Nirupama
(0)
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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Available
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रचनाक्रम की दृष्टि से ‘निरुपमा’ निराला का चौथा उपन्यास है। पहले के तीन उपन्यासों—‘अप्सरा’, ‘अलका’ और ‘प्रभावती’ की तरह इस उपन्यास का कथानक भी घटना-प्रधान है। स्वतंत्रता-आन्दोलन के दिनों में, ख़ासकर बंगाल में समाज-सुधार की लहर पूरे उभार पर थी। निराला का बंगाल से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा, इसलिए उनके उपन्यासों में समाज-सुधार का स्वर बहुत मुखर है। लेकिन इसे समाज-सुधार न कहकर सामन्ती रूढ़ियों से विद्रोह कहें तो अधिक उपयुक्त होगा। ‘निरुपमा’ में उन्होंने ऐसे ही विद्रोही चरित्रों की अवतारणा की है। जनवादी चेतना से ओतप्रोत नवशिक्षित तरुण-तरुणियों के रूप में कृष्णकुमार, कमल और निरुपमा के चरित्र, नन्दकिशोर नवल के शब्दों में, ‘‘सामन्ती रूढ़ियों को तोड़कर समाज के सम्मुख एक आदर्श रखते हैं। उनके मार्ग में बाधाएँ आती हैं, पर वे उनसे विचलित नहीं होते और संघर्ष करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।’’ कमल और निरुपमा के माध्यम से निराला ने नारी-जाति की मुक्ति का भी पथ प्रशस्त किया है।</p> <p>सन् 1935 के आसपास लिखा गया निराला का यह उपन्यास हमारे लिए आज भी कितना नया और प्रासंगिक है, यह इसे पढ़कर ही जाना जा सकता है।
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रचनाक्रम की दृष्टि से ‘निरुपमा’ निराला का चौथा उपन्यास है। पहले के तीन उपन्यासों—‘अप्सरा’, ‘अलका’ और ‘प्रभावती’ की तरह इस उपन्यास का कथानक भी घटना-प्रधान है। स्वतंत्रता-आन्दोलन के दिनों में, ख़ासकर बंगाल में समाज-सुधार की लहर पूरे उभार पर थी। निराला का बंगाल से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा, इसलिए उनके उपन्यासों में समाज-सुधार का स्वर बहुत मुखर है। लेकिन इसे समाज-सुधार न कहकर सामन्ती रूढ़ियों से विद्रोह कहें तो अधिक उपयुक्त होगा। ‘निरुपमा’ में उन्होंने ऐसे ही विद्रोही चरित्रों की अवतारणा की है। जनवादी चेतना से ओतप्रोत नवशिक्षित तरुण-तरुणियों के रूप में कृष्णकुमार, कमल और निरुपमा के चरित्र, नन्दकिशोर नवल के शब्दों में, ‘‘सामन्ती रूढ़ियों को तोड़कर समाज के सम्मुख एक आदर्श रखते हैं। उनके मार्ग में बाधाएँ आती हैं, पर वे उनसे विचलित नहीं होते और संघर्ष करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।’’ कमल और निरुपमा के माध्यम से निराला ने नारी-जाति की मुक्ति का भी पथ प्रशस्त किया है।</p>
<p>सन् 1935 के आसपास लिखा गया निराला का यह उपन्यास हमारे लिए आज भी कितना नया और प्रासंगिक है, यह इसे पढ़कर ही जाना जा सकता है।
Book Details
-
ISBN9788126713295
-
Pages132
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘कुछ दिन और’ निराशा के नहीं, आशा के भँवर में डूबते चले जाने की कहानी हैं—एक अन्धी आशा, जिसके पास न कोई तर्क है, न कोई तंत्र; बस, वह है अपने-आप में स्वायत्त।
कहानी का नायक अपनी निष्क्रियता में जड़ हुआ, उसी की उँगली थामे चलता रहता है। धीरे-धीरे ज़िन्दगी के ऊपर से उसकी पकड़ छीजती चली जाती है। और, इस पूरी प्रक्रिया को झेलती है उसकी पत्नी—कभी अपने मन पर और कभी अपने शरीर पर। वह एक स्थगित जीवन जीनेवाले व्यक्ति की पत्नी है। इस तथ्य को धीरे-धीरे एक ठोस आकार देती हुई वह एक दिन पाती है कि इस लगातार विलम्बित आशा से कहीं ज़्यादा श्रेयस्कर एक ठोस निराशा है जहाँ से कम-से-कम कोई नई शुरुआत तो की जा सकती है। और, वह यही निर्णय करती है।
