Parampara Ka Mulyankan
Author:
Ramvilas SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 716
₹
895
Available
प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में परम्परा-बोध एक बुनियादी मूल्य है, फिर चाहे इसे साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रखा-परखा जाए अथवा समाज के। दूसरे शब्दों में बिना साहित्यिक परम्परा को समझे न तो प्रगतिशील आलोचना और साहित्य की रचना हो सकती है और न ही अपनी ऐतिहासिक परम्परा से अलग रहकर कोई बड़ा सामाजिक बदलाव सम्भव है। लेकिन परम्परा में जो उपयोगी और सार्थक है, उसे उसका मूल्यांकन किए बिना नहीं अपनाया जा सकता।</p>
<p>यह पुस्तक परम्परा के इसी उपयोगी और सार्थक की तलाश का प्रतिफलन है।</p>
<p>सुविख्यात समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने जहाँ इसमें हिन्दी जाति के सांस्कृतिक इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की है, वहीं अपने-अपने युग में विशिष्ट भवभूति और तुलसी की लोकाभिमुख काव्य-चेतना का विस्तृत मूल्यांकन किया है। तुलसी के भक्तिकाव्य के सामाजिक मूल्यों का उद्घाटन करते हुए उनका कहना है कि दरिद्रता पर जितना अकेले तुलसीदास ने लिखा है, उतना हिन्दी के समस्त नए-पुराने कवियों ने मिलकर न लिखा होगा। भवभूति के सन्दर्भ में रामविलास जी का यह निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण है कि ‘यूनानी नाटककारों की देवसापेक्ष न्याय-व्यवस्था की जगह देवनिरपेक्ष न्याय-व्यवस्था का चित्रण शेक्सपियर से पहले भवभूति ने किया’ और रामायण-महाभारत के नायकों के विषय में यह कि ‘राम और कृष्ण दोनों श्याम वर्ण के पुरुष हैं’।</p>
<p>वस्तुतः इस कृति में, आधुनिक साहित्य के जनवादी मूल्यों के सन्दर्भ में, प्राचीन, मध्यकालीन और समकालीन भारतीय साहित्य में अभिव्यक्त संघर्षशील जनचेतना के उस विकासमान स्वरूप की पुष्टि हुई है जो शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमिक जनता के हितों को प्रतिबिम्बित करता रहा है।
ISBN: 9788126704422
Pages: 270
Avg Reading Time: 9 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Hindi Sahitya Ka Itihas Punarlekhan Ki Avashyakta
- Author Name:
Pukhraj Maroo
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य-लेखन की रामकथा के वाल्मीकि हैं, कोई भी साहित्येतिहासकार उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता। यह कहना अनुचित न होगा कि आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल की जैसी रंगारंग और जीवित पारदर्शियाँ हमें उनके इतिहास में मिलती हैं, वैसी आधुनिक साहित्य के बारे में नहीं मिलती हैं। इस दृष्टि से हिन्दी साहित्येतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता महसूस की जाती है।
इसके अलावा शुक्ल जी के बाद कई दशकों में फैला तकनीक क्रान्ति, और संचार तथा सूचनाओं का विस्फोटक दौर हमारे सामने है। इन वर्षों का हिन्दी साहित्य भाषा की दृष्टि से, अनुभव की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से अत्यन्त विविध और सम्पन्न साहित्य है। सभ्यता, संस्कृति और विश्व-साहित्य के संगम-काल के इस साहित्य का विवेचन और दस्तावेज़ीकरण भी अब एक बड़ी आवश्यकता है।
यह पुस्तक ऐसे ही अन्य घटकों पर भी नज़र डालती है जो साहित्येतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। साथ ही इसमें इतिहास-लेखन के अब तक के इतिहास के हर चरण को विस्तार से विवेचित किया गया है जो अध्येताओं और विद्यार्थियों के लिए विशेष पठनीय है। आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास के बाद हिन्दी में साहित्येतिहास-लेखन के जो अन्य प्रयास हुए उनका विशद विश्लेषण और तथ्यगत जानकारी भी दी गई है। आधुनिक हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं, और इतिहास-लेखन की दृष्टि से उनका मूल्यांकन भी लेखक ने किया है।
Nirmal Verma
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
यह पुस्तक ‘पूर्वग्रह’ में प्रकाशित निबन्धों और अन्य सामग्री का एक संचयन है। इसमें वरिष्ठ और युवा हिन्दी आलोचकों के अलावा दार्शनिक, समाजशास्त्री, और इतिहासकार द्वारा भी निर्मल वर्मा के साहित्य का विश्लेषण और विचार शामिल है, जो कि हिन्दी में यदा-कदा ही सम्भव हो पाया है।
इस पुस्तक में चौदह लेखक एकाग्र हैं एक लेखक या उसकी किसी कृति पर। आप पाएँगे कि हालाँकि उनमें गम्भरता और ज़िम्मेदारी का सहकार है, हरेक अपने ढंग से हमारे युग के एक मूर्धन्य लेखक या उसकी किसी कृति या अवधारणा को देख-परख रहा है और इस साक्षात्कार या मुठभेड़ से कुछ अर्थपूर्ण और विचारोत्तेजक हमारे लिए पा रहा है।
—अशोक वाजपेयी
Stree Adhyayan Ki Buniyad
- Author Name:
Pramila K.P.
