Doosari Parampra Ki Khoj
Author:
Namvar SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
‘दूसरी परम्परा की खोज’ में नामवर सिंह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति और साहित्य की उस लोकोन्मुखी क्रान्तिकारी परम्परा को खोजने का सर्जनात्मक प्रयास करते हैं जो कबीर के विद्रोह के साथ ही सूरदास के माधुर्य और कालिदास के लालित्य से रंगारंग है।</p>
<p>आठ अध्यायों वाली इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय का प्रस्थान-बिन्दु आचार्य द्विवेदी की कोई-न-कोई कृति है, किन्तु यह पुस्तक उन कृतियों की व्याख्या मात्र नहीं है और न उनके मूल्यांकन का प्रयास है बल्कि उनके माध्यम से उस मौलिक इतिहास-दृष्टि के उन्मेष को पकड़ने की कोशिश की गई है जिसके आलोक में समूची परम्परा एक नए अर्थ के साथ उद्भासित हो उठती है।</p>
<p>‘दूसरी परम्परा की खोज’ से एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जो अपनी सहजता में मोहक है, अपने संघर्ष और पराजय में भी गरिमामय है और अपनी मानव-आस्था में परम्परा के सर्वोत्तम मूल्यों का साक्षात् विग्रह है—कुटज के समान साधारण होते हुए भी मनस्वी और देवदारु के समान मस्ती से झूलते हुए भी अभिजात तथा अपनी ऊँचाइयों में एकाकी। आलोचना कितनी सर्जनात्मक हो सकती है, इसका उदाहरण है—‘दूसरी परम्परा की खोज’।
ISBN: 9788126715916
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: मोहन राकेश की प्रतिभा बहुमुखी थी। कहानी, उपन्यास, नाटक-एकांकी, ध्वनि नाटक, बीज नाटक और रंगमंच—इन सभी क्षेत्रों में मोहन राकेश का नाम सर्वोपरि है। इस संकलन में इन विधाओं के विभिन्न पहलुओं पर मोहन राकेश के छिटपुट लेखों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिनसे उनकी दृष्टि को समझने में पर्याप्त सहायता मिलेगी। लेखों के अतिरिक्त इस संकलन में ‘नयी कहानी’ पर एक गोष्ठी, सोवियत नाटककार के साथ एक बातचीत, हेब्बार और रविशंकर के साथ भारतीयता और आधुनिकता के तत्त्व पर एक चर्चा तथा कार्लो कपोला के साथ उनका अन्तिम इंटरव्यू भी है, जो अपने में अति महत्त्वपूर्ण हैं और राकेश की साहित्यिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि को आलोकित और रेखांकित करते हैं। साथ ही बासु भट्टाचार्य द्वारा मोहन राकेश का एक अन्तरंग परिचय भी है जो अपने में अभूतपूर्व है।
Ritikavya: Mulyankan Ke Naye Ayam
- Author Name:
PRABHAKAR SINGH
- Book Type:

- Description: रीतिकाव्य साहित्य और संवेदना का सौन्दर्यबोधीय और कलात्मक सृजन है। कोई भी जाति, सौन्दर्य और शृंगार से विलग होकर न तो जीवन के प्रति आकर्षण पैदा कर सकती है न विचारों में तेज। रीतिकाव्य मनुष्य की ऐहिकता को कला और सौन्दर्य के वैभव में सिरजने वाला काव्य है। हिन्दी- उर्दू कविता की साझा भाषायी संस्कृति भी इसी युग में प्रतिफलित हुई। साहित्येतिहास और आलोचना लेखन के विकास में 'रीतिकाव्य' को प्रायः उपेक्षित दृष्टि से ही आकलित किया गया। आलोचना और इतिहास लेखन के आरम्भिक दौर में 'रीतिकाव्य' को औपनिवेशिक विक्टोरियाई नैतिकता के चश्मे से ही देखा गया। द्विवेदी युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने रीतिविरोधी आलोचना का ऐसा अभियान चलाया कि हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रामविलास शर्मा जैसे प्रगतिशील आलोचक भी मूल्यांकन की इस विरोधी परम्परा को पोषित-पल्लवित करते नजर आते हैं। ये आलोचक रीतिकालीन कवियों के काव्य मर्म की तो प्रशंसा करते हैं लेकिन ऐतिहासिक मूल्यांकन करते समय रीतिकाव्य को दरबारी मानसिकता को पोषित करने वाला सामन्ती साहित्य कहकर उसे जनविरोधी कविता के खाँचे में डाल देते हैं। भारतीय चिन्तन परम्परा के वर्चस्ववादी और औपनिवेशिक नैतिकता