‘कुछ दिन और’ अत्यन्त सामान्य परिवेश में तलाश की गई एक विशिष्ट कहानी है, जिसे पढ़कर हम एकबारगी चौंक उठते हैं और देखते हैं कि हमारे आसपास बसे इन इतने शान्त और सामान्य घरों में भी तो कोई कहानी नहीं पल रही।
Dalhousie Diaries
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Shashank Srivastav
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- Description: कुछ क़ागज़ पड़ा था घर के कोने मे जाने कब डायरी बना दिया कहनी थी बस एक कहानी मुझे जाने कब शायरी बना दिया कभी कभी कुछ ऐसा लिखा भी मिल जाता हैं जो हम असल मे पढ़ना चाहते हैं और जिसे जी लेना चाहते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे मैंने जिया... डलहौज़ी डायरीज़ को । एक खुबसुरत गीत की तरफ सुबह-शाम दिन-रात । एक पचपन साल का बूढ़ा पोस्टमास्टर और एक बीस बरस की ‘पगली लड़की’, एक रोज़ाना गुज़रने वाली रेलगाड़ी और एक डलहौज़ी का एक छोटा सा रेलवे स्टेशन... बस यही तो हैं यह कहानी । पर क्या ये बहुत हैं इसके एहसास को समझने के लिये । शायद नही! एक सच्चाई और भी जो भीतर कही दबी हुई थी हमारे और हम इसे जानकर भी अंजान बने रहे । वो सच्चाई जो हमारी हैं और जिसे हमने बनाई हैं । कुछ पुरानी यादो, अनकहे रिश्ते, बदलते अहसास और एक काली सच्चाई का समागम हैं... डलहौज़ी डायरीज़ ।
Bhookh
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Description:
विकास और समानता के दावों के घटाटोप के नीचे असन्तोष सुलगता रहता है। राजसत्ता आँख मूँदे रहती है और स्थिरता एवं शान्ति का दावा करती रहती है। जब तक असन्तोष को क्रोध का रास्ता नहीं मिलता, तब तक ‘सब कुछ ठीकठाक है’ का भ्रम बना रहता है। छोटे-छोटे संघर्ष चलते रहते हैं और अभिजन यथास्थिति के मुग़ालते में डूबे रहते हैं। इस कथ्य को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास।
भूख स्थानीय स्तर की एक बड़ी लड़ाई की दास्तान है। बिहार का पठारी ज़िला पलामू का गाँव खेड़ा। काग़ज़ पर शासन बिहार की सरकार का और वास्तविक क़ब्ज़ा लरातू के आदमख़ोर कुँवर का। बचे-खुचे सामन्ती दलदल की उपज कुँवर की जो जंगल का राजा, जंगल के उत्पाद का लुटेरा और आदिवासियों की अस्मत को खिलौने की तरह उछालने वाला है। तेतरी के साथ बलात्कार, बेगार-बँधुआ बनाए गए आदिवासी, सुलगता असन्तोष और दिशा देती परिवर्तनकामी शक्तियाँ कुँवर को चुनौती देती हैं। नौकरशाही कुँवर के सामने लाचार है। लेकिन दलितों के असन्तोष का क्रान्तिकारी दावानल जब भड़कता है तो कुँवर मारा जाता है।
प्रख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी ने अन्याय के घृणित रूपों और उसके विरुद्ध चल रहे जन-संघर्ष की दहकती कथा पाठकों के समक्ष रखी है।
Andhi Chhalaang
- Author Name:
Mandakranta Sen
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- Description: नाम तिथि। एक मध्यवित्त परिवार की लड़की। चेहरा अति साधारण। बी.ए. की छात्रा। जीवन की धुरी विद्यालय और घरेलू व्यस्तताएँ। अचानक एक दिन किसी की नज़र से नज़र मिली और तिथि के शरीर में बिजली दौड़ गई। लड़के का नाम पार्थ। तिथि की एक सहेली का चचेरा भाई। आयु में उससे बारह साल बड़ा। परिवार के विरोध के बावजूद तिथि पार्थ से विवाह करके निहायत निम्नवर्गीय परिस्थितियों में अपने दाम्पत्य जीवन का आरम्भ करती है। और, किराए के इसी अकेले कमरे में उसके सामने जीवन का वह पक्ष खुलता है जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। बांग्ला में एक कवि के रूप में प्रतिष्ठित व चर्चित मन्दाक्रान्ता सेन अपने इस पहले उपन्यास में स्त्री-अस्मिता को एक नया विस्तार और नया चेहरा देने का प्रयास करती हैं; साथ ही अपनी सम्भावनाओं की तरफ़ भी पाठकों का ध्यान आकर्षित कराती हैं।
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