Manak Hindi Ke Shuddh Prayog : Vol. 4
Author:
Ramesh Chandra MahrotraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 636
₹
795
Available
सशक्त अभिव्यक्ति के लिए समर्थ हिन्दी चाहिए।</p>
<p>इस नए ढंग के व्यवहार–कोश में पाठकों को अपनी हिन्दी निखारने के लिए हज़ारों शब्दों के बारे में बहुपक्षीय भाषा–सामग्री मिलेगी। इसमें वर्तनी की व्यवस्था मिलेगी, उच्चारण के संकेत–बिन्दु मिलेंगे, व्युत्पत्ति पर टिप्पणियाँ मिलेंगी, व्याकरण के तथ्य मिलेंगे, सूक्ष्म अर्थभेद मिलेंगे, पर्याय और विपर्याय मिलेंगे, संस्कृत का आशीर्वाद मिलेगा, उर्दू और अंग्रेज़ी का स्वाद मिलेगा, प्रयोग के उदाहरण मिलेंगे, शुद्ध–अशुद्ध का निर्णय मिलेगा।</p>
<p>पुस्तक की शैली ललित निबन्धात्मक है। इसमें कथ्य को समझाने और गुत्थियों को सुलझाने के दौरान कठिन और शुष्क अंशों को सरल और रसयुक्त बनाने के लिहाज़ से मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रिय गानों की लाइनों, कहानी–क़िस्सों, चुटकुलों और व्यंग्य का भी सहारा लिया गया है। नमूने देखिए, स्त्रीलिंग ‘दाद’ (प्रशंसा) सब को अच्छी लगती है, पर पुर्लिंग ‘दाद’ (चर्मरोग) केवल चर्मरोग के डॉक्टरों को अच्छा लगता है।…‘मैल, मैला, मलिन’ सब ‘मल’ के भाई–बन्धु हैं…(‘साइकिल’ को) ‘साईकील’ लिखनेवाले महानुभाव तो किसी हिन्दी–प्रेमी के निश्चित रूप से प्राण ले लेंगे—दुबले को दो असाढ़। ...अरबी का ‘नसीब’ भी ‘हिस्सा’ और ‘भाग्य’ दोनों है। उदाहरण—आपके नसीब में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं। (जबकि मेरे नसीब में मेरी पत्नी हैं।)</p>
<p>यह पुस्तक हिन्दी के हर वर्ग और स्तर के पाठक के लिए उपयोगी है।
ISBN: 9788171194711
Pages: 170
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: आज-कल देश में हिन्दी का जितना अधिक मान है और उसके प्रति जन-साधारण का जितना अधिक अनुराग है, उसे देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारी भाषा सचमुच राष्ट्र-भाषा के पद पर आसीन होती जा रही है। लोग गला फाड़कर चिल्लाते हैं कि राज-काज में, रेडियो में, देशी रियासतों में सब जगह हिन्दी का प्रचार करना चाहिए, पर वे कभी आँख उठाकर यह नहीं देखते कि हम स्वयं कैसी हिन्दी लिखते हैं। मैं ऐसे लोगों को बतलाना चाहता हूँ कि, हमारी भाषा में उच्छृंखलता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। किसी को हमारी भाषा का कलेवर विकृत करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। देह के अनेक ऐसे प्रान्तों में हिन्दी का ज़ोरों से प्रचार हो रहा है, जहाँ की मात्र-भाषा हिन्दी नहीं है। अतः हिन्दी का स्वरूप निश्चित और स्थिर करने का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व उत्तर भारत के हिन्दी लेखकों पर ही है। उन्हें यह सोचना चाहिए कि हमारी लिखी हुई भद्दी, अशुद्ध और बे-मुहावरे भाषा का अन्य प्रान्तवालों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, और भाषा के क्षेत्र में हमारा यह पतन उन लोगों को कहाँ ले जाकर पटकेगा। इसी बात का ध्यान रखते हुए पूज्य अम्बिका प्रसाद जी वाजपेयी ने कुछ दिन पहले हिन्दी के एक प्रसिद्ध लेखक और प्रचारक से कहा था, "आप अन्य प्रान्तों के निवासियों को हिन्दी पढ़ा रहे हैं और उन्हें अपना व्याकरण भी दे रहे हैं, पर जल्दी ही वह समय आएगा, जबकि वही लोग आपके ही व्यकारण से आपकी भूल दिखाएँगे!" यह मानो भाषा की अशुद्धियों वाले व्यापक तत्त्व की और गूढ़ संकेत था। जब हमारी समझ में यह तत्त्व अच्छी तरह आ जाएगा, तब हम भाषा लिखने में बहुत सचेत होने लगेंगे। और मैं समझता हूँ कि हमारी भाषा की वास्तविक उन्नति का आरम्भ भी उसी दिन से होगा। भाषा वह साधन है, जिससे हम अपने मन के भाव दूसरों पर प्रकट करते हैं। वस्तुतः यह मन के भाव प्रकट करने का ढंग या प्रकार मात्र है। अपने परम प्रचलित और सीमित अर्थ में भाषा के अन्तर्गत वे सार्थक शब्द भी आते हैं, जो हम बोलते हैं और उन शब्दों के वे क्रम भी आते हैं, जो हम लगाते हैं। हमारे मन में समय-समय पर विचार, भाव, इच्छाएँ, अनुभूतियाँ आदि उत्पन्न होती हैं, वही हम अपनी भाषा के द्वारा, चाहे बोलकर, चाहे लिखकर, चाहे किसी संकेत से दूसरों पर प्रकट