबोध पुरस्कार’ दिया था। बच्चों की किताब के लिए साहित्य अकादेमी का ‘बाल साहित्य पुरस्कार’ मिला। ‘यात्री चेतना सम्मान’, ‘विदेह साहित्य सम्मान’, ‘किरण सम्मान’, ‘कोशी सम्मान’ आदि मिले हैं।

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