Inhin Hathiyaron Se
About the book
भारत के स्वाधीनता संग्राम में सन बयालीस का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ मुक्तिकामी भारतीय जनता का सर्वोच्च एकीकृत प्रयास माना जाता है। इस आंदोलन का हिंदी साहित्य में कई बार संदर्भ आया है लेकिन पूर्णतः उसी पर केन्द्रित सृजनात्मक प्रयत्न कम ही हुए। उस आंदोलन में ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ के नारे गूँजते थे। साठ साल बाद आज ‘अंग्रेजो, भारत आओ’ की नीति चल रही है। ऐसे समय में भारत छोड़ो आंदोलन की जातीय स्मृति की ओर कथा-गुरु अमरकान्त का ध्यान जाना खास अर्थ रखता है। इन्हीं हथियारों से में शायद ही कोई बड़ा नेता दिखलाई देता है। अगर कहीं वे हैं तो बस सूचना-संदर्भ के रूप में। आंदोलन की प्रकृति के अनुरूप ही यह बहुनायक-संरचना वाला उपन्यास है जिसके प्रमुख चरित्रों में नीलेश छात्र है, गोबर्द्धन व्यापारी, सदाशयव्रत पूर्व पहलवान-डाकू, नम्रता जमींदार की बेटी, भगजोगनी फल-विक्रेता की पत्नी, रमाशंकर साधारण कार्यकर्ता, हरचरण मजदूर, गोपालराम दलित। गरज यह कि समाज का कोई तबका, कोई समुदाय नहीं बचा, जो इस आंदोलन में शरीक न हुआ हो। यह उपन्यास इन्हीं मामूली लोगों, गुमनाम नायकों का विरुद है–उनके चारित्रिक उत्कर्ष और पतन के साथ-साथ। इतने नायकों वाले इस उपन्यास का महानायक है– बलिया! वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक पिछड़ा जिला। कुलीन लोग इस जनपद को सांस्कृतिक पिछड़ेपन का प्रतीक मानते हैं। लेकिन बलिया वैसा प्रतिवादी, प्रतिरोधी और साहसी जनपद है जो जीवन की कोमलताओं और राग-रंग से भी समृद्ध है। देश के कई जाग्रत जनपदों की तरह ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान बलिया में भी आज़ाद सरकार का गठन हुआ था। सिद्धान्तकार चाहें तो इस उपन्यास को स्थानीय इतिहास का निम्नवर्गीय प्रसंग कह लें पर यह है ‘फैक्ट’ से प्रेरित ‘फिक्शन’ ही और वह भी एक स्वाधीनता सेनानी की कलम से रचा हुआ। अमरकान्त भविष्य में झाँकने की अपनी क्षमता के लिए भी प्रसिद्ध रहे हैं। इस उपन्यास में वे उस गौरवशाली अतीत के चित्रण और विश्लेषण को लेकर उपस्थित हुए हैं जो भविष्य का पाथेय हो सकता है। उन्हीं मामूली हथियारों से जनता बड़ी लड़ाई जीत लेगी, यही विश्वास इस उपन्यास का बीज-सूत्र है। –अरुण प्रकाश
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About the Book
भारत के स्वाधीनता संग्राम में सन बयालीस का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ मुक्तिकामी भारतीय जनता का सर्वोच्च एकीकृत प्रयास माना जाता है। इस आंदोलन का हिंदी साहित्य में कई बार संदर्भ आया है लेकिन पूर्णतः उसी पर केन्द्रित सृजनात्मक प्रयत्न कम ही हुए। उस आंदोलन में ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ के नारे गूँजते थे। साठ साल बाद आज ‘अंग्रेजो, भारत आओ’ की नीति चल रही है। ऐसे समय में भारत छोड़ो आंदोलन की जातीय स्मृति की ओर कथा-गुरु अमरकान्त का ध्यान जाना खास अर्थ रखता है।
इन्हीं हथियारों से में शायद ही कोई बड़ा नेता दिखलाई देता है। अगर कहीं वे हैं तो बस सूचना-संदर्भ के रूप में। आंदोलन की प्रकृति के अनुरूप ही यह बहुनायक-संरचना वाला उपन्यास है जिसके प्रमुख चरित्रों में नीलेश छात्र है, गोबर्द्धन व्यापारी, सदाशयव्रत पूर्व पहलवान-डाकू, नम्रता जमींदार की बेटी, भगजोगनी फल-विक्रेता की पत्नी, रमाशंकर साधारण कार्यकर्ता, हरचरण मजदूर, गोपालराम दलित। गरज यह कि समाज का कोई तबका, कोई समुदाय नहीं बचा, जो इस आंदोलन में शरीक न हुआ हो। यह उपन्यास इन्हीं मामूली लोगों, गुमनाम नायकों का विरुद है–उनके चारित्रिक उत्कर्ष और पतन के साथ-साथ।
इतने नायकों वाले इस उपन्यास का महानायक है– बलिया! वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक पिछड़ा जिला। कुलीन लोग इस जनपद को सांस्कृतिक पिछड़ेपन का प्रतीक मानते हैं। लेकिन बलिया वैसा प्रतिवादी, प्रतिरोधी और साहसी जनपद है जो जीवन की कोमलताओं और राग-रंग से भी समृद्ध है। देश के कई जाग्रत जनपदों की तरह ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान बलिया में भी आज़ाद सरकार का गठन हुआ था। सिद्धान्तकार चाहें तो इस उपन्यास को स्थानीय इतिहास का निम्नवर्गीय प्रसंग कह लें पर यह है ‘फैक्ट’ से प्रेरित ‘फिक्शन’ ही और वह भी एक स्वाधीनता सेनानी की कलम से रचा हुआ।
अमरकान्त भविष्य में झाँकने की अपनी क्षमता के लिए भी प्रसिद्ध रहे हैं। इस उपन्यास में वे उस गौरवशाली अतीत के चित्रण और विश्लेषण को लेकर उपस्थित हुए हैं जो भविष्य का पाथेय हो सकता है। उन्हीं मामूली हथियारों से जनता बड़ी लड़ाई जीत लेगी, यही विश्वास इस उपन्यास का बीज-सूत्र है।
–अरुण प्रकाश
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 5th
- Publication year
- 2008
- Weight
- 640 grams
- ISBN-13
- 9788126715183
- Pages
- 536
- Reading time
- ~18 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 15.5 × 24 cm
- Language
- Hindi
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