- Book Type:

-
Description:
इस पुस्तक में स्त्री-विमर्श के शुरुआती इतिहास, और विश्व में विभिन्न चरणों में उसका विकास कैसे हुआ, इसका तथ्यात्मक ब्योरा दर्ज किया गया है। तदुपरान्त हिन्दी साहित्य, विशेषतया कहानी में आज यह विमर्श किस तरह व्यक्त हो रहा है, उसका भी बेबाक विश्लेषण किया गया है।
अठारहवीं सदी में यूरोप में शुरू हुआ नारीवादी चिन्तन कई धाराओं में विकास की मौजूदा स्थिति तक पहुँचा है। उदारवादी नारीवाद समाज के व्यापक सरोकारों को समेटकर चलता है तो उग्रवादी नारीवाद सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन का हिमायती रहा है। इनके साथ मार्क्सवादी तथा अश्वेत नारीवाद की धाराएँ भी रहीं, और समाजवादी नारीवाद भी देखने में आया। ग़रज़ कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में जो चिन्ता समूचे विश्व में सबसे व्यापक रही, वह स्त्री की अस्मिता, उसके अधिकारों के इर्द-गिर्द स्थित रही और इसका परिणाम है कि आज कुछ चिन्तक 21वीं सदी को स्त्रियों की सदी कह रहे हैं और नारीवादी विमर्श अलग-अलग समाजों में यौन-राजनीति के अलग-अलग पहलुओं को समझने के लिए जूझ रहा है।
यह पुस्तक इस विमर्श के बनने-बढ़ने के इतिहास को जानने-समझने में बेहद सहायक होगी।
Doosari Parampra Ki Khoj
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
‘दूसरी परम्परा की खोज’ में नामवर सिंह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति और साहित्य की उस लोकोन्मुखी क्रान्तिकारी परम्परा को खोजने का सर्जनात्मक प्रयास करते हैं जो कबीर के विद्रोह के साथ ही सूरदास के माधुर्य और कालिदास के लालित्य से रंगारंग है।
आठ अध्यायों वाली इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय का प्रस्थान-बिन्दु आचार्य द्विवेदी की कोई-न-कोई कृति है, किन्तु यह पुस्तक उन कृतियों की व्याख्या मात्र नहीं है और न उनके मूल्यांकन का प्रयास है बल्कि उनके माध्यम से उस मौलिक इतिहास-दृष्टि के उन्मेष को पकड़ने की कोशिश की गई है जिसके आलोक में समूची परम्परा एक नए अर्थ के साथ उद्भासित हो उठती है।
‘दूसरी परम्परा की खोज’ से एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जो अपनी सहजता में मोहक है, अपने संघर्ष और पराजय में भी गरिमामय है और अपनी मानव-आस्था में परम्परा के सर्वोत्तम मूल्यों का साक्षात् विग्रह है—कुटज के समान साधारण होते हुए भी मनस्वी और देवदारु के समान मस्ती से झूलते हुए भी अभिजात तथा अपनी ऊँचाइयों में एकाकी। आलोचना कितनी सर्जनात्मक हो सकती है, इसका उदाहरण है—‘दूसरी परम्परा की खोज’।
Hindi Ki Jatiya Sanskriti Aur Aupniveshikta
- Author Name:
Rajkumar
- Book Type:

- Description: हिन्दी की जातीय संस्कृति और औपनिवेशिकता एक ऐसा विषय है जिस पर लगातार कई दृष्टियों से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि ऐसे वैचारिक अनुसन्धान से ही हम उन कई प्रश्नों के उत्तर पा सकते हैं जो हमें बेचैन किए रहते हैं। हिन्दी में बार-बार व्याप रही विस्मृति, जातीय स्मृति की अनुपस्थिति आदि ऐसे कई पक्ष हैं जो आलोचना के ध्यान में बराबर रहने चाहिए। डॉ. राजकुमार की यह नई पुस्तक ऐसे आलोचनात्मक उद्यम की ही उपज है और हम उसे सहर्ष प्रकाशित कर रहे हैं।
Mahapran Nirala
- Author Name:
Ganga Prasad Pandey
- Book Type:

-
Description:
निराला हमारे उन कालजयी कवियों में से हैं जिनके जीवन और कृतित्व के बारे में जानने-समझने की हमारी जिज्ञासा लगातार बनी रहती है। 'महाप्राण निराला' बहुत पहले प्रकाशित हुई थी जिसमें महादेवी की प्रस्तावना है और स्वयं निराला की हस्तलिपि में उनकी एक टिप्पणी। पुस्तक में आत्मीय संस्मरण और आलोचना का मोहक और सार्थक समन्वय है। यह बरसों से अप्राप्य थी और हमें उसका पुनर्प्रकाशन करते हुए प्रसन्नता है कि उन पर पहली पुस्तकों में से एक हम फिर उपलब्ध करा पा रहे हैं। यह याद करना ज़रूरी है कि निराला को उनकी कठिन ज़िन्दगी और जटिल कविता को समझने की कोशिश हिन्दी आलोचना काफ़ी पहले से करती रही है।
