Chak Piran Ka Jassa
(0)
Author:
Balwant SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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हिन्दी के जाने-माने कथाकार बलवन्त सिंह के इस वृहत् उपन्यास में विभाजन से कई वर्ष पूर्व के पंजाब की कहानी है। पात्रों के चयन में लेखक ने बहुत ही सजग दृष्टि का परिचय दिया है, और जीवन के केवल उसी क्षेत्र से उनका चुनाव किया है जो उसके प्रत्यक्ष अनुभव की परिधि में आते हैं। मुख्यत: जाट-पात्रों के माध्यम से पंजाब के तत्कालीन जनजीवन का बड़ा ही सजीव चित्र यहाँ प्रस्तुत किया है।</p> <p>उपन्यास का ताना-बाना मुख्य रूप से दो पात्रों के इर्द-गिर्द घूमता है। एक अनाथ लड़का जस्सासिंह है जिसके पालन-पोषण का दायित्व अनिच्छा से रिश्ते के चाचा बग्गासिंह को लेना पड़ता है। जब जस्सा जवान हो जाता है तब एक विचित्र समस्या उठ खडी होती है। वे दोनों शक्तिशाली हैं, उजड्ड हैं, और एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से घृणा करते हैं, लेकिन उनके हृदय की गहराइयों में कहीं कोई एक ऐसी सुषुप्त भावना है, जिसे प्रेम तो नहीं, लगाव ज़रूर कहा जा सकता है। उपन्यास की अपनी एक मौलिक भाषा है जो कथा-क्रम के अनुरूप डाली गई है। इन दो पात्रों के अतिरिक्त और भी कई पात्र हैं जो उपन्यास की गति को प्रवाहपूर्ण करते हैं। ज्यों-ज्यों उपन्यास का कथा-चक्र आगे बढ़ता है, चाचा-भतीजे की समस्याएँ जटिल होती जाती हैं। उन दोनों की स्थिति न तो घृणा से मुक्त हो जाने की है और न अलगाव को स्वीकारने की। परस्पर-विरोधी भावनाओं के द्वन्द्व का समाधान अन्तत: जस्सासिंह ढूँढ़ता है और कथानायक की गौरव-गरिमा प्राप्त करता है।</p> <p>विभिन्न परिस्थितियों के सूक्ष्म मनोविश्लेषण और उपन्यास के जीवन्त पात्रों को प्रयासवश भी विस्मृत कर पाना कठिन है। वस्तुतः ‘चक पीराँ का जस्सा’ सशक्त भाषा-शैली में लिखा गया एक प्रभावशाली उपन्यास है।
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हिन्दी के जाने-माने कथाकार बलवन्त सिंह के इस वृहत् उपन्यास में विभाजन से कई वर्ष पूर्व के पंजाब की कहानी है। पात्रों के चयन में लेखक ने बहुत ही सजग दृष्टि का परिचय दिया है, और जीवन के केवल उसी क्षेत्र से उनका चुनाव किया है जो उसके प्रत्यक्ष अनुभव की परिधि में आते हैं। मुख्यत: जाट-पात्रों के माध्यम से पंजाब के तत्कालीन जनजीवन का बड़ा ही सजीव चित्र यहाँ प्रस्तुत किया है।</p>
<p>उपन्यास का ताना-बाना मुख्य रूप से दो पात्रों के इर्द-गिर्द घूमता है। एक अनाथ लड़का जस्सासिंह है जिसके पालन-पोषण का दायित्व अनिच्छा से रिश्ते के चाचा बग्गासिंह को लेना पड़ता है। जब जस्सा जवान हो जाता है तब एक विचित्र समस्या उठ खडी होती है। वे दोनों शक्तिशाली हैं, उजड्ड हैं, और एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से घृणा करते हैं, लेकिन उनके हृदय की गहराइयों में कहीं कोई एक ऐसी सुषुप्त भावना है, जिसे प्रेम तो नहीं, लगाव ज़रूर कहा जा सकता है। उपन्यास की अपनी एक मौलिक भाषा है जो कथा-क्रम के अनुरूप डाली गई है। इन दो पात्रों के अतिरिक्त और भी कई पात्र हैं जो उपन्यास की गति को प्रवाहपूर्ण करते हैं। ज्यों-ज्यों उपन्यास का कथा-चक्र आगे बढ़ता है, चाचा-भतीजे की समस्याएँ जटिल होती जाती हैं। उन दोनों की स्थिति न तो घृणा से मुक्त हो जाने की है और न अलगाव को स्वीकारने की। परस्पर-विरोधी भावनाओं के द्वन्द्व का समाधान अन्तत: जस्सासिंह ढूँढ़ता है और कथानायक की गौरव-गरिमा प्राप्त करता है।</p>