करते हैं, कभी-कभी हम अपने मुख की कुछ विशेष प्रकार की आकृति बनाकर या भावभंगी आदि से भी अपने विचार और भाव एक सीमा तक प्रकट करते हैं, पर भाव प्रकट करने के ये सब प्रकार हमारे विचार प्रकट करने में उतने अधिक सहायक नहीं होते, जितनी बोली जानेवाली भाषा होती है। यह ठीक है कि कुछ चरम अवस्थाओं में मन का कोई विशेष भाव किसी अवसर पर मूक रहकर या फिर कुछ विशिष्ट मुद्राओं से प्रकट किया जाता है और इसीलिए 'मूक अभिनय' भी 'अभिनय' का एक उत्कृष्ट प्रकार माना जाता है। पर साधारणतः मन के भाव प्रकट करने का सबसे अच्छा, सुगम और सब लोगों के लिए सुलभ उपाय भाषा ही है।
Muktibodh : Ek Avdhut Kavita
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description: कभी-कभी विद्रोही स्वयं विद्रोह का प्रतीक बन जाया करता है, तब दोनों की प्रकृति समझने में कई असुविधाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। मुक्तिबोध विद्रोही से ज़्यादा तो काव्य-विद्रोह हो गए थे, इसलिए बहुत कम यह जानने की चेष्टा की गई कि मुक्तिबोध एक व्यक्ति भी हैं, और ऐसा व्यक्ति हमसे यह अपेक्षा करता है कि हम उसकी पड़ताल उसकी कविताओं से जो प्राय: करते हैं, कभी स्वयं कवि से आरम्भ करके उसकी कविता को देखें तो कितने विश्वसनीय नतीजे निकलते हैं, कि अरे, मुक्तिबोध इतने आत्मीय और सहज भी थे। इस आत्मीय स्मरण में पड़ताल की यही प्रक्रिया काम में ली गई है।
Tulsi Kavya Mimansa
- Author Name:
Uday Bhanu Singh
- Book Type:

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Description:
तुलसीदास महाकवि थे। काव्यस्रष्टा और जीवनद्रष्टा थे। वे धर्मनिष्ठ समाज-सुधारक थे। अपने साहित्य में उन्होंने समाज का आदर्श प्रस्तुत किया, ऐसा महाकाव्य रचा जो हिन्दी-भाषी जनता का धर्मशास्त्र भी बन गया। तुलसी गगनविहारी कवि नहीं थे, उनकी लोकदृष्टि अलौकिक थी। उन्होंने आदर्श की संकल्पना को यथार्थ जीवन में उतारा। उनके द्वारा रचे गए गौरव-ग्रन्थ हिन्दी साहित्य के रत्न हैं। सौन्दर्य और मंगल का, प्रेय और श्रेय का, कवित्व और दर्शन का असाधारण सामंजस्य उनके साहित्य की महती विशेषता है।
यह तुलसी-साहित्य की विराटता ही है कि उसकी सबसे अधिक टीकाएँ रची गई हैं। सबसे अधिक आलोचना-ग्रन्थ भी तुलसीदास पर ही लिखे गए हैं। सबसे अधिक शोध-प्रबन्धों का प्रणयन भी तुलसी पर ही हुआ है। ‘तुलसी-काव्य-मीमांसा’ भी उसी अटूट शृंखला की एक कड़ी है। इसमें तुलसीदास के दर्शन और काव्य का एक नया विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इसके विवेच्य विषय
हैं : अध्ययन-सामग्री, तुलसीकृत रचनाओं की प्रामाणिकता, तुलसीदास का जीवनचरित, उनकी आत्मकहानी, परिस्थितियों का प्रभाव एवं उनके साहित्य में युग की अभिव्यक्ति, उनके काव्य-सिद्धान्त, काव्य का भावपक्ष अर्थात् प्रतिपाद्य विषय, उनका कलापक्ष और उनके गौरवग्रन्थ, जिनमें यहाँ ‘रामचरितमानस', ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली' तथा ‘कवितावली' को लिया गया है।निस्सन्देह, तुलसीदास के अध्येताओं और जिज्ञासु पाठकों के लिए यह ग्रन्थ उपादेय होगा।
Kuvempu Sahitya : Vividh Aayam
- Author Name:
Ram Prakash
- Book Type:

- Description: भारतेन्दु का भाषा–प्रेम, मैथिलीशरण गुप्त की सांस्कृतिकता, जयशंकर प्रसाद की दार्शनिकता, पंत का प्रकृति–प्रेम, महादेवी वर्मा की रहस्यात्मकता, निराला की क्रान्तिकारिता, हजारीप्रसाद द्विवेदी की परम्परा–निष्ठा, प्रेमचन्द की सामाजिक–प्रतिबद्धता, रेणु की आंचलिकता, नागार्जुन की फक्कड़ता, केदारनाथ अग्रवाल का ग्रामीण–प्रेम, हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मकता और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की वैज्ञानिकता को अपने साहित्य में समेटनेवाले रचनात्मक व्यक्तित्व का नाम है—‘कुवेम्पु’। कन्नड़ भाषा के प्रथम ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित ‘कन्नड़ कविरत्न’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विविध पक्षों पर विद्वत्तापूर्ण व्यापक अध्ययन को प्रस्तुत करनेवाले आलेखों का संग्रह है—‘कुवेम्पु साहित्य : विविध आयाम’।
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