—अशोक वाजपेयी
Samkaleen Hindi Sahitya : Vividh Paridrishya
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

-
Description:
समकालीन हिन्दी साहित्य का आलोचना से सबसे निकट का सम्बन्ध है। वह आलोचना को जितना अभिप्रेरित करता है, उतना ही उसका उपजीव्य होता है। समध्कालीन भूमि पर अपना परीक्षण करके तब आलोचना परम्परा की ओर दृष्टि डालती है, और उससे अपना सम्बन्ध तलाश करती है। सिर्फ़ प्राचीन-मध्यकालीन साहित्य पर लिखकर पंडित हुआ जा सकता है, आलोचक नहीं। आलोचक एक तरह से, एलियट के अर्थ में, समूचे साहित्य का सहवर्तित्व प्रमाणित करता है। इसके लिए अपने समकालीन साहित्य से उसकी अन्तरक्रिया और कृतकृत्यता बुनियादी महत्त्व की होती है।
बीसवीं अर्द्धशताब्दी के आसपास हिन्दी में नई कविता और नवलेखन का जो उत्थान हुआ, उसकी पहली व्यवस्थित आरम्भिक समीक्षा थी ‘हिन्दी नव-लेखन’ जो 1960 में प्रकाशित हुई। स्वतंत्र देश की पहली रचनात्मक अभिव्यक्ति का किसी क़दर सहानुभूतिपूर्ण और परिचयात्मक अध्ययन यहाँ पहली बार हुआ था। फिर अज्ञेय, उनके समवर्ती तथा अज्ञेयोत्तर कृतित्व की वैसे ही नए सन्दर्भों में व्याख्या आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी के कृतित्व का एक मुख्य अंग बन गई। प्रस्तुत कृति में ‘हिन्दी नवलेखन’ से आरम्भ करके आलोचक की दृष्टि समकालीन साहित्य के प्रति कैसे परिष्कृत होती गई, इसका बड़ा सटीक अध्ययन है। फिर यह दृष्टि कैसे समूची साहित्य-परम्परा को देखती है, वह समूचा परिदृश्य सामने आता है। इस अर्थ में आधुनिक आलोचना की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है—‘समकालीन हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’।
Hindi Prayog
- Author Name:
Ramchandra Verma
- Book Type:

-
Description:
किसी भाषा के मानक रूप के निर्धारण में अनेक शताब्दियों का योगदान रहता है। इसलिए उस भाषा के हर शुभचिन्तक को मनमाने प्रयोग करने से बचाना चाहिए। मनमाने प्रयोगों से भाषा का स्वरूप बिगड़ता है और उच्छृंखल प्रयोगों से तो उसकी उपयोगिता तथा विश्वसनीयता भी घटती है। नदी की भाँति भाषा का प्रवाह भी कुछ सीमाओं के भीतर ही भला लगता है।
गत साठ से ज़्यादा वर्षों से वर्मा जी की यह अनोखी कृति ‘हिन्दी प्रयोग’ विद्यार्थियों को अपनी भाषा का स्वरूप परम निर्मल और उज्ज्वल बनाने के लिए प्रेरित करती रही है। असंख्य विद्यार्थियों ने इस पुस्तक से लाभ उठाया है और अपनी भाषा को अशुद्धियों और त्रुटियों से बचाया है। जो लोग अच्छी हिन्दी सीखना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक बड़े काम की चीज़ है। जाने-अनजाने होनेवाली सैकड़ों प्रकार की भूलों से पीछा छुड़ाने में तथा भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने में वर्मा जी की ‘हिन्दी प्रयोग’ आज भी निश्चित रूप से समर्थ है।
Sarjan Aur Rasasvadan : Bhartiya Paksh
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल के अन्तर्गत सन् 1942 तक एक ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘रस मीमांसा लिखकर समसामयिकता के सन्दर्भ में इसके प्रासंगिक कपाटों को खोलने की चेष्टा की है तो दूसरी ओर नई कविता के आन्दोलन ने रस चिन्तन को रूढ़, प्राचीन, अप्रासंगिक, ऐतिहासिक, मृत आदि घोषित करने की चेष्टा की है और अज्ञेय, लक्ष्मीकान्त वर्मा, जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी आदि ने इसे उसकी मूल सत्ता से च्युत किया। आधुनिक हिन्दी साहित्य में रस चिन्तन का यह द्वन्द्व, निश्चित ही एक जटिल बनकर हमारे सामने आता है।