<p>विभिन्न परिस्थितियों के सूक्ष्म मनोविश्लेषण और उपन्यास के जीवन्त पात्रों को प्रयासवश भी विस्मृत कर पाना कठिन है। वस्तुतः ‘चक पीराँ का जस्सा’ सशक्त भाषा-शैली में लिखा गया एक प्रभावशाली उपन्यास है।
Book Details
-
ISBN9789352211616
-
Pages417
-
Avg Reading Time14 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल तिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
Naqqashidar Cabinet
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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सुधा ओम ढींगरा का उपन्यास नक़्क़ाशीदार केबिनेट वर्ष 2016 का अत्यंत सफल उपन्यास है। यह उपन्यास पेपरबैक और ऑडियोबुक में भी उपलब्ध है।
Gawah Gairhazir
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
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किसुन साह ने जब बिना किसी सिर-फुड़ौव्वल के बेटों के बीच बाँट-बखरा कर दिया तो लोगों ने उन्हें इस बात पर खुश होने को कहा कि अब उनके बुढ़ापे के दिन मौज-मस्ती में कटते रहेंगे। किसुन साह ने भी निर्णय ले लिया कि मौज-मस्ती में दिन काटने के लिए उन्हें अब बूढ़ा भी हो ही जाना चाहिए। लेकिन...। परिवार नामक सुख के टापू की यह कहानी यहीं से शुरू होती है। लोक और ग्रामीण जीवन के मर्मज्ञ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ अपनी बहुस्तरीय भाषा-सामर्थ्य के लिए खासतौर पर जाना जाता है। पात्रों की कहानी कहने के साथ ही कथाकार इसमें भारतीय ग्राम्य समाज और उसकी संरचना पर भी टिप्पणियाँ करते चलते हैं जिससे एक तरफ सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनकी क्षमता रेखांकित होती है, तो दूसरी तरफ़ गाँव की गझिन सामाजिक-मानसिक बनावट को समझने में भी मदद मिलती है। उपन्यास की कथा के केन्द्र में किसुन साह हैं—एक स्वाभिमानी और समझदार बुजुर्ग। घर की सम्पत्ति इत्यादि का बँटवारा अपने परिवार में शान्तिपूर्वक करने के बाद वे सबसे छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला करते हैं। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद जब उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है तो वे घर छोड़कर बाकी जीवन एक मन्दिर में बिताने का फैसला करते हैं, लेकिन परिवार से मोह के चलते यह भी नहीं कर पाते। पारिवारिक सम्बन्धों की महीन अक्कासी के अलावा यह उपन्यास पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सम्बन्धों की ऊष्मा के छीजते जाने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी करता है। समर्थ शिल्प, जीवन्त भाषा और बेधक कथ्य वाला अत्यन्त पठनीय उपन्यास !
Umrao Jaan Ada
- Author Name:
Mirza Hadi Ruswa
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उन्नीसवीं सदी की मशहूर तवायफ़ उमराव जान ‘अदा’ लखनऊ और आस-पास के इलाक़ों की ख़ास महफ़िलों की रौनक़ हुआ करती थी। उसकी ख़ूबसूरती, शोख़ अदाओं, नाच-गाने और शायरी के मद्दाहों में उस ज़माने के ख़ानदानी रईस, जोशीले नवाबज़ादे और नामी ग़ुण्डे तक शामिल थे। लेकिन फ़ैज़ाबाद के एक जमादार की बेटी अमीरन के मशहूर तवायफ़ उमराव जान बनने की कहानी काफ़ी अफ़सोसनाक है और पढ़ने वाले इसे पढ़ते हुए जज़्बाती हो उठते हैं। इस कहानी को मिर्ज़ा हादी रुस्वा ने इस तरह से बयान किया है कि उमराव जान की ज़िन्दगी के सफ़र का हर मंज़र हमारी आँखों के सामने ज़िन्दा हो उठता है। इस किताब को पहली बार 1899 में छापा गया था और उसके बाद से इस कहानी को कई बार किताबों और फ़िल्मों की शक्ल में सामने लाया जा चुका है मगर लोगों में इसकी दिलचस्पी आज भी बरक़रार है।
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