Tantya
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टंट्या भील मध्यभारत में उन्नीसवीं सदी के महान आदिवासी जननायक के रूप में जाना जाता है। बचपन तथा युवावस्था में टंट्या को असहनीय यातनाओं से गुज़रना पड़ा। टंट्या की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे, उसके परिवार और समाज को बदहाली, अन्याय और शोषण का शिकार क्यों होना पड़ा। धीरे-धीरे वह सोचने लगा, इसी सोच ने उसे अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा दी। उसने सामन्ती व्यवस्था तथा उस व्यवस्था की रक्षा करनेवाली ब्रिटिश राजसत्ता को गम्भीर चुनौती दी। दलितों-शोषितों और आम आदमी ख़ासकर सर्वहारा किसानों-मज़दूरों का पक्ष लेकर उन्हें इस महासंग्राम में शामिल करने के लिए टंट्या ने अपनी जान की बाज़ी लगा दी। प्रचलित नीतिमूल्यों को नज़रअन्दाज़ कर गहरे मानवीय मूल्यों पर उसने अपने संघर्ष की नींव रखी। सरकार की नज़र में वह डकैतों का सम्राट था, लेकिन लोकमानस में वह ईश्वरीय अंश धारण करनेवाला जननायक माना गया। वह आज भी लोकमानस में मिथक के रूप में अमर है।</p> <p>टंट्या जैसे अलौकिक जननायक पर उपन्यास लिखने का प्रयास कठिन कर्म है। टंट्या की जीवनगाथा मिथकों और लोककथाओं में इस क़दर घुल-मिल गई है कि रहस्य तथा चमत्कार को यथार्थ से अलग करना असम्भव-सा था, लेकिन उपन्यासकार ने अपने प्रामाणिक शोध के ज़रिए और रचनात्मकता के सहारे जीवन-चरित्र के यथार्थ को उजागर करने का प्रयास किया है। यह ग़ौरतलब है कि लोकप्रिय या सरलीकृत वर्णन की फिसलन इस उपन्यास में नहीं दिखती। अनावश्यक भावुकता से बचाव, चिन्तनशीलता, संयत भाषिक अभिव्यक्ति, गहन मानवीय अन्तर्दृष्टि, इतिहास और समकालीनता के बीच जटिल अन्तर्सम्बन्धों का अहसास आदि कई विशेषताओं के कारण यह उपन्यास सर्जन के सहारे इतिहास की पुनर्रचना का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है। उपन्यासों के भारतीय परिदृश्य में बाबा भांड की यह कृति निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण है तथा प्रो. निशिकान्त ठकार जैसे अनुवादक के हाथों से हुआ इस कृति का अनुवाद पाठकों के लिए मूल्यवान उपलब्धि है।</p> <p>—प्रो. चन्द्रकान्त पाटील
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टंट्या भील मध्यभारत में उन्नीसवीं सदी के महान आदिवासी जननायक के रूप में जाना जाता है। बचपन तथा युवावस्था में टंट्या को असहनीय यातनाओं से गुज़रना पड़ा। टंट्या की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे, उसके परिवार और समाज को बदहाली, अन्याय और शोषण का शिकार क्यों होना पड़ा। धीरे-धीरे वह सोचने लगा, इसी सोच ने उसे अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा दी। उसने सामन्ती व्यवस्था तथा उस व्यवस्था की रक्षा करनेवाली ब्रिटिश राजसत्ता को गम्भीर चुनौती दी। दलितों-शोषितों और आम आदमी ख़ासकर सर्वहारा किसानों-मज़दूरों का पक्ष लेकर उन्हें इस महासंग्राम में शामिल करने के लिए टंट्या ने अपनी जान की बाज़ी लगा दी। प्रचलित नीतिमूल्यों को नज़रअन्दाज़ कर गहरे मानवीय मूल्यों पर उसने अपने संघर्ष की नींव रखी। सरकार की नज़र में वह डकैतों का सम्राट था, लेकिन लोकमानस में वह ईश्वरीय अंश धारण करनेवाला जननायक माना गया। वह आज भी लोकमानस में मिथक के रूप में अमर है।</p>