मानव जाति के कलात्मक स्वभाव की यह रागात्मक चेतना भारतीय चिन्तन में रस के रूप में व्याख्यायित हुई है और आज उसे आकस्मिक रूप से नई कविता के कवियों तथा समीक्षकों द्वारा मृत घोषित कर दिया जाना, उनकी तथाकथित आधुनिकता के मोह का प्रतिफल है, जो सर्वथा असंगत है।
यही नहीं, आधुनिक युग के सृजनात्मक विस्तार के बीच रस चिन्तन की व्याप्ति की सम्भावनाओं का पुनर्विश्लेषण आवश्यक है। सृजन का सम्बन्ध केवल साहित्य से ही नहीं है, चित्र, वाद्य, नृत्य, संगीत, स्थापत्य आदि कलाएँ आज जो विस्तार प्राप्त कर रही हैं, उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ आस्वादन की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। सम्पूर्ण कलाओं के आस्वादन फल का ही नाम रस है। मानव मन की रागात्मक चेतना एवं अनुभूति जगत् के विस्तार से रस व्याप्ति की सम्भावनाओं का भी विस्तार हो रहा है और ऐसी स्थिति में, आज उसके बार-बार विश्लेषण की आवश्यकता है, नकारने या पलायन की नहीं।
इस प्रकार, इस कृति का मूल मन्तव्य है, आज की निषेधवादी विचारधाराओं का खंडन करते हुए इसकी सामयिक प्रासंगिकता का विश्लेषण।
Anuvad : Avadharna evam vimarsh
- Author Name:
Shrinarayan Sameer
- Book Type:

- Description: नवोन्मेष तथा सृजनशीलता को अनुवाद का स्वभाव घोषित करनेवाली यह किताब अनुवाद को दो भिन्न समुदायों, राष्ट्रीयताओं और देशों को समझने एवं उनके मत-मतान्तरों को जानने का ज़रूरी औजार मानती है। फलस्वरूप यह अनुवाद को भाषा-संवाद मानने की प्रचलित मान्यता से आगे बढ़कर उसे सभ्यता-संवाद मानने का तर्क रचती है। इसमें अनुवाद को आधारभूत पहलुओं से समझने और विवेचित करने का प्रयास है। इस प्रयास में अनुवाद की अवधारणा को विखंडनवादी विमर्श के धरातल पर भी रखकर जाँचा-परखा गया है। विवेचन में इस बात की ख़ास सावधानी बरती गई है कि अत्याधुनिकता की चकाचौंध में अनुवाद का कला-कौशल धूमिल न हो जाए, बल्कि उसमें सृजन की लौ सर्वत्र जलती रहे। अक्सर अनुवाद को भाषा-कर्म कहा जाता है, मगर यह भाषा-कर्म कोई सामान्य कर्म नहीं है। मनुष्य-समाज की संवेदना, परम्परा, संघर्ष और सम्पूर्ण जीवन-राग भाषा के नियामक तत्त्व होते हैं। स्वाभाविक है कि अनुवाद के चिन्तन और सरोकार भाषा के नियामक तत्त्वों से जुड़कर गहन और व्यापक हो जाते हैं। शायद इसीलिए अनुवाद में मूलवत् होने की आकांक्षा और वास्तविकता के बीच टकराव मिलता है। किन्तु इस तरह के टकराव को यह किताब भाषा, संस्कृति और सभ्यता के विभाजक छोरों के हवाले नहीं करती, किसी क़िस्म की जिरह से उसका महिमामंडन भी नहीं करती; बल्कि अनुवादकर्ता के कौशल और क़ाबिलियत का विमर्श रचती है। अकारण नहीं, यह किताब अनुवाद को सृजन मानती है—किसी भाषा-सृजन का दूसरी भाषा में सृजन—अनुरचना की शक्ल में मूल रचना की परवर्ती रचना। अनुवाद को रचना का अनश्वर उद्यम घोषित करना निस्सन्देह इस किताब का मौलिक और सर्वथा नया विमर्श माना जाएगा।
Aacharya Ramchandra Shukla : Aalochana Ke Naye Mandand
- Author Name:
Bhavdeo Pandey
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के पहले हिन्दी आलोचना का कोई व्यवस्थित ढाँचा तैयार नहीं हुआ था। कृति के गुण-दोष-दर्शन में दोष ढूँढ़ने का प्रचलन अधिक था। दोष-दर्शन में भी भाषागत त्रुटियों को ज़्यादा महत्त्व दिया जाता था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आलोचना के ऐतिहासिक और समाजशास्त्राीय स्वरूप की प्रस्तुति की और ‘लोक के भीतर ही कविता क्या किसी भी कला का प्रयोजन और विकास होता है’—के सिद्धान्त का निरूपण किया। उन्होंने आलोचना को व्यवस्थित रूप देने के लिए कुछ निश्चित मानदंड स्थापित किए।
