Chak Piran Ka Jassa
About the book
हिन्दी के जाने-माने कथाकार बलवन्त सिंह के इस वृहत् उपन्यास में विभाजन से कई वर्ष पूर्व के पंजाब की कहानी है। पात्रों के चयन में लेखक ने बहुत ही सजग दृष्टि का परिचय दिया है, और जीवन के केवल उसी क्षेत्र से उनका चुनाव किया है जो उसके प्रत्यक्ष अनुभव की परिधि में आते हैं। मुख्यत: जाट-पात्रों के माध्यम से पंजाब के तत्कालीन जनजीवन का बड़ा ही सजीव चित्र यहाँ प्रस्तुत किया है। उपन्यास का ताना-बाना मुख्य रूप से दो पात्रों के इर्द-गिर्द घूमता है। एक अनाथ लड़का जस्सासिंह है जिसके पालन-पोषण का दायित्व अनिच्छा से रिश्ते के चाचा बग्गासिंह को लेना पड़ता है। जब जस्सा जवान हो जाता है तब एक विचित्र समस्या उठ खडी होती है। वे दोनों शक्तिशाली हैं, उजड्ड हैं, और एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से घृणा करते हैं, लेकिन उनके हृदय की गहराइयों में कहीं कोई एक ऐसी सुषुप्त भावना है, जिसे प्रेम तो नहीं, लगाव ज़रूर कहा जा सकता है। उपन्यास की अपनी एक मौलिक भाषा है जो कथा-क्रम के अनुरूप डाली गई है। इन दो पात्रों के अतिरिक्त और भी कई पात्र हैं जो उपन्यास की गति को प्रवाहपूर्ण करते हैं। ज्यों-ज्यों उपन्यास का कथा-चक्र आगे बढ़ता है, चाचा-भतीजे की समस्याएँ जटिल होती जाती हैं। उन दोनों की स्थिति न तो घृणा से मुक्त हो जाने की है और न अलगाव को स्वीकारने की। परस्पर-विरोधी भावनाओं के द्वन्द्व का समाधान अन्तत: जस्सासिंह ढूँढ़ता है और कथानायक की गौरव-गरिमा प्राप्त करता है। विभिन्न परिस्थितियों के सूक्ष्म मनोविश्लेषण और उपन्यास के जीवन्त पात्रों को प्रयासवश भी विस्मृत कर पाना कठिन है। वस्तुतः ‘चक पीराँ का जस्सा’ सशक्त भाषा-शैली में लिखा गया एक प्रभावशाली उपन्यास है।
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About the Book
हिन्दी के जाने-माने कथाकार बलवन्त सिंह के इस वृहत् उपन्यास में विभाजन से कई वर्ष पूर्व के पंजाब की कहानी है। पात्रों के चयन में लेखक ने बहुत ही सजग दृष्टि का परिचय दिया है, और जीवन के केवल उसी क्षेत्र से उनका चुनाव किया है जो उसके प्रत्यक्ष अनुभव की परिधि में आते हैं। मुख्यत: जाट-पात्रों के माध्यम से पंजाब के तत्कालीन जनजीवन का बड़ा ही सजीव चित्र यहाँ प्रस्तुत किया है।
उपन्यास का ताना-बाना मुख्य रूप से दो पात्रों के इर्द-गिर्द घूमता है। एक अनाथ लड़का जस्सासिंह है जिसके पालन-पोषण का दायित्व अनिच्छा से रिश्ते के चाचा बग्गासिंह को लेना पड़ता है। जब जस्सा जवान हो जाता है तब एक विचित्र समस्या उठ खडी होती है। वे दोनों शक्तिशाली हैं, उजड्ड हैं, और एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से घृणा करते हैं, लेकिन उनके हृदय की गहराइयों में कहीं कोई एक ऐसी सुषुप्त भावना है, जिसे प्रेम तो नहीं, लगाव ज़रूर कहा जा सकता है। उपन्यास की अपनी एक मौलिक भाषा है जो कथा-क्रम के अनुरूप डाली गई है। इन दो पात्रों के अतिरिक्त और भी कई पात्र हैं जो उपन्यास की गति को प्रवाहपूर्ण करते हैं। ज्यों-ज्यों उपन्यास का कथा-चक्र आगे बढ़ता है, चाचा-भतीजे की समस्याएँ जटिल होती जाती हैं। उन दोनों की स्थिति न तो घृणा से मुक्त हो जाने की है और न अलगाव को स्वीकारने की। परस्पर-विरोधी भावनाओं के द्वन्द्व का समाधान अन्तत: जस्सासिंह ढूँढ़ता है और कथानायक की गौरव-गरिमा प्राप्त करता है।
विभिन्न परिस्थितियों के सूक्ष्म मनोविश्लेषण और उपन्यास के जीवन्त पात्रों को प्रयासवश भी विस्मृत कर पाना कठिन है। वस्तुतः ‘चक पीराँ का जस्सा’ सशक्त भाषा-शैली में लिखा गया एक प्रभावशाली उपन्यास है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2018
- Weight
- 398 grams
- ISBN-13
- 9789352211616
- Pages
- 417
- Reading time
- ~14 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13.5 × 21 cm
- Language
- Hindi
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