Parampara Ka Mulyankan
Author:
Ramvilas SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 716
₹
895
Available
प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में परम्परा-बोध एक बुनियादी मूल्य है, फिर चाहे इसे साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रखा-परखा जाए अथवा समाज के। दूसरे शब्दों में बिना साहित्यिक परम्परा को समझे न तो प्रगतिशील आलोचना और साहित्य की रचना हो सकती है और न ही अपनी ऐतिहासिक परम्परा से अलग रहकर कोई बड़ा सामाजिक बदलाव सम्भव है। लेकिन परम्परा में जो उपयोगी और सार्थक है, उसे उसका मूल्यांकन किए बिना नहीं अपनाया जा सकता।</p>
<p>यह पुस्तक परम्परा के इसी उपयोगी और सार्थक की तलाश का प्रतिफलन है।</p>
<p>सुविख्यात समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने जहाँ इसमें हिन्दी जाति के सांस्कृतिक इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की है, वहीं अपने-अपने युग में विशिष्ट भवभूति और तुलसी की लोकाभिमुख काव्य-चेतना का विस्तृत मूल्यांकन किया है। तुलसी के भक्तिकाव्य के सामाजिक मूल्यों का उद्घाटन करते हुए उनका कहना है कि दरिद्रता पर जितना अकेले तुलसीदास ने लिखा है, उतना हिन्दी के समस्त नए-पुराने कवियों ने मिलकर न लिखा होगा। भवभूति के सन्दर्भ में रामविलास जी का यह निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण है कि ‘यूनानी नाटककारों की देवसापेक्ष न्याय-व्यवस्था की जगह देवनिरपेक्ष न्याय-व्यवस्था का चित्रण शेक्सपियर से पहले भवभूति ने किया’ और रामायण-महाभारत के नायकों के विषय में यह कि ‘राम और कृष्ण दोनों श्याम वर्ण के पुरुष हैं’।</p>
<p>वस्तुतः इस कृति में, आधुनिक साहित्य के जनवादी मूल्यों के सन्दर्भ में, प्राचीन, मध्यकालीन और समकालीन भारतीय साहित्य में अभिव्यक्त संघर्षशील जनचेतना के उस विकासमान स्वरूप की पुष्टि हुई है जो शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमिक जनता के हितों को प्रतिबिम्बित करता रहा है।
ISBN: 9788126704422
Pages: 270
Avg Reading Time: 9 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आलोचक किसी कृति के सौन्दर्य-विमर्श में उसके मर्म से लेकर उसके रूप-विन्यास, शब्द संयोजन, अलंकृति आदि तत्त्वों की तलाश में एक नई सृष्टि का सर्जना करता है। संस्कृत में एक उक्ति है :
पंडित या आलोचक ही काव्य के रस को जानता है और 'रस' में ही सौन्दर्य और लावण्य है। काव्य-रस या काव्य-सौन्दर्य का भोक्ता तो कोई भी सहृदय पाठक होता है पर उसका विशिष्ट भोक्ता और उस भोज्य को पचाकर उसके सौन्दर्य की वस्तु-व्यंजना से लेकर उसकी बारीक अन्तरंग परतों को उद्घाटित करने का काम आलोचक करता है। आलोचना में प्रचलित समाज-विमर्श, मनोविमर्श, दलित-विमर्श, नारी-विमर्श आदि सभी विमर्शों का केन्द्रीय तत्त्व सौन्दर्य-विमर्श ही है।
भारतीय कला-दृष्टि, रस-दृष्टि रही है। यह दृष्टि भाववादी दृष्टि ही नहीं, महाभाववादी दृष्टि है। यह महाभाव ही हमारी आलोचना के आर्ष चिन्तन से लेकर अद्यतन वैचारिकी का केन्द्र बिन्दु है। हमने प्रत्यक्ष गोचर से लेकर उसमें अन्तर्निहित सूक्ष्म चेतन सौन्दर्य का विशेष चिन्तन किया। उपनिषद में ‘सत्यधर्म’ के प्रसंग में कहा गया है कि बाह्य जगत सुन्दर तो है, पर उस सुन्दर स्वर्णपात्र की आभा के आवरण के भीतर सत्यधर्म का प्रभावमय सूर्य छिपा है।
Sahitya Aur Bhartiya Ekta
- Author Name:
Shivshankari
- Book Type:

- Description: साहित्य और भारतीय एकता’ (निट् इंडिया थ्रू लिटरेचर) एक वृहत् आयोजन है। यह पुस्तक इस आयोजन का प्रथम खंड है, जिसे तमिल और अंग्रेज़ी के बाद अब हिन्दी में अनूदित किया गया है। ‘साहित्य और भारतीय एकता’ के माध्यम से लेखिका शिवशंकरी भारतीय संस्कृति तथा साहित्य के आधार पर देशवासियों को आपस में जोड़ना चाहती हैं। इस महान उद्यम की सफलता के लिए उन्होंने देश के अनेक प्रान्तों का भ्रमण किया, अनेक कलात्मक और सांस्कृतिक रूपों का अध्ययन किया, सम्बद्ध भारतीय भाषाओं के समृद्ध साहित्य का गहन अनुसंधान भी किया; साथ ही प्रत्येक भाषा से सम्बद्ध अनेक प्रमुख लेखक-लेखिकाओं के साथ साक्षात्कार भी किए, हर भाषा की उत्कृष्ट प्रतिनिधि साहित्यिक रचनाओं का चयन किया और इनका अति उत्तम भाषान्तर भी करवाया। लेखिका के यात्रा-संस्मरणों, साक्षात्कारों और प्रत्येक भाषा से सम्बद्ध साहित्यिक विचारों के इस समायोजन से प्रकट होती है एक अखंड एकता, साथ ही हमारे लेखकों और कवियों के द्वारा अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किए जानेवाले वह विचार भी इसमें शामिल हैं जो हमारे देश के सामने स्थित उग्र समस्याओं को रेखांकित करते हैं, जैसे—ग़रीबी, अज्ञान, वर्ग, वर्ण एवं स्त्री-पुरुष का भेदभाव, आधुनिकता की चुनौतियाँ, धार्मिक पुनरुत्थान, कट्टरवाद, अन्धविश्वास तथा असहिष्णुता, नैतिकता के प्रति अनादर, हिंसा एवं गांधी जी के मूल्यों का क्षरण। लेखिका का विश्वास है कि इस आयोजन के द्वारा लेखक अपनी रचनाओं के साथ बृहत् पाठक-समुदाय तक पहुँचकर इन समस्याओं के उन्मूलन में अपना योगदान कर पाएँगे। इस खंड में शिवशंकरी ने दक्षिण भारत पर ध्यान केन्द्रित करते हुए केरल, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु राज्यों एवं उनके साहित्य का अवलोकन किया है। इस खंड में समाहित 27 साक्षात्कार, लेखकों की साहित्यिक कृतियों के 25 उत्कृष्ट उद्धरण और उनमें व्यक्त विचार दक्षिण भारत में सृजनरत मनीषा का एक विश्वसनीय ब्योरा हिन्दी पाठकों के सम्मुख उपलब्ध कराएँगे।
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