यह पुस्तक आचार्य शुक्ल के जीवन, आलोचक के रूप में, के विकास और उनकी दृष्टि का एक सम्पूर्ण ख़ाका खींचने की कोशिश करती है। उनके प्रामाणिक जीवन-वृत्त के साथ ‘बीसवीं शताब्दी का काव्यात्मक आन्दोलन’ (कविता क्या है?); ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’; ‘वैचारिक निबन्धों के प्रथम आचार्य’; ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि’ और ‘उनकी साहित्येतिहास दृष्टि’—इन पाँच अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक आचार्य शुक्ल को समझने और पढ़ने के नए द्वार खोलती है। इसके अलावा डॉ. पांडेय ने गहन शोध के बाद इस पुस्तक में आचार्य शुक्ल से सम्बन्धित अभी तक अनुपलब्ध कई महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ भी जुटाई हैं।
Kabir Ka Yugpath
- Author Name:
Jaipal Singh
- Book Type:

-
Description:
अपने समय में कबीर जनमानस को समझा रहे थे कि पाहन पूजने वाली दुनिया अपने घर की चक्की नहीं पूजती, जिसका पीसा खाती है। तब से लेकर आज तक कबीर के शब्द भारतीय मानस में गूँज रहे हैं। फिर भी दुनिया का पागलपन पहले से ज्यादा बढ़ गया। हमारे समाज में ज्यों-ज्यों अंधविश्वास, मिथ्या आडंबर, रूढ़ियाँ और लंपटता बढ़ती जा रही है, त्यों-त्यों कबीर और अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। जिस संसार को कबीर ने ‘दुनिया ऐसी बावरी’ कहा था, उसमें अब चतुर्दिक्, झूठ का ही बोलबाला है। झूठ ने अपने मिथ्या प्रवाद से सच का मुँह बंद कर दिया है। पूरे संसार में लोकतांत्रिक-मूल्यों का क्षरण हो रहा है। पर आज उनके विपक्ष में खड़ा कबीर-जैसा कोई कवि नहीं है।
भारतीय समाज की बहुसंख्यक जनता कबीर की कृतज्ञ है कि उन्होंने अपनी कविता से हजारों सालों से लोगों के मन पर लदा शास्त्रों के बुद्धि-विलास, परंपरा की जड़ता, अंधविश्वास, अतार्किकता, रूढ़ियों और असत्य धारणाओं का जो बोझ था, उससे निर्भार कर दिया। कबीर ने जनता को शास्त्र नहीं, कविता से शिक्षित किया, साधुता को श्रम से जोड़ा और भिक्षा से मुक्त किया। हजारों वर्ष बीत गए, हमारा अभिजात वर्ग आज भी श्रम को हेय दृष्टि से देखता है। कबीर ने अपनी चादर खुद बुनी और सिद्ध कर दिया कि दूसरे की बुनी चादर ओढ़कर कबीर नहीं बना जा सकता।
‘कबीर का युगपथ’ पुस्तक का प्रणयन जयपाल सिंह ने इसी भाव से किया है। देश की अग्रणी पंक्ति के विद्वानों ने इसमें भागीदारी की है। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह से लेकर प्रो. ए. अरविन्दाक्षन जैसे दो दर्जन विद्वानों ने इस पुस्तक में अपने विचार प्रकट किए हैं। जयपाल ने इस पुस्तक के लिए अथक श्रम किया है, मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक कबीर के अध्येताओं और बृहत्तर भारतीय समाज में प्रशंसित होगी।
—दिनेश कुशवाहा, सुप्रसिद्ध कवि
Samkaleen Kavita Ke Ayam
- Author Name:
P. Ravi
- Book Type:

-
Description:
समकालीन सोच एक ओर समग्रतावादी रुख़ ग्रहण कर सामाजिक परिवर्तन की बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित रखती है तो दूसरी ओर वह व्यक्तिवादी-अस्तित्ववादी न होकर व्यक्ति की अस्मिता के प्रति पूरी तरह सजग रहती है, अस्तित्व के प्रति भी। वह महान क्रान्ति पर नहीं, छोटी-छोटी लड़ाइयों पर आस्था रखती है। इतिहास का अन्त, विचारधारा का अन्त, कविता का अन्त वाली बातों का विरोध भी करती है। इस तरह की बातों को वह नकारात्मक मानव विरोधी सोच कहकर टाल देती है। वैश्वीकरण, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद, साम्प्रदायिकता, अंधाधुंध विकास नीति इत्यादि का विरोध करती है, साथ ही साथ स्त्री, दलित, आदिवासी अस्मिता पर ज़ोर देती है।
