Daya Ki Devi
(0)
Author:
Rajendra RatneshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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अरावली की पर्वत श्रेणियों में विराजित जोगणिया माता मेवाड़ का सुरम्य तीर्थस्थान है। वहाँ पशुबलि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही थी। मैंने स्वयं वहाँ बबूलों और खेजड़ों के वृक्षों की डालियों पर बलि दिए पशुओं की मुंडियाँ लटकी देखी हैं। ये पशु अपने-अपने मालिक परिवारों की मनौतियों, बोलमाओं और मान्यताओं के कारण वधित होते थे। आसपास के पेड़ों पर लटके इन पशु मुंडों को देखते हुए मन्दिर तक जाना और दर्शन करना हर किसी के बस की बात नहीं थी।</p> <p>माँ यशकुँवरजी का यह वाक्य ‘माँ जणै के हणै’ जब पहली बार वहाँ आकाश में गूँजा तब पूरे जोगणिया माता तीर्थ और आसपास के मेवाड़ क्षेत्र की धरती धन्य-धन्य कर उठी। आकाश के नक्षत्रों और मूक पशुओं की शब्दहीन क्रन्दनपूर्ण आवाज़ों ने हज़ारों मीलों तक की धरती को एक सर्वथा नया अहिंसक कम्पन दिया। लोग आपस में एक-दूसरे से पूछते थे, ‘माँ जणै के हणै?’ माँ जन्म देती है कि जीवन का हरण करती है? यह एक अभियानी या आन्दोलनी नारा नहीं था। सचमुच यह एक जीवनदायी जीवन-रक्षक विचार था। बेशक यशकुँवरजी का विरोध हुआ। विरोध भी जमकर हुआ। पर अन्तत: वे लोग भी अपने खाँडे, गँड़ासे, त्रिशूल और तलवारें तथा कुल्हाड़े जैसे कठोर शस्त्र फेंककर नारियलों, माखन, मिश्री तथा भोग नैवेद्यों पर आ गए। माँ यशकुँवरजी ने पशुबलि के लिए सर्वत्र सिहरन के साथ जाने जानेवाले एक महातीर्थ को परम पवित्र अहिंसा का अनुपम तीर्थ बना दिया।</p> <p>अपने साधुजीवन के एक-दो नहीं, पूरे 70-80 वर्षों का यह पुण्य फल जैन समाज में आचार्य-पद के समकक्ष प्रवर्तिनी पद-प्राप्त यशकुँवर माता ने अपने गुरु समाज और सकल जैन-अजैन समाज पर निछावर कर दिया। इस कृति में ये सारे वर्णन भाई रत्नेश जी ने विस्तार से किए हैं। मालवा और मेवाड़ के उन सभी जनपदीय ग्रामों, नगरों और शहरों के नामों सहित लेखक ने युग प्रवर्तिनी माँ के चौमासाओं पर अपनी सिद्ध लेखनी चलाई है।</p> <p>यह पुस्तक जानकी बैरागी की कथा नहीं है। यह पुस्तक अहिंसा और जीवदया का अलौकिक गौमुख है।
Read moreAbout the Book
अरावली की पर्वत श्रेणियों में विराजित जोगणिया माता मेवाड़ का सुरम्य तीर्थस्थान है। वहाँ पशुबलि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही थी। मैंने स्वयं वहाँ बबूलों और खेजड़ों के वृक्षों की डालियों पर बलि दिए पशुओं की मुंडियाँ लटकी देखी हैं। ये पशु अपने-अपने मालिक परिवारों की मनौतियों, बोलमाओं और मान्यताओं के कारण वधित होते थे। आसपास के पेड़ों पर लटके इन पशु मुंडों को देखते हुए मन्दिर तक जाना और दर्शन करना हर किसी के बस की बात नहीं थी।</p>
<p>माँ यशकुँवरजी का यह वाक्य ‘माँ जणै के हणै’ जब पहली बार वहाँ आकाश में गूँजा तब पूरे जोगणिया माता तीर्थ और आसपास के मेवाड़ क्षेत्र की धरती धन्य-धन्य कर उठी। आकाश के नक्षत्रों और मूक पशुओं की शब्दहीन क्रन्दनपूर्ण आवाज़ों ने हज़ारों मीलों तक की धरती को एक सर्वथा नया अहिंसक कम्पन दिया। लोग आपस में एक-दूसरे से पूछते थे, ‘माँ जणै के हणै?’ माँ जन्म देती है कि जीवन का हरण करती है? यह एक अभियानी या आन्दोलनी नारा नहीं था। सचमुच यह एक जीवनदायी जीवन-रक्षक विचार था। बेशक यशकुँवरजी का विरोध हुआ। विरोध भी जमकर हुआ। पर अन्तत: वे लोग भी अपने खाँडे, गँड़ासे, त्रिशूल और तलवारें तथा कुल्हाड़े जैसे कठोर शस्त्र फेंककर नारियलों, माखन, मिश्री तथा भोग नैवेद्यों पर आ गए। माँ यशकुँवरजी ने पशुबलि के लिए सर्वत्र सिहरन के साथ जाने जानेवाले एक महातीर्थ को परम पवित्र अहिंसा का अनुपम तीर्थ बना दिया।</p>
<p>अपने साधुजीवन के एक-दो नहीं, पूरे 70-80 वर्षों का यह पुण्य फल जैन समाज में आचार्य-पद के समकक्ष प्रवर्तिनी पद-प्राप्त यशकुँवर माता ने अपने गुरु समाज और सकल जैन-अजैन समाज पर निछावर कर दिया। इस कृति में ये सारे वर्णन भाई रत्नेश जी ने विस्तार से किए हैं। मालवा और मेवाड़ के उन सभी जनपदीय ग्रामों, नगरों और शहरों के नामों सहित लेखक ने युग प्रवर्तिनी माँ के चौमासाओं पर अपनी सिद्ध लेखनी चलाई है।</p>
<p>यह पुस्तक जानकी बैरागी की कथा नहीं है। यह पुस्तक अहिंसा और जीवदया का अलौकिक गौमुख है।
Book Details
-
ISBN9788126724161
-
Pages132
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: युद्ध! कोणतंच युद्ध माणसाला शहाणं करत नाही की कोणत्याही प्रश्नांची उत्तरं देत नाही. उलट ते नवे प्रश्न निर्माण करतं. बदल्याच्या भावनेनं माणसाला वेडं बनवतं. तरीही माणसं युद्ध करत राहतात, नवनवी शस्त्रं हाती घेऊन परस्परांना मारत राहतात. पण त्यात भरडले जातात ते निरपराध सामान्य नागरिक. विशेषतः युद्धाशी संबंध नसणाऱ्या महिला, मुलं आणि वयोवृद्ध माणसं हकनाक बळी ठरतात युद्धाचे... हीच बाब अनेकांना खेचून नेते युद्धभूमीकडे माणुसकीवरचा विश्वास दृढ करण्यासाठी... अशी माणसं मग युद्धाच्या जखमांवर उपाय करण्यासाठी धडपडत राहतात... त्यातूनच जन्माला येते ‘डॉक्टर विदाऊट बॉर्डर्स'सारखी संस्था, जी निसर्गनिर्मित अथवा मानवनिर्मित आपत्तींमध्ये अडकलेल्यांना जीवदान देण्याचं काम अव्याहतपणे करते. हीच संस्था काही सेवाव्रत्तींना संधी देते अडचणीत सापडलेल्या माणसांना वाचवण्याची. स्वतःचा जीव धोक्यात घालून ही सेवाव्रत्ती माणसं सहभागी होतात अशा मिशनमध्ये आणि अनुभवाचं एक वेगळंच विश्व घेऊन परततात. कसा असतो हा जगावेगळा अनुभव? कोणत्या परिस्थितीत ते युद्धग्रस्तांवर उपचार करतात? युद्धाकडे ते कसे बघतात? उपचारासाठी येणारे युद्धग्रस्त त्यांच्याकडे कसे बघतात? डोळ्यांसमोर अनेकांचा मृत्यू दिसत असताना जखमींना वाचवण्याची कसरत कशी चालते? अशा एक ना अनेक प्रसंगांचं, युद्धभूमीवरच्या नाट्याचं थरारक तितकंच अस्वस्थ करणारं अनुभवकथन... सीरिया, येमेन आणि इराक या तीन युद्धग्रस्त भागात रुग्णसेवा देण्यासाठी गेलेल्या एका भारतीय ऑर्थोपेडिक सर्जनने घेतलेले विलक्षण अनुभव मांडणारे मराठीतले पहिलेच पुस्तक... ‘डॉक्टर ऑन अ वॉरफ्रंट'! डॉक्टर ऑन अ वॉरफ्रंट | डॉ. भरत केळकर Doctor On A Warfront | Dr. Bharat Kelkar
Apni Gawahi
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

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Description:
जब कृष्णा पत्रकार बनने का फ़ैसला करती है तो अपना औरत होना और हिन्दी समाचार एजेंसी में काम करना, यही दो परेशानियाँ उसके सामने हैं। जैसाकि उसके मुन्नू चाचा कहते हैं उसका यह फ़ैसला भले ही उसे उसकी निराशा से क्षणिक मुक्ति दे, लेकिन आख़िरकार यह उसे बर्बाद कर देगा। मुन्नू ’चा के मन में इस बारे में कोई शक नहीं था।
सत्तर के दशक में अंग्रेज़ी मीडिया में आए उफान में अंग्रेज़ी और उसके पत्रकार सातवें आसमान पर पहुँच गए, जबकि भाषायी पत्र-पत्रिकाओं पर उनके मालिक कुंडली मारे बैठे रहे—ख़ासकर अब के दौर में मीडिया साम्राज्यों का संचालन करनेवाले मालिक-सम्पादकों की फ़ौज। पुरानी बिल्डिंग के अंधे और तंग दफ़्तर से शुरुआत करनेवाली कृष्णा नई बिल्डिंग के अंग्रेज़ी सम्पादकों और पत्रकारों के नाज़-नखरों को कुछ ईर्ष्या से, कुछ क्रोध से और कुछ मज़े लेकर देखती है। लगभग बेमतलब विषयों के रिपोर्टर से बढ़ते-बढ़ते एक राष्ट्रीय दैनिक की पहली महिला सम्पादक, देश के सबसे लोकप्रिय टीवी चैनलों में से एक की न्यूज़ एंकर बनने तक वह मीडिया के बदलते स्वरूप को बहुत पास से देखती है। वह देखती है कि राजनीतिक और आर्थिक फ़ायदों की लड़ाई मीडिया के सहारे कैसे लड़ी जाती है। और वह पाती है कि इन अधिकांश मामलों में सच्चाई ही बलि चढ़ती है।
समकालीन भारतीय परिदृश्य में सत्ता के पीछे भागनेवालों और दलालों की करतूतों के दिलचस्प और गुदगुदानेवाले विवरणों से भरा यह उपन्यास अपनी सचबयानी और समाचार रिपोर्टिंग की चकाचौंध-भरी दुनिया की वास्तविकताओं पर केन्द्रित है।
Gita
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
‘गीता’ शीर्षक यह उपन्यास पहले ‘पार्टी कामरेड’ नाम से प्रकाशित हुआ था। इसके केन्द्र में गीता नामक एक कम्युनिस्ट युवती है जो पार्टी के प्रचार के लिए उसका अख़बार बम्बई की सड़कों पर बेचती है और पार्टी के लिए फंड इकट्ठा करती है। पार्टी के प्रति समर्पित निष्ठावान गीता पार्टी के काम के सिलसिले में अनेक लोगों के सम्पर्क में आती है। इन्हीं में से एक पदमलाल भावरिया भी है जो पैसे के बल पर युवतियों को फँसाता है। उसके साथी एक दिन उसे अख़बार बेचती गीता को दिखाकर फँसाने की चुनौती देते हैं। गीता और भावरिया का लम्बा सम्पर्क अन्ततः भावरिया को ही बदल देता है।
अपने अन्य उपन्यासों की तरह इस उपन्यास में भी यशपाल देश की राजनीति और उसके नेताओं के चारित्रिक अन्तर्विरोधों को व्यंग्यात्मक शैली में उद्घाटित करते हैं। उपन्यास में कम्यून जीवन का बड़ा विश्वसनीय अंकन हुआ है जिसके कारण इस उपन्यास का ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके लिए काफ़ी समय तक यशपाल मुम्बई में स्वयं कम्यून में रहे थे। अपने ऊपर लगाए गए प्रचार के आरोप का उत्तर देते हुए यशपाल उपन्यास की भूमिका में संकेत करते हैं कि वास्तविकता को दर्पण दिखाना भी प्रचार के अन्तर्गत आ सकता है या नहीं, यह विचारणीय है।
Gramsevika
- Author Name:
Amarkant
- Book Type:

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Description:
दमयन्ती के दिल में एक आग जल रही थी। वह साहस, संघर्ष और कर्मठता का जीवन अपनाकर अपने दु:ख, निराशा और अपमान का बदला उस व्यक्ति से लेना चाहती थी, जिसने दहेज के लालच में उसे ठुकरा दिया था।
उस दिन वह ख़ुशी से चहक उठी, जब उसे नियुक्ति-पत्र मिला। उसकी ख़ुशी का एक यह भी कारण था कि उसे गाँव की औरतों की सेवा करने का मौक़ा मिला था। जब पढ़ती थी, तो उसकी यह इच्छा रही थी कि वह अपने देश के लिए, समाज के लिए कुछ करे। आज उसका सपना साकार होने चला था। परन्तु गाँव में जाकर उसे कितना कटु अनुभव हुआ था!
उस गाँव में न कोई स्कूल था और न ही अस्पताल। रूढ़िवादी संस्कारों और अन्धविश्वासों की गिरफ़्त में छटपटाते लोग थे, जिन्हें पढ़ाई-लिखाई से नफ़रत थी। उनका विश्वास था कि पढ़ाई-लिखाई से ग़रीबी आएगी। भला अपने बच्चों को वे भिखमंगा क्यों बनाएँ? भगवान ने सबको हाथ-पैर दिए हैं। टोकरी बनाकर शहर में बेचो और पेट का गड्ढा भरो।
इस अज्ञानता के कारण गाँव के ग़रीब लोग जहाँ धर्म के ठेकेदारों के क्रिया-कलापों से आक्रान्त थे, वहीं जोंक की तरह ख़ून चूसनेवाले सूदख़ोरों के जुल्मों से उत्पीड़ित भी।
इसके बावजूद दमयन्ती ने हार नहीं मानी। अपने लक्ष्य की राह को प्रशस्त करने की दिशा में जुटी रही—कि अचानक हरिचरन के प्रवेश ने ऐसी उथल-पुथल मचाई कि उसके जीवन की दिशा ही बदल गई।
Pahchan
- Author Name:
Anwar Suhail
- Book Type:

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Description:
इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में भारतीय समाज का वह सीमान्त इलाक़ा है जहाँ के बच्चों की शिक्षा सिनेमा–हॉलों, गैरेजों और चाय–पान की गुमटियों में होती है, जिन्हें भूगोल का ज्ञान ट्रक चालकों से, इंजीनियरिंग का ज्ञान गैरेजों में खटकर, ड्रेस डिजाइनिंग का हुनर दर्जी की दुकान से और ब्यूटीशियन का डिप्लोमा नाई की दुकान से मिलता है। यूनुस इसी धरती पर उगा हुआ एक पौधा है, जिसे अपने लिए एक पहचान की तलाश है।
लेकिन उसके साथ चिपकी हुई एक पहचान उसका मुसलमान होना भी है, पर वह उसे हर कहीं उजागर नहीं करता, कम–से–कम अपने सलीम भाई की तरह तो नहीं जिसे गुजरात में ऑटो में बैठे–बैठे ज़िन्दा जला दिया गया; उसके लिए उससे ज़्यादा मायने अपनी वह छवि रखती है जिसे वह सनूबर की आँखों में देखता है। सनूबर जो उसकी महबूबा है और जो उसे मुहम्मद यूनुस नहीं, अंग्रेज़ी में संक्षेप करके ‘एम–वाई’ अर्थात् ‘माई’ बुलाती है।
एक आदमी की पहचान क्या होती है उसका धर्म, उसका पेशा या उसका हृदय? यह उपन्यास अपने नायक यूनुस के माध्यम से यही सवाल हमारे सामने रखता है। यूनुस निम्न मध्यवर्गीय भारतीय मुस्लिम समाज का एक प्रतिनिधि चरित्र है, और अपने बनने की प्रक्रिया में हमें अपनी स्मृतियों के साथ उस पूरे परिदृश्य से परिचित कराता है जिसमें साम्प्रदायिक ताक़तों की राष्ट्रीय राजनीति में घुल–मिल जाने के बाद, आज भारत का ग़रीब मुस्लिम तबका रह रहा है।
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