<p>टंट्या जैसे अलौकिक जननायक पर उपन्यास लिखने का प्रयास कठिन कर्म है। टंट्या की जीवनगाथा मिथकों और लोककथाओं में इस क़दर घुल-मिल गई है कि रहस्य तथा चमत्कार को यथार्थ से अलग करना असम्भव-सा था, लेकिन उपन्यासकार ने अपने प्रामाणिक शोध के ज़रिए और रचनात्मकता के सहारे जीवन-चरित्र के यथार्थ को उजागर करने का प्रयास किया है। यह ग़ौरतलब है कि लोकप्रिय या सरलीकृत वर्णन की फिसलन इस उपन्यास में नहीं दिखती। अनावश्यक भावुकता से बचाव, चिन्तनशीलता, संयत भाषिक अभिव्यक्ति, गहन मानवीय अन्तर्दृष्टि, इतिहास और समकालीनता के बीच जटिल अन्तर्सम्बन्धों का अहसास आदि कई विशेषताओं के कारण यह उपन्यास सर्जन के सहारे इतिहास की पुनर्रचना का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है। उपन्यासों के भारतीय परिदृश्य में बाबा भांड की यह कृति निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण है तथा प्रो. निशिकान्त ठकार जैसे अनुवादक के हाथों से हुआ इस कृति का अनुवाद पाठकों के लिए मूल्यवान उपलब्धि है।</p>
<p>—प्रो. चन्द्रकान्त पाटील
Book Details
-
ISBN9788183615006
-
Pages340
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘काव्य’ शब्द संस्कृत में गद्य और पद्य दोनों का द्योतक माना गया है। गुलाबराय इसी ‘गद्य-पद्य’ के साहित्यिक स्वरूप पर विचार करते हुए ‘काव्य के रूप’ में साहित्यालोचन के सिद्धान्तों की चर्चा करते हैं। संस्कृत साहित्य की परम्परा में मूलतः ‘काव्य’ का विभाजन श्रव्य और दृश्य इन्हीं दो रूपों में होता आया है; किन्तु साहित्यिक विधाओं की आपसी विभाजन रेखा को परिभाषित करना और उनके बीच के अन्तर को उद्घाटित करना अत्यन्त सूक्ष्म कार्य है जिसे इस पुस्तक में थोड़ी स्थूलता प्रदान की गई है। गुलाबराय अपने विचारों को साहित्य की भारतीय और पाश्चात्य परम्परा के सैद्धान्तिक निकष पर परखते हुए ‘काव्य के रूप’ में न केवल साहित्यिक विधाओं के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करते हैं बल्कि विधाओं के विकासक्रम के संक्षिप्त इतिहास पर भी दृष्टि डालते हैं। दृष्टिपूर्ण ढंग से ‘काव्य के रूप’ पुस्तक का आरम्भ, मध्य और समापन युक्तियुक्त प्रासंगिकता को सृजित करता है, जो आलोचना के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक धरातल पर साहित्य के स्वरूप के विविध पक्षों को अपने में समेटे हुए है। साहित्य के विधागत स्वरूप और उसके विकासक्रम से परिचय करानेवाला यह प्राथमिक कार्य गुलाबराय द्वारा साहित्यालोचन के सृजनात्मक अवदान को प्रतिफलित करता है, जो इस पुस्तक को साहित्य के मूल्यांकन के स्तर पर अधिक समीचीन बनाएगा।
Aapda Prabandhan
- Author Name:
Shiv Gopal Mishra
- Book Type:

- Description: "आपदा प्रबंधन-शिवगोपाल मिश्र ‘आपदा’ (Disaster) एक ऐसी असामान्य घटना है, जो सीमित अवधि के लिए आती है, किंतु किसी भूभाग या देश की अर्थव्यवस्था को छिन्न-छिन्न कर देती है। अव्यवस्थित तंत्र के बल पर आपदाओं का सामना नहीं किया जा सकता। पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के प्रयास किए जाते रहे हैं। संप्रति आपदा प्रबंधन बहुआयामी व्यवस्था बन चुकी है, जो अधुनातन प्रौद्योगिकी की सहायता लेकर कम-से-कम समय में आपदाओं की पूर्व सूचना, चेतावनी, बचाव, राहत, पुनर्वास आदि के साधन जुटाती है। वर्तमान युग में आपदा प्रबंधन की महत्ता सर्वस्वीकृत है। अब तक हिंदी में ‘आपदा प्रबंधन’ पर कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं थी, अत: चित्रों से सुसज्जित यह पुस्तक इस अभाव की पूर्ति है। पुस्तक को तीन खंडों में विभाजित किया गया है। प्रथम खंड में आपदा प्रबंधन की सैद्धांतिक विवेचना है। दूसरे खंड में विविध प्राकृतिक आपदाओं का विवरण तथा दृष्टांत रूप में उनके प्रबंधन का वर्णन है। तृतीय खंड में मानवकृत आपदाओं का विवरण तथा उनका प्रबंधन बताया गया है। अंत में परिशिष्ट खंड में विविध सूचनाप्रद सामग्री संगृहीत है। हिंदी पारिभाषिक शब्दों के अंग्रेजी पर्यायों की सूची भी दी गई है। आशा है, पाठकों के लिए यह पुस्तक जानकारीपरक, रोचक एवं मार्गदर्शन करने वाली सिद्ध होगी। "
Kissa Loktantra
- Author Name:
Vibhuti Narayan Rai
- Book Type:

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Description:
दुनिया-भर में श्रेष्ठ कही जानेवाली शासन-प्रणाली यदि ‘क़िस्सा’ बन जाए तो उसकी विश्वसनीयता सहज ही अनेक सवालों के घेरे में आ जाती है। भारतीय लोकतंत्र आज ऐसी ही स्थिति का शिकार है। ‘तंत्र’ के प्रति ‘लोक’ का विश्वास जैसे पूरी तरह डिग गया है।
लेकिन ऐसा हुआ क्यों? भारतीय स्वाधीनता-आन्दोलन के दौरान और आज़ादी के तुरन्त बाद ऐसा कैसे हुआ कि ‘रामराज्य’ का महान आदर्श ‘रावण-राज्य’ में परिणत हो गया? सुपरिचित कथाकार विभूति नारायण राय का यह उपन्यास भारतीय लोकतंत्र के इसी विरूपीकरण का तथ्यात्मक बयान है।
इसकी शुरुआत होती है पी.पी. नामक एक नेता की प्रेस-कांफ्रेंस से और समापन उसके चुनावी जुलूस से। लेकिन इस घटनान्तराल में लेखक ने पी.पी. के अतीत से लेकर वर्तमान तक के जिन कारनामों का उद्घाटन किया है, उससे इस लोकतांत्रिक शासन-पद्धति के आपराधिक आधार को दूर तक समझने में मदद मिलती है। यह पूरा ‘क़िस्सा’ दिलचस्प तो है ही, पाठकीय अनुभव-संवेदन को भी गहरे जाकर झकझोरता है और उस विकल्प की ओर इंगित भी करता है, जब एक निहत्था आदमी जन-बल के भरोसे ख़ूँखार शेर की आँखों में आँखें डालने का साहस जुटाकर उठ खड़ा होगा।
कहने की आवश्यकता नहीं कि एक भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र पर यह उपन्यास बेहद तीखी, लेकिन पूरी तरह जनतांत्रिक टिप्पणी है।
Kissa Chamcham Pari Aur Gudiyaghar Ka
- Author Name:
Prakash Manu
- Book Type:

- Description: हिंदी बाल साहित्य का पर्याय कहे जानेवाले प्रकाश मनु बच्चों के सिरमौर कथाकार हैं, जिनकी कहानियों और उपन्यासों को बच्चे खोज-खोजकर पढ़ते हैं। देश के कोने-कोने में फैले हजारों बच्चे उनके प्रशंसक हैं, जिन्हें मनुजी की कहानियों और नटखटपन से भरे उपन्यासों का इंतजार रहता है। उन्हें वे बड़ी दीवानगी से पढ़ते हैं, मन-ही-मन सराहते और आनंदविभोर हो उठते हैं। ‘किस्सा चमचम परी और गुडि़याघर का’ प्रकाश मनुजी के बाल उपन्यासों का ताजा संग्रह है, जिसमें बच्चों के लिए लिखे गए उनके तीन रोचक और बहुरंगी उपन्यास शामिल हैं—‘किस्सा चमचम परी और गुडि़याघर का’, ‘फागुन गाँव का बुधना और निम्मा परी’, तथा ‘सब्जियों का मेला’। ये तीनों इतने रसपूर्ण उपन्यास हैं, कि बच्चे एक बार पुस्तक हाथ में लेंगे, तो पूरा पढ़े बगैर छोड़ नहीं पाएँगे। प्रकाश मनुजी उस्ताद किस्सागो हैं, इसीलिए उनके बाल उपन्यासों में किस्सागोई का जादू पाठकों पर इस कदर तारी होता है कि लगता है, उपन्यास के पात्र सजीव होकर, उनके आसपास ही साँस ले रहे हैं। फिर इन तीनों उपन्यासों में धरती की सुंदरता की बड़ी अद्भुत छवियाँ हैं, जो बाल पाठकों को खूब लुभाएँगी और आनंदमग्न कर देंगी। बेशक, प्रकाश मनुजी के बाल उपन्यासों की यह दिलचस्प पुस्तक बच्चों और बाल साहित्यकारों के लिए एक अनमोल उपहार से कम नहीं है, जिसे वे हमेशा सँजोकर रखेंगे।
Chandrakanta Santati : Vols. 1-6
- Author Name:
Devakinandan Khatri
- Book Type:

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Description:
‘चन्द्रकान्ता’ का प्रकाशन 1888 में हुआ। ‘चन्द्रकान्ता’, ‘सन्तति’, ‘भूतनाथ’—यानी सब मिलाकर एक ही किताब। पिछली पीढ़ियों का शायद ही कोई पढ़ा-बेपढ़ा व्यक्ति होगा जिसने छिपाकर, चुराकर, सुनकर या ख़ुद ही गर्दन ताने आँखें गड़ाए इस किताब को न पढ़ा हो। चन्द्रकान्ता पाठ्य-कथा है और इसकी बुनावट तो इतनी जटिल या कल्पना इतनी विराट है कि कम ही हिन्दी उपन्यासों की हो।
अद्भुत और अद्वितीय याददाश्त और कल्पना के स्वामी हैं—बाबू देवकीनन्दन खत्री। पहले या तीसरे हिस्से में दी गई एक रहस्यमय गुत्थी का सूत्र उन्हें इक्कीसवें हिस्से में उठाना है, यह उन्हें मालूम है। अपने घटना-स्थलों की पूरी बनावट, दिशाएँ उन्हें हमेशा याद रहती हैं। बीसियों दरवाज़ों, झरोखों, छज्जों, खिड़कियों, सुरंगों, सीढ़ियों...सभी की स्थिति उनके सामने एकदम स्पष्ट है। खत्री जी के नायक-नायिकाओं में ‘शास्त्रसम्मत’ आदर्श प्यार तो भरपूर है ही।
कितने प्रतीकात्मक लगते हैं ‘चन्द्रकान्ता’ के मठों-मन्दिरों के खँडहर और सुनसान, अँधेरी, ख़ौफ़नाक रातें।—ऊपर से शान्त, सुनसान और उजाड़-निर्जन, मगर सब कुछ भयानक जालसाज हरकतों से भरा...हर पल काले और सफ़ेद की छीना-झपटी, आँख-मिचौनी।
खत्री जी के ये सारे तिलिस्मी चमत्कार, ये आदर्शवादी परम नीतिवान, न्यायप्रिय सत्यनिष्ठावान राजा और राजकुमार, परियों जैसी ख़ूबसूरत और अबला नारियाँ या बिजली की फुर्ती से ज़मीन-आसमान एक कर डालनेवाले ऐयार सब एक ख़ूबसूरत स्वप्न का ही प्रक्षेपण हैं।
‘चन्द्रकान्ता’ को आस्था और विश्वास के युग से तर्क और कार्य-कारण के युग में संक्रमण का दिलचस्प उदाहरण भी माना जा सकता है।
—राजेन्द्र यादव
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