समकालीन कविता लगभग इसका अनुसरण करती आ रही है। उसके कई मायने हैं और उन मायनों में एक तत्त्व प्रमुख है, वह है उसकी मानवीय संसक्ति। समकालीन कविता मानवता की तरफ़दारी करके अपने इतिहास का विकास करती आ रही है, मानवता का इतिहास रच रही है। असल में वह समकालीन जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श ही प्रस्तुत करती है। पुराने समाज के समान आज के समाज में शोषक एवं शोषित हैं, लेकिन दोनों को अलग करना कठिन कार्य हो गया है। आज शोषक स्पष्ट दिखाई नहीं देता है, वह कई रूपों-भावों-गंधों-रंगों-रुचियों के रूप में समाज की प्रगति एवं तरफ़दारी का भ्रम फैलाकर अपना काम साधता है। समकालीन कविता इस मायिकता के प्रति मनुष्य एवं समाज को सजग करती है, प्रतिरोध करने की सख़्त ज़रूरत पर बल भी देती है। कहीं-कहीं वह प्रतिरोध के मार्ग की ओर संकेत भी करती है।
Anuvad : Siddhant Avam Vyavahar
- Author Name:
Dr. Jayanti Prasad Nautiyal
- Book Type:

- Description: यद्यपि अनुवाद विषय पर अभी तक लगभग पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, परन्तु सभी की विषय-व्याप्ति अलग-अलग है। विद्यार्थियों को एक ही स्थान पर अनुवाद सम्बन्धी समस्त जानकारी आसान व संक्षिप्त रूप में मिल सके, यह पुस्तक इस उद्देश्य से लिखी गई है। हिन्दी को राजभाषा के रूप में केन्द्रीय सरकार के उपक्रमों, सरकारी कार्यालयों तथा बैंकों में लागू कर दिए जाने से हिन्दी अनुवादक एवं हिन्दी अधिकारी पदों हेतु लिखित परीक्षा में अनुवाद भी दिया जाता है। अत: लिखित परीक्षा देनेवाले अभ्यर्थियों को भी अनुवाद हेतु अधिकतम जानकारी प्राप्त हो सके, इसे भी ध्यान में रखकर कुछ नए अध्याय जोड़े गए हैं। इसके अलावा यह पुस्तक उनके लिए भी उपयोगी होगी जो अनुवाद के क्षेत्र में नए-नए हैं अथवा आरम्भिक स्तर पर अनुवाद शिक्षण से जुड़े हैं, जैसे—बीएड, पाठ्यक्रम व भाषाविज्ञान में डिप्लोमा जैसे विषयों में भी अनुवाद विषय रखा जाता है, अत: इसके स्तर को भी ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी गई है।
Bharatendu Yug Aur Hindi Bhasha Ki Vikas Parampara
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
भारतेन्दु युग हिन्दी साहित्य का सबसे जीवन्त युग रहा है। सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक हर मुद्दे पर तत्कालीन रचनाकारों ने ध्यान दिया और अपना अभिमत व्यक्त किया, जिसमें उनकी राष्ट्रीय और जनवादी दृष्टि का उन्मेष है। वे साहित्यकार अपने देश की मिट्टी से, अपनी जनता से, उस जनता की आशा-आकांक्षाओं से जुड़े हुए थे, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण उनकी रचनाएँ हैं। लेकिन उनकी, उनके युग की इस भूमिका को सही परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने का प्रयास पहली बार डॉ. रामविलास शर्मा ने ही किया। वे ही हिन्दी के पहले आलोचक हैं, जिन्होंने भारतेन्दु-युग में रचे गए साहित्य के जनवादी स्वर को पहचाना और उसका सन्तुलित वैज्ञानिक मूल्यांकन किया।
प्रस्तुत पुस्तक इसीलिए ऐतिहासिक महत्त्व की है कि उसमें भारतेन्दु-युग की सांस्कृतिक विरासत को, उसके जनवादी रूप को पहली बार रेखांकित किया गया है। लेकिन पुस्तक में जैसे एक ओर उस युग में रचे गए साहित्य की मूल प्रेरणाओं और प्रवृत्तियों का विवेचन है, वैसे ही दूसरी ओर प्रायः तीन शताब्दियों के भाषा-सम्बन्धी विकास की रूपरेखा भी प्रस्तुत है, जो डॉ. शर्मा के भाषा-सम्बन्धी गहन अध्ययन का परिणाम है।
Samajik Vimarsh ke Aaine Mein 'Chaak'
- Author Name:
Vijay Bahadur Singh
- Book Type:

-
Description:
रेशम विधवा थी—ज़माने के लिए, रीति-रिवाजों के लिए, शास्त्र-पुराणों के चलते घर और गाँव के लिए। विधवा सिर्फ़ विधवा होती है, वह औरत नहीं रहती—फिर यह बात पता नहीं उसे किसी ने समझाई कि नहीं? और रेशम ने, विधवा रेशम ने गर्भ धारण कर लिया। मगर जब सास ने कौड़ी-सी आँखें निकालकर उसे देखा, यह कहते हुए—‘मेरे बेटा की मौत से दगा करनेवाली, हरजाई, बदकार तेरा मुँह देखने से नरक मिलेगा’, तो रेशम ने कहा—‘आज को तुम्हारा बेटा मेरी जगह होता तो पूछती कि तू किसके संग सोया था?...तुम ख़ुश हो रही होतीं कि पूत की उजड़ी ज़िन्दगी बस गई। पर मेरा फजीता करने पर तुली हो।’