के संश्लेष से निर्मित इस 'इतिहास दृष्टि' से उबरकर ही 'रीतिकाव्य' के साहित्य की सही पड़ताल की जा सकती है। यह पुस्तक रीतिकाव्य में विन्यस्त कला, सौन्दर्य और सृजन के वैभव को इतिहास की निरन्तरता में मूल्यांकित करने का प्रयास है। पुस्तक में रीतिकाव्य विषयक इतिहास, लेखन और आलोचना दृष्टि पर पुनर्विचार के साथ रीतिकाव्य के परिवेश, प्रवृत्ति और उसकी कविताई को साहित्य के नये विमर्शो और मूल्यों के साथ परखने की कोशिश है। पुस्तक में नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय, नित्यानन्द तिवारी जैसे वरिष्ठ पीढ़ी के आलोचकों के साथ युवा पीढ़ी के आलोचकों में श्रीप्रकाश शुक्ल, कृष्णमोहन और आशीष त्रिपाठी के आलेख रीतिकाव्य को मूल्यांकित करने की नयी दृष्टि प्रदान करते हैं।
Relevance of Savarkar Today
- Author Name:
Ashok Modak
- Book Type:

- Description: Swatantryaveer Vinayak Damodar Savarkar (1883-1966) was a multidimensional personality - a freedom fighter, social reformer, writer, poet, historian, political leader and philosopher all combined into one. Savarkar's ideas of modernity, social and religious reforms, cultivation of scientific temper and embracing technological tools continue to be relevant in the 21st century. "Relevance of Savarkar Today", 25 pearls of visionary wisdom by Veer Sawarkar, is the product of deep study and research by Dr Ashok Modak. Savarkar's quotations, the author's expert comments and nearly 60 supportive comments by senior political leaders, social reformers, and intellectuals in 25 chapters illustrate the relevance of following the visionary messages of Savarkar for a new India of the 21st century. Bring out a solid, cohesive social fabric through unity Hindutva embraces the whole being of the Hindu race Brave foreign policies for the total defence of India Strong India for the real happiness of humanity.
Chintamani : Vol. 1
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
“यदि वाणी की शक्ति ईश्वर का सबसे उत्तम प्रसाद है; यदि भाषा की उत्पत्ति बहुत-से विद्वानों द्वारा ईश्वर से मानी गई है? यदि शब्दों द्वारा अन्तःकरण के गुप्त रहस्य प्रकट किए जाते हैं; चित्त की वेदना को शान्ति दी जाती है; हृदय में बैठा हुआ शोक बाहर निकाल दिया जाता है; दया उत्पन्न की जाती है और बुद्धि चिरस्थायी बनाई जाती है; यदि बड़े ग्रन्थकारों द्वारा बहुत-से मनुष्य मिलकर एक बनाए जाते हैं; जातीय लक्षण स्थापित होता है; भूत और भविष्य तथा पूर्व और पश्चिम एक-दूसरे के सम्मुख उपस्थित किए जाते हैं; और यदि ऐसे लोग मनुष्य जाति में अवतार-स्वरूप माने जाते हैं—तो साहित्य की अवहेलना करना और उसके अध्ययन से मुख मोड़ना कितनी बड़ी भारी कृतघ्नता है।”
—‘साहित्य’ शीर्षक निबन्ध से
Anuvad : Avadharna evam vimarsh
- Author Name:
Shrinarayan Sameer
- Book Type:

- Description: नवोन्मेष तथा सृजनशीलता को अनुवाद का स्वभाव घोषित करनेवाली यह किताब अनुवाद को दो भिन्न समुदायों, राष्ट्रीयताओं और देशों को समझने एवं उनके मत-मतान्तरों को जानने का ज़रूरी औजार मानती है। फलस्वरूप यह अनुवाद को भाषा-संवाद मानने की प्रचलित मान्यता से आगे बढ़कर उसे सभ्यता-संवाद मानने का तर्क रचती है। इसमें अनुवाद को आधारभूत पहलुओं से समझने और विवेचित करने का प्रयास है। इस प्रयास में अनुवाद की अवधारणा को विखंडनवादी विमर्श के धरातल पर भी रखकर जाँचा-परखा गया है। विवेचन में इस बात की ख़ास सावधानी बरती गई है कि अत्याधुनिकता की चकाचौंध में अनुवाद का कला-कौशल धूमिल न हो