Mulak
(0)
Author:
Dalpat ChauhanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
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आदिकाल से भारतीय समाज में कोढ़ की तरह फैली अस्पृश्यता की समस्या पर एक नए नज़रिए से लिखा गया उपन्यास। स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में इस सामाजिक अवरोध से समाज को विमुक्त करने का प्रयास किया गया पर वैधानिक उपायों का समाज में व्यावहारिक अनुपालन नहीं हो सका। यह उपन्यास जाति-प्रथा की वर्तमान अवस्थिति को रेखांकित करते हुए इसके अतीत पर भी दृष्टिपात करता है जब सत्ताधारी समाज ने सवर्ण-अवर्ण की लक्ष्मण-रेखाएँ बनाकर मानवीय संवेदनाओं का तिरस्कार किया, अपने ही जैसी चमड़ी और ख़ून वाले व्यक्ति के साथ पाशविक व्यवहार किया और असंख्य लोगों को नारकीय जीवन जीने को विवश किया।</p> <p>उपन्यास की कहानी में शोषित समाज के एक युवक का उपयोग उच्चवर्ण द्वारा अपना वंश बढ़ाने के लिए किया जाता है लेकिन उससे मिलती-जुलती मुखाकृति वाली सन्तान पैदा होने पर शोषक समाज उसे लोक-लज्जा से भयभीत होकर समाप्त करने की साज़िश में जुट जाता है। उपन्यास अतीत और वर्तमान की एक कड़ी के रूप में सामने आता है और सवाल उठाता है कि क़ानून की बन्दिशों के बावजूद क्या यह सामाजिक बुराई समाप्त हो पाई? क्या संस्कारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी घोली गई इस घृणा से समाज विमुक्त हो पाया? वर्तमान महानगरीय संस्कृति में अब जाति का कितना महत्त्व रह गया है और वर्तमान ग्रामीण समाज में क्या जाति ने कोई नया रूप लिया है? एक और सवाल जिस पर यह उपन्यास फ़ोकस करता है, वह है स्थानान्तरण—अपनी मूलभूमि को छोड़कर कहीं और जाकर सिर छिपाना। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह भी हमारे वर्तमान की एक ज्वलन्त समस्या है। कह सकते हैं कि तमाम सवालों के बीच इस उपन्यास में यह सवाल बराबर मौजूद रहता है। यह औपन्यासिक कृति पाठकों को निश्चय ही इन सभी सवालों से दो-चार होने को प्रेरित करेगी।</p> <p>
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आदिकाल से भारतीय समाज में कोढ़ की तरह फैली अस्पृश्यता की समस्या पर एक नए नज़रिए से लिखा गया उपन्यास। स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में इस सामाजिक अवरोध से समाज को विमुक्त करने का प्रयास किया गया पर वैधानिक उपायों का समाज में व्यावहारिक अनुपालन नहीं हो सका। यह उपन्यास जाति-प्रथा की वर्तमान अवस्थिति को रेखांकित करते हुए इसके अतीत पर भी दृष्टिपात करता है जब सत्ताधारी समाज ने सवर्ण-अवर्ण की लक्ष्मण-रेखाएँ बनाकर मानवीय संवेदनाओं का तिरस्कार किया, अपने ही जैसी चमड़ी और ख़ून वाले व्यक्ति के साथ पाशविक व्यवहार किया और असंख्य लोगों को नारकीय जीवन जीने को विवश किया।</p>
<p>उपन्यास की कहानी में शोषित समाज के एक युवक का उपयोग उच्चवर्ण द्वारा अपना वंश बढ़ाने के लिए किया जाता है लेकिन उससे मिलती-जुलती मुखाकृति वाली सन्तान पैदा होने पर शोषक समाज उसे लोक-लज्जा से भयभीत होकर समाप्त करने की साज़िश में जुट जाता है। उपन्यास अतीत और वर्तमान की एक कड़ी के रूप में सामने आता है और सवाल उठाता है कि क़ानून की बन्दिशों के बावजूद क्या यह सामाजिक बुराई समाप्त हो पाई? क्या संस्कारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी घोली गई इस घृणा से समाज विमुक्त हो पाया? वर्तमान महानगरीय संस्कृति में अब जाति का कितना महत्त्व रह गया है और वर्तमान ग्रामीण समाज में क्या जाति ने कोई नया रूप लिया है? एक और सवाल जिस पर यह उपन्यास फ़ोकस करता है, वह है स्थानान्तरण—अपनी मूलभूमि को छोड़कर कहीं और जाकर सिर छिपाना। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह भी हमारे वर्तमान की एक ज्वलन्त समस्या है। कह सकते हैं कि तमाम सवालों के बीच इस उपन्यास में यह सवाल बराबर मौजूद रहता है। यह औपन्यासिक कृति पाठकों को निश्चय ही इन सभी सवालों से दो-चार होने को प्रेरित करेगी।</p>
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Book Details