उपन्यास के शुरुआती पृष्ठों पर ही सास और गर्भवती विधवा बहू के बीच यह दृश्य खड़ा कर मैत्रेयी ने पहली बार स्त्री की निगाह से देखने की पहल की है। अन्तत: हिन्दी आलोचना का चला आता सामाजिक व्याकरण यहाँ अचकचा उठता है और आलोचकों को अपना परम्परागत सामाजिक ऑनर याद आने लगता है, जिन्होंने घर-परिवार के घिसे-पिटे और सामाजिक जीवन में लाई जानेवाली फ़ॉर्मूलाई तरक़़ीबों और क्रान्तिभ्रष्ट क्रान्तियों के यथार्थ को अपने किसी साफ़-सुथरे और दिखावटी सच की तरह अब तक पाल-पोस रखा था। मैत्रेयी का लेखन नए सिरे से पढ़ने की ज़मीन तैयार करता है। यह भी पूछने का मन बनाता है कि महादेवी, तुम नीर और भरी दु:ख की बदली क्यों हो? क्यों इस विस्तृत नभ का कोई एक कोना भी तुम्हारा अपना नहीं है? क्या किसी आलोचक ने इसके सामाजिक-आर्थिक आशयों और आधारभूत ज़मीनी सच्चाइयों पर बात करना ज़रूरी माना? मैत्रेयी इस अर्थ में एक समर्पणशील विनयी लेखिका नहीं हैं। उनकी बनावट में यह है ही नहीं। किसी भी क़दम पर वे गुड़िया बनने को तैयार नहीं हैं। ‘चाक’ इस सम्बन्ध में उनके लेखन का घोषणा-पत्र भी है और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी। यही इसका अन्तरंग चरित्र और औपन्यासिक शील भी है।
Hindi Sahitya Beesvin Shatabdi
- Author Name:
Nandulare Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
यह पुस्तक निबन्धों का संग्रह है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रारम्भिक चालीस वर्षों के ही कुछ प्रमुख साहित्यिक व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है। यद्यपि इस समय के सभी प्रमुख साहित्यकार पुस्तक में नहीं आ सके हैं, परन्तु जितने आए हैं, उतने ही इस काल के साहित्य के स्वरूप, उसकी समृद्धि-सीमा और उसकी विकास-दिशा को दिखा देने के लिए पर्याप्त है।
बीसवीं शताब्दी के साहित्य की जिस सामान्य रूपरेखा का उल्लेख किया गया, उससे इस साहित्य का विस्तार और इसकी अनेकरूपता तो प्रकट हुई ही, उसके आलोचन-कार्य को पेचीदगी का भी कुछ-न-कुछ आभास मिला। इन निबन्धों में इस युग के साहित्य की समीक्षा का प्राथमिक प्रयास किया गया है। इसके पहले इस विषय की कोई व्यवस्थित सामग्री उपलब्ध न थी।
ये निबन्ध किसी नियमित क्रम या शैली पर नहीं लिखे गए हैं। लेखकों की सम्पूर्ण रचनाओं को सब समय सामने नहीं रखा गया है। कहीं-कहीं तो किसी एक ही रचना पर पूरा निबन्ध आधारित है (यद्यपि ऐसे निबन्धों में लेखक की अन्य रचनाएँ भी अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान में रही हैं) किसी निबन्ध में किसी लेखक पर प्रशंसात्मक चर्चा की गई है और किसी अन्य पर विरोधी ढंग से लिखा गया है। जिनकी आवश्यकता से अधिक प्रशंसा हो रही थी, उनके सम्बन्ध में दूसरे पक्ष को सामने रखा गया है। इसमें लक्ष्य लेखकों की स्थिति में सामंजस्य स्थापित करने का रहा है। किन्तु प्रशंसा या अप्रशंसा द्वारा भी रचयिता के व्यक्तित्व को सीमित और साकार करने की चेष्टा ही मुख्य रही है। इस प्रकार अनुकूल या प्रतिकूल विवेचन से लेखकों की वास्तविक रचना-क्षमता ही स्पष्ट हुई है।
Premchand Ki Virasat Aur Godan
- Author Name:
Shivkumar Mishra
- Book Type:

-
Description:
‘गोदान’ मूलत: ग्राम-केन्द्रित उपन्यास है और उसी रूप में मान्य भी है। ‘गोदान’ में
ग्राम और नगर की इन दुहरी कथाओं को लेकर उसके रचना-काल से तरह-तरह के सवाल और विवाद
उठाए गए हैं तथा दोनों के समुचित संयोजन पर भी प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं। उपन्यास में गाँव की
कथावस्तु के साथ नगर की कथा को जोड़ने में प्रेमचन्द का उद्देश्य क्या था, और दोनों के संयोजन
में वे कहाँ तक अपने संवेदनात्मक उद्देश्य को पूरा कर सके।