जाए, बल्कि उसमें सृजन की लौ सर्वत्र जलती रहे। अक्सर अनुवाद को भाषा-कर्म कहा जाता है, मगर यह भाषा-कर्म कोई सामान्य कर्म नहीं है। मनुष्य-समाज की संवेदना, परम्परा, संघर्ष और सम्पूर्ण जीवन-राग भाषा के नियामक तत्त्व होते हैं। स्वाभाविक है कि अनुवाद के चिन्तन और सरोकार भाषा के नियामक तत्त्वों से जुड़कर गहन और व्यापक हो जाते हैं। शायद इसीलिए अनुवाद में मूलवत् होने की आकांक्षा और वास्तविकता के बीच टकराव मिलता है। किन्तु इस तरह के टकराव को यह किताब भाषा, संस्कृति और सभ्यता के विभाजक छोरों के हवाले नहीं करती, किसी क़िस्म की जिरह से उसका महिमामंडन भी नहीं करती; बल्कि अनुवादकर्ता के कौशल और क़ाबिलियत का विमर्श रचती है। अकारण नहीं, यह किताब अनुवाद को सृजन मानती है—किसी भाषा-सृजन का दूसरी भाषा में सृजन—अनुरचना की शक्ल में मूल रचना की परवर्ती रचना। अनुवाद को रचना का अनश्वर उद्यम घोषित करना निस्सन्देह इस किताब का मौलिक और सर्वथा नया विमर्श माना जाएगा।
Samkaleenta Aur Sahitya
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

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Description:
जब मैं बैंक में काम करता था, एक भिखारी था जो थोड़े अन्तराल से बैंक आता और रोकड़िया के काउंटर पर जाकर बहुत सारी चिल्लर अपनी थैली से उलट देता, फिर अपनी अंटी से, कभी अपनी आस्तीन से तुड़े-मुड़े नोट निकालकर एक छोटी-सी ढेरी लगा देता। कहता, इसे जमा कर लीजिए। उसके आने से मज़ा आता, आश्चर्य भी होता और एक क़िस्म की खीज भी होती—उन नोटों और गन्दी-सी चिल्लर को गिनने में। उस रोकड़िया जैसी ही स्थिति मेरी भी होती है जब समय-समय पर लिखी गई, छोटी-बड़ी टिप्पणियों को जमा कर उनकी किताब बनाने लगता हूँ। इस पूरी प्रक्रिया में लेकिन भिखारी भी मैं ही हूँ और रोकड़िया भी। सारी चिल्लर और नोट गिन लिए जाते तब पता लगता कि राशि कम नहीं हैं—कुल जमा काफ़ी अच्छा-ख़ासा है। ऐसा आश्चर्य कभी-कभी मुझे भी होता है। पृष्ठ गिनने लगता हूँ तो लगता है कि बहुत कुछ जमा हो गया है। सब कुछ चोखा नहीं है, कुछ खोटे सिक्के और फटे हुए नोट भी हैं।
इस दूसरी नोटबुक में इतना ही फ़र्क़ है कि इसमें गद्य की कुछ किताबों पर गाहे-बगाहे लिखी गई टिप्पणियों को भी शामिल किया गया है। पहली नोटबुक के फ़्लैप पर मैंने कहा था कि लिखने के सारे कौशल सिर्फ़ रचनाकार की क्षमताओं से ही पैदा नहीं होते हैं, कई बार वह अक्षमताओं से भी जन्म लेते हैं। ये नोट्स और टिप्पणियाँ मेरी क्षमताओं के बनिस्बत मेरी अक्षमताओं से ज़्यादा पैदा हुई हैं।
मुझे लगता था कि बाज़ार हिन्दी की कविता का कभी कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा क्योंकि न तो इस क्षेत्र में अधिक पैसा है, न ही कीर्ति के कोई बहुत बड़े अवसर ही हैं। पर मैं ग़लत था। बाज़ार एक प्रवृत्ति है। इसका ताल्लुक़ अवसर, पैसे या कीर्ति से नहीं है। हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य जिस तरह के घमासान और निरर्थक विवादों से भरा नज़र आ रहा है, वह बाज़ार के ही प्रभाव का परिणाम है। विगत तीन दशकों की कविता का जैसा मूल्यांकन होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है। ‘आलोचना’ से यह उम्मीद तब तक निरर्थक ही होगी जब तक कि कवि स्वयं इस दृश्य के मूल्यांकन की कोशिश नहीं करेंगे। यही हालत गद्य की भी है, विशेष रूप से कहानी और उपन्यास की। उसमें हल्ला अधिक है, सार्थक विमर्श और साफ़ बोलनेवाली आलोचना कम। आलोचना का एक बड़ा हिस्सा या तो उजड्डता और अहंकार से भरा है या ‘अहो रूपम् अहो ध्वनि’ के शोर से। एक कवि और कथाकार ही इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। उसी की ज़रूरत है।
—राजेश जोशी
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