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ISBN9789349159471
-
Pages143
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘आन्ना कारेनिना’ महाकाव्यात्मक त्रासदी को नए दिक्-काल सन्दर्भों में पुनर्परिभाषित करने का दबाव बनानेवाला यह महान उपन्यास अपराध या पाप के नैतिक प्रश्न को गहरे ऐतिहासिक-सामाजिक सन्दर्भों में प्रस्तुत करते हुए, समाज और स्वयं अपने जीवन के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के उत्तरदायित्व को चिन्तन के केन्द्र में उपस्थित करता है। इसके साथ ही, यह तत्कालीन रूसी जीवन के सभी बुनियादी और केन्द्रीय अन्तर्विरोधों को भी चित्रित करता है। सामाजिक जीवन की समस्याओं तथा कला और दर्शन के प्रश्नों के साथ ही तोल्स्तोय ने इस उपन्यास में परिवार और नैतिक जीवन की समस्याओं पर केन्द्रित करते हुए स्त्री-प्रश्न को भी गहरी दार्शनिक चिन्ता के साथ प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद, तोल्स्तोय गम्भीर विचारधारात्मक संकट के दौर से गुज़रे, जिसकी परिणति के तौर पर, बल के द्वारा बुराई के अप्रतिरोध का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए भी, वे मौजूदा व्यवस्था की सभी बुनियादों को ख़ारिज करने तथा सामाजिक ढाँचे की निर्मम-बेलाग आलोचना करने की स्थिति तक जा पहुँचे। ‘आन्ना कारेनिना’ का दायरा हालाँकि ‘युद्ध और शान्ति’ की अपेक्षा संकुचित है, लेकिन इस उपन्यास के चरित्र अधिक जटिल हैं। वे अधिक संवेदनशील प्रतीत होते हैं और उनके आन्तरिक तनाव और चिन्ताएँ उपन्यास में समग्र जीवन की अनिश्चितता और अस्थायित्व के परिवेश को परावर्तित करती हैं। ‘आन्ना कारेनिना’ एक हद तक आत्मकथात्मक उपन्यास भी है। इसे लिखते हुए तोल्स्तोय अपने समय और अपने ख़ुद के जीवन के बारे में स्वयं ही स्पष्ट होने की प्रक्रिया से गुज़र रहे थे। उपन्यास में जिन समस्याओं को उठाने और हल करने की कोशिश की गई थी, उनके प्रति तोल्स्तोय के सरोकार ने 1870 के दशक के अन्त में उन्हें एक नए विचारधारात्मक संकट के भँवर में धकेल दिया और पितृसत्तात्मक किसानी नज़रिए के प्रति उनकी पक्षधरता भी संकटग्रस्त हो गई।
Rangmanch
- Author Name:
Choi In Hoon
- Book Type:

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Description:
कोरिया के लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार छ् वे इन हुन की प्रतिनिधि रचना है ‘रंगमंच’, जिसमें फन्तासी के माध्यम से यथार्थ की भीतरी परत को उकेरने का सार्थक प्रयत्न किया गया है।
यह उपन्यास मूलतः कथानायक के पागलपन और समाज को उसके अनुकूल न बदल पाने से उत्पन्न विफलता को दर्शाता है। दक्षिणी क्षेत्र में माता-पिता की छत्रछाया से अलग कथानायक का व्यक्तित्व क्रान्ति और प्रेम के तत्त्वों से निर्मित होता है जो कभी अमैत्रीपूर्ण समाज की आलोचना करता है तो कभी पुराने ख़ुशहाल दिनों की नास्टेल्जिया से घिर जाता है।
कथानायक ली म्यंगजुन दर्शनशास्त्र का छात्र रहा है जो दुनिया और मनुष्य को एक ख़ास नज़रिए से विश्लेषित करता है। उसने उस दौर को देखा है जब वामपंथी और दक्षिणपंथी लोग कोरियाई प्रायद्वीप में अपनी अलग सरकारें स्थापित करने के लिए एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे। वह दिन-प्रतिदिन कोरिया को अपने वैभव और आदर्श से च्युत भ्रष्टाचार के गर्त में गिरते हुए देखकर हताश होता है। तब भागकर उत्तर की ओर चला जाता है जैसा कि उसके पिता ने पहले किया था। मगर उत्तर के कम्युनिस्टों की दृढ़ व्यवस्था के भीतर कुलबुलाती गुप्त शत्रुता को देख वह बेचैन हो उठता है। उत्तर के लोगों को असंख्य नारों के शोर तले सीमित स्वतंत्रता ही हासिल है जहाँ किसी व्यक्ति की सोच और व्यक्तित्व के विकास के लिए कोई जगह नहीं है।
कोरिया की लड़ाई उसे फिर दक्षिणी क्षेत्र सियोल खींच लाती है जहाँ कम्युनिस्ट दस्ता में लड़ते हुए वह गिरफ़्तार होता है और दक्षिण के एक द्वीप पर बन्दी शिविर में रखा जाता है। लड़ाई के बाद कैदियों से समझौते के आधार पर वह तीसरे और तटस्थ देश भारत को अपने शेष जीवन के लिए चुनता है लेकिन समुद्र यात्रा के दौरान समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर लेता है।
राष्ट्रीय विभाजन की समस्याओं को प्रखरता से रेखांकित करने के कारण कोरियाई साहित्य के इतिहास में ‘रंगमंच’ ने युगान्तकारी कृति का दर्जा हासिल किया है। हिन्दी पाठकों को यह उपन्यास न केवल पठनीय लगेगा, बल्कि उनकी सोच को रचनात्मक आयाम भी प्रदान करेगा।
Sach-Jhooth
- Author Name:
Mahashweta Devi
- Book Type:

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Description:
बांग्ला की ख्यातनामा लेखक महाश्वेता देवी बांग्ला-पाठकों से अधिक हिन्दी-पाठकों में परिचित व प्रसिद्ध हैं। अपनी यथार्थवादी कृतियों के कारण वे पाठकों के विशाल समूह में आदर की पात्री हैं।
महाश्वेता देवी के उपन्यासों की विषय-वस्तु कुछ इतनी नवीन, अनजानी और आकर्षक होती है कि उसे पढ़ते समय पाठक एक अन्य भाव-जगत् की सैर करने लगता है। अपने ‘सच-झूठ’ उपन्यास में वे एक नई ज़मीन हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं।
भारत में नव-धनाढ्य वर्ग की अपनी विचित्र लीला है। अब वे घर-मकान छोड़ प्रोमोटरों द्वारा निर्मित बहुमंज़िली इमारतों के फ़्लैटों में कई-कई मंज़िलों में बसते हैं। इन फ़्लैटों की सजावट उनके धन के प्रदर्शन का साधन है। लेकिन इन बहुमंज़िली इमारतों के पार्श्व में एक पुरानी बस्ती का होना भी आवश्यक है। वह बस्ती न रहे तो फ़्लैटों में बसनेवाली मेमसाहबों की सेवा के लिए दाइयाँ-नौकरानियाँ कहाँ से आएँ। फिर इन दाइयों की साहबों को ज़रूरत रहती है। मेमसाहबों की ग़ैर-मौजूदगी में ये युवती दाइयाँ साहबों के काम आती हैं। ऐसी ही एक दाई और धनिक साहब अर्जुन के चारों ओर घूमती यह कथा धनिक वर्ग के जीवन के गुप्त रहस्यों को प्रकट करती है जहाँ ग़रीबों का शोषण आज भी बरक़रार है। रहस्य-रोमांच से भरपूर एक चमत्कारी कथा।
Kahin Aur Par Kahan By Neeraj Pandey
- Author Name:
Neeraj Pandey
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- Description: क्षितिज को नहीं पता कि माया उसे जानती भी है या नहीं। स्कूल में वह उससे एक क्लास पीछे थी और क्षितिज उसे चुपके-चुपके पसंद करता था लेकिन लड़कपन में लिखा गया लव लेटर माया तक कभी नहीं पहुँचा। बीस साल बाद, जब उसका तीन साल का रिश्ता टूटा, पर यक़ीन खो दिया। मगर जब दोबारा तलाश शुरू की, तो माया याद आयी। उसे नहीं पता माया कहाँ है, कैसी है लेकिन इस बार क्षितिज को उसे ढूँढना ही है। -कहीं और पर कहाँ
SWACHCHHA BHARAT : SASHAKTA BHARAT
- Author Name:
Mahesh Sharma
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- Description: "स्वच्छता जीवन में उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी जीवित रहने के लिए भोजन; लेकिन हम स्वच्छता के प्रति कितने गंभीर हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। इसका एक कारण स?त कानून का अभाव भी है। गांधीजी ने स्वच्छता के प्रति हमारे देशवासियों की उदासीनता को आरंभ में ही भाँप लिया था और यही कारण था कि वे अपने हर विचार में लोगों को स्वच्छता के लिए प्रेरित करते रहते थे। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया था कि ‘‘स्वच्छता स्वतंत्रता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।’’ गांधीजी का कहना था कि जब तक हम बाहरी स्वच्छता नहीं अपनाते, भीतरी स्वच्छता की कल्पना तक नहीं की जा सकती। और बाहरी स्वच्छता आचरण में आते ही भीतरी स्वच्छता स्वतः आ जाती है। वर्तमान परिवेश में इन दोनों प्रकार की स्वच्छता की बड़ी आवश्यकता है और गांधी एक बार फिर मार्गदर्शक के रूप में हमारे सामने हैं। जरूरत है तो बस सच्चे मन से उनके विचारों के अनुसरण की। सुधी पाठक ही नहीं, आबालवृद्ध— सभी स्वच्छता अभियान में संवेदनापूर्वक अपना आत्मीय सहयोग दें और इसे अपनी आदत के रूप में आत्मसात् करके भारत को साफ-स्वच्छ तथा गांधीजी के स्व?न को साकार करें।"
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