‘गोदान’, हिन्दी कथा-साहित्य को प्रेमचन्द की बहुत महत्त्वपूर्ण देन है। उसे साहित्य के क्षेत्र में एक
‘क्लासिक’ का स्थान मिला है। अपने गहन संवेदनात्मक गुण और अपने निहायत सादे किन्तु
अतिशय प्रभावशाली रचना-शिल्प के नाते उपन्यास के भावी विकास को मानक के तौर पर स्वीकार
किया गया है। उपन्यास के परवर्ती विकास में उसकी छाप और उसके प्रतिचित्र आसानी से देखे और
परखे जा सकते हैं।
Premchand : Ek Vivechan
- Author Name:
Indranath Madan
- Book Type:

-
Description:
प्रेमचन्द हिन्दी के ऐसे श्रेष्ठतम उपन्यासकार हैं, जिनके ग्रन्थों में दमन और उत्पीड़न के युग के समाज की अवस्था का यथार्थ चित्रण और प्रतिबिम्ब मिलता है। उन्होंने उन समस्याओं और मान्यताओं का स्पष्ट चित्र अंकित किया है जो मध्यवर्ग, ज़मींदार, पूँजीपति, किसान, मज़दूर, अछूत और समाज से बहिष्कृत व्यक्तियों के जीवन को संचालित करती हैं। उन्होंने किसानों के मानसिक गठन और मध्यवर्ग के दृष्टिकोण को उस समय गम्भीर विश्वास और उत्साह के साथ वाणी दी, जिस समय इस देश के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो रहे थे। जिस वर्ग-संघर्ष को उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में स्पष्टता से चित्रित किया है, उसी वर्ग-संघर्ष की दृष्टि से प्रस्तुत पुस्तक में उनकी कला का विवेचन और उनके मस्तिष्क का अध्ययन करने का प्रयास किया गया है। प्रेमचन्द के समस्त उपन्यासों और कुछ प्रतिनिधि कहानियों का अध्ययन प्रस्तुत करनेवाली महत्त्वपूर्ण पुस्तक है यह।
Hindi Sahitya : Srishti Aur Drishti
- Author Name:
Sadanand Prasad Gupt
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने वक्तव्य में कहा है, 'हमें अपनी दृष्टि से दूसरे देशों के इतिहास को देखना होगा, दूसरे देशों की दृष्टि से अपने इतिहास को नहीं।'
इस दृष्टि से 'राष्ट्रीयता की भारतीय अवधारणा' तथा 'राष्ट्रीय चेतना' को देखा जा सकता है। पश्चिम में राष्ट्रीयता को जिस रूप में परिभाषित किया जाता रहा है, भारतीय परम्परा में उससे भिन्न अवधारणा विकसित हुई है। जहाँ पश्चिम की राष्ट्रीयता राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करती है वहीं भारत में राष्ट्रीयता की अवधारणा सांस्कृतिक उद्देश्यों से परिचालित है और उसका अधिष्ठान आध्यात्मिक है।
पुस्तक में छायावादी कवियों में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला को वामपंथी खाँचों के भीतर मूल्यांकित करने के प्रयास हुए हैं जबकि निराला को समग्रता में पढ़ा जाय तो स्पष्ट होता है कि उनका साहित्य भारतीय परम्परा का पुनराख्यान और विकास है।
सच्चिदानन्द वात्स्यायन अज्ञेय, निर्मल वर्मा तथा रमेशचन्द्र शाह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के ऐसे विचारक रचनाकार हैं, जिन्होंने पश्चिम के बौद्धिक जगत के समक्ष भारतीय चिन्तन परम्परा के वैशिष्ट्य को आत्मविश्वास के साथ आधुनिक परिप्रेक्ष्य में रखा।
भारतीय ज्ञान एवं साधना परंपरा के वैशिष्ट्य को रूपायित करने और सम्पूर्ण भारतीय समाज को दिशा देने में नाथपंथ तथा उसके प्रवर्तक के रूप में महायोगी गुरु गोरखनाथ का सर्वाधिक योगदान है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीति के विरले ऐसे शिखर पुरुष रहे हैं, जिनके चिंतन की दिशा पश्चिमोन्मुख नहीं रही है, उनपर भारतीय अद्वैत दर्शन का गहरा प्रभाव है। इसलिए इस पुस्तक में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को विवेचन का विषय बनाया गया है। भारतेन्दु-युग के तेजस्वी रचनाकार राधाचरण गोस्वामी और द्विवेदी युग के महत्त्वपूर्ण कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के रचनाकार व्यक्तित्व से सम्बन्धित आलेख को इस पुस्तक में स्थान दिया गया है।
Customer Reviews
0 out of 5
Book
Be the first to write a review...