Hayashi Fumiko
आधुनिक जापानी साहित्य की चुनिन्दा महिला साहित्यकारों में हायाशी फुमिको का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। इनका जन्म सन् 1903 में यामागुची प्रान्त के एक गाँव शिमोनोसेकी शितानाकामाची में हुआ। सन् 1910 में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इनकी माँ को अपने पति का घर छोड़ना पड़ा। माँ किकू और फुमिको सावाइकि साबुरो के घर रहने लगीं। फुमिको की प्रारम्भिक पढ़ाई नागासाकी में हुई। पिता का व्यवसाय एक जगह स्थिर न था। ये फेरी लगाया करते थे। इस तरह फुमिको का परिवार लगभग ख़ानाबदोश की ज़िन्दगी जी रहा था। यही कारण था कि फुमिको एक ही स्कूल में एक लम्बी अवधि तक नहीं पढ़ पाई। ग़रीबी और पिताजी की ख़ानाबदोश ज़िन्दगी के कारण कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ज़िन्दगी के अपने इन अनुभवों का ज़िक्र इन्होंने लगभग अपनी रचनाओं में कमोबेश किया है। ‘फूकिन तो उओ नो माची’ में भी हायाशी फुमिको ने अपनी ऐसी ही ज़िन्दगी की कहानी कही है। उस वक़्त उनकी उम्र तेरह साल थी। अपने माता-पिता के साथ जब ये ओनो-मिचि में रहने लगीं तो इन्होंने यहीं के प्राइमरी स्कूल में दाख़िला भी ले लिया। ओनो-मिचि में बिताए दिनों ने हायाशी फुमिको को एक सफल लेखिका बनाने में काफ़ी अहम भूमिका निभाई। अध्यापक कोबायाशी की छत्रच्छाया में इनका रुझान साहित्य की ओर हुआ। इसी दौरान लाइब्रेरी में बैठकर इन्होंने तमाम किताबें पढ़ीं। इन्होंने विदेशी साहित्य भी ख़ूब पढ़ा। ख़ास तौर पर, रूसी, जर्मन और अंग्रेज़ी साहित्य। अभी ये छोटी ही उम्र की थीं कि इन्होंने एक कवि इमाई तोकुसाबुरो के संरक्षण में कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं। सन् 1921 में इन्होंने ‘आकीनुमा योको’ नाम से ‘सानयो निचि शिम्बुन’ में कविताएँ छपवाई़। सन् 1924 में कवि तोमोतानी शिजुए के साथ ‘फुतारी’ पत्रिका में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कीं। इसी दौरान इनकी मुलाक़ात एक सुप्रसिद्ध लेखिका हीराबायाशी ताइको से हुई और कुछ समय तक ये दोनों लेखिकाएँ साथ रहने लगीं। सन् 1926 में चित्रकार जुकार् योकु किन से इनका विवाह हुआ। इनकी सुप्रसिद्ध रचना ‘होरोकी’ उपन्यास न होकर एक डायरी है, जिसमें इन्होंने अपनी भ्रमण-भरी ज़़िन्दगी के संस्मरण लिखे हैं। सन् 1928 में ‘होरोकी’ का एक हिस्सा ‘आकी गा कितान्दा’ (‘शरद ऋतु आ गई’) को ‘न्योनिन गेइजुत्सु’ में छापने से जापानी साहित्य की दुनिया (बुनदान) में इनकी पहचान बनी। सन् 1930 में इसी रचना को काइजोशा ने प्रकाशित किया। फलस्वरूप इनकी यह पुस्तक इतनी बिकी कि सिर्फ़ एक किताब की रॉयल्टी से फुमिको चीन की यात्रा कर पाईं। इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ ‘नाकी मुशी कोजो’ (1934), और ‘उकीगुमो’ (1951) हैं। सन् 1949 में ‘होरोकी’ के ऊपर इन्हें दाइसानकाई ‘जोर् यू बुन्गाकुशो पुरस्कार’ से नवाज़ा गया। जब ये अपनी लेखन-ज़िन्दगी के चरमोत्कर्ष पर थीं कि सन् 1951 में जापान की इस प्रतिभाशाली लेखिका का अचानक निधन हो गया।
Hayashi Fumiko
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About Hayashi Fumiko
फुमिको की प्रारम्भिक पढ़ाई नागासाकी में हुई। पिता का व्यवसाय एक जगह स्थिर न था। ये फेरी लगाया करते थे। इस तरह फुमिको का परिवार लगभग ख़ानाबदोश की ज़िन्दगी जी रहा था। यही कारण था कि फुमिको एक ही स्कूल में एक लम्बी अवधि तक नहीं पढ़ पाई। ग़रीबी और पिताजी की ख़ानाबदोश ज़िन्दगी के कारण कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ज़िन्दगी के अपने इन अनुभवों का ज़िक्र इन्होंने लगभग अपनी रचनाओं में कमोबेश किया है।
‘फूकिन तो उओ नो माची’ में भी हायाशी फुमिको ने अपनी ऐसी ही ज़िन्दगी की कहानी कही है। उस वक़्त उनकी उम्र तेरह साल थी। अपने माता-पिता के साथ जब ये ओनो-मिचि में रहने लगीं तो इन्होंने यहीं के प्राइमरी स्कूल में दाख़िला भी ले लिया। ओनो-मिचि में बिताए दिनों ने हायाशी फुमिको को एक सफल लेखिका बनाने में काफ़ी अहम भूमिका निभाई। अध्यापक कोबायाशी की छत्रच्छाया में इनका रुझान साहित्य की ओर हुआ। इसी दौरान लाइब्रेरी में बैठकर इन्होंने तमाम किताबें पढ़ीं। इन्होंने विदेशी साहित्य भी ख़ूब पढ़ा। ख़ास तौर पर, रूसी, जर्मन और अंग्रेज़ी साहित्य।
अभी ये छोटी ही उम्र की थीं कि इन्होंने एक कवि इमाई तोकुसाबुरो के संरक्षण में कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं। सन् 1921 में इन्होंने ‘आकीनुमा योको’ नाम से ‘सानयो निचि शिम्बुन’ में कविताएँ छपवाई़। सन् 1924 में कवि तोमोतानी शिजुए के साथ ‘फुतारी’ पत्रिका में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कीं।
इसी दौरान इनकी मुलाक़ात एक सुप्रसिद्ध लेखिका हीराबायाशी ताइको से हुई और कुछ समय तक ये दोनों लेखिकाएँ साथ रहने लगीं। सन् 1926 में चित्रकार जुकार् योकु किन से इनका विवाह हुआ।
इनकी सुप्रसिद्ध रचना ‘होरोकी’ उपन्यास न होकर एक डायरी है, जिसमें इन्होंने अपनी भ्रमण-भरी ज़़िन्दगी के संस्मरण लिखे हैं। सन् 1928 में ‘होरोकी’ का एक हिस्सा ‘आकी गा कितान्दा’ (‘शरद ऋतु आ गई’) को ‘न्योनिन गेइजुत्सु’ में छापने से जापानी साहित्य की दुनिया (बुनदान) में इनकी पहचान बनी। सन् 1930 में इसी रचना को काइजोशा ने प्रकाशित किया। फलस्वरूप इनकी यह पुस्तक इतनी बिकी कि सिर्फ़ एक किताब की रॉयल्टी से फुमिको चीन की यात्रा कर पाईं।
इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ ‘नाकी मुशी कोजो’ (1934), और ‘उकीगुमो’ (1951) हैं। सन् 1949 में ‘होरोकी’ के ऊपर इन्हें दाइसानकाई ‘जोर् यू बुन्गाकुशो पुरस्कार’ से नवाज़ा गया। जब ये अपनी लेखन-ज़िन्दगी के चरमोत्कर्ष पर थीं कि सन् 1951 में जापान की इस प्रतिभाशाली लेखिका का अचानक